कुछ पल फुर्सत के निकालकर देखिए, सामने नई सृष्टि खुलने लगेगी

टीम डायरी

फुर्सत के पलों को फालतू की वक्त-बर्बादी समझने की गलती मत कीजिएगा। अलबत्ता कई बार कुछ लोग ऐसा करते भी होंगे। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता। और ये बात बाकायदा तमाम शोध-अध्ययनों से साबित हो चुकी है। ऐसा ही एक अध्ययन बीते दिनों अमेरिका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में हुआ। इसमें जो निष्कर्ष सामने आए वे काबिल-ए-गौर ही नहीं, बल्कि जीवन में आजमाने लायक भी हैं।

इस अध्ययन के मुताबिक अपनी व्यस्त दिनचर्या से जब हम कुछ पल फुर्सत के निकालते हैं, तो हमारे सामने नई दुनिया खुलती है। या कहें कि पूरी की पूरी नई सृष्टि ही। कैसे? इसके जवाब को यूँ समझिए कि जब हम फुर्सत में होते हैं, तभी हमें घर के किन्हीं झरोखों से छनकर आ रही धूप की किरणों में तैरते छोटे-छोटे कण दिखाई देते हैं। कभी कोई छोटी नई-सी चिड़िया और उसके पंखों पर छिटकी रंगोली नजर आती है। पक्षियों की आवाजों का फर्क समझ आता है। पेड़-पौधों में होने वाले बदलाव दिखते हैं। सूरज का निकलना, उसका ढलना, रात के वक्त में आसमान पर छिटके तारों की खूबसूरती सब दिखने लगता है। और दिखते-दिखते एक वक्त ऐसा भी आता है, जब हम इन तमाम चीजों को समझने लगते हैं। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो हम इनके साथ जुड़ने लगते हैं।

और यही जुड़ाव फिर हमारे जीवन के अनुभव समृद्ध करता है। बल्कि हमारी सबसे अनमोल पूँजी बनता जाता है। इस अध्ययन से जुड़ीं एक अमेरिकी पक्षी वैज्ञानिक हैं कोरिना न्यूसम। वे कोरोना महामारी के उस दौर को याद दिलाती हैं, जब तालाबन्दी की वजह से घरों में बन्द लोग लगातार प्रकृति के करीब आ रहे थे। उसे महसूस कर रहे थे। उसके साथ जुड़ रहे थे। अधिकांश लोगों के लिए उस वक्त के प्राकृतिक नजारे किसी अजरज से कम नहीं थे। जबकि उनमे अचरज जैसा कुछ था नहीं। बस, खास था तो सिर्फ इतना कि अपनी व्यवस्तता की वजह से इंसानों की इन तमाम चीजों पर नजर पड़ना बन्द ही हो गई थी। लेकिन जब महामारी के डर ने इंसान को घरों में बन्द किया तो उसकी आँखों के सामने यह पूरी दुनिया परत-दर-परत खुलती गई। जादू की तरह।

प्रकृति की इन खुलती परतों ने ही तब इंसान को सबसे अधिक सुकून भी दिया था। यह भी अब तक कोई भूला नहीं होगा। लिहाजा, कोशिश कीजिए कि व्यस्तता और भाग-दौड़ की पटरी पर लौट चुकी जिन्दगी में से कुछ पल फुर्सत के अब भी हम निकालते रहें। ताकि प्रकृति की परतें हमारे सामने खुलती रहें। हमें सुकून देती रहें। वैसे, इसके साथ-साथ अमेरिका के ही जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल सोशल सायकोलॉजी में प्रकाशित अन्य शोध अध्ययन के निष्कर्ष भी ध्यान में रखे जा सकते हैं। वह ये कि जरूरत से ज्यादा फुर्सत के पल घातक भी हो सकते हैं। क्योंकि उस सूरत में किसी से कोई कनेक्ट-वनेक्ट नहीं होता, बल्कि खुद से इंसान डिस्कनेक्ट होने लगता है। इसलिए इन ‘रोचक-सोचक’ तथ्यों काे ध्यान में रखिए और व्यस्तता व फुर्सत के बीच सन्तुलन बनाकर जीवन का आनन्द उठाइए।

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Neelesh Dwivedi

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