एक चुनावी सभा
अनुज राज पाठक, दिल्ली
जनता या जनसमूह हमेशा भावना प्रधान माना जाता है। कुछ हद तक होता भी है। उसकी भावनाएँ छोटी-छोटी चीजों पर आहत हो जाती हैं। और उतनी ही छोटी-छोटी चीजों पर वह जल्दी से प्रसन्न भी होती है। हालाँकि हाल ही में सम्पन्न हुआ लोकसभा चुनाव को इस तथ्य के विरोधाभासी प्रमाण के तौर पर देख सकते हैं।
इस चुनाव में एक तरफ चार सौ पार का नारा था और राम मन्दिर निर्माण से जोर मारती जनभावनाओं को भुनाने की कोशिश थी। दूसरी तरफ ‘लड़ेगा इंडिया जीतेगा इंडिया’ जैसा नारा था, जिसके जरिए देश की जनता के साथ एकजुटता दिखाने का प्रयास किया जा रहा था। दोनों पक्ष अपनी-अपनी तरह की भावुक अपीलों से जनता से अपने लिए समर्थन माँग रहे थे। लेकिन भारत की जनता ने बड़े ही गणितीय आधार पर इस बार अपना निर्णय दिया। ऐसा कि दोनों ही पक्ष उसके निर्णय को अपनी जीत और विरोधी की हार बताकर खुश हो रहे हैं। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो जनता इस बार दोनों पक्षों में से किसी की ओर भावनात्मक रूप से ज़्यादा झुकी नहीं, बही नहीं।
इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। अयोध्या अर्थात् फैजाबाद संसदीय सीट से उस पक्ष का प्रत्याशी हार गया, जो राम मन्दिर निर्माण से पूरे देश में अपने लिए जनभावनाओं को अनुकूल मानकर बैठा था। लेकिन उसकी यह मान्यता सिर्फ अयोध्या शहर में ही सही साबित हुई। इस पूरी संसदीय सीट और यहाँ तक कि उत्तर प्रदेश में भी हालात उसके लिए अनुकूल नहीं बने। वर्ष 2019 के मुकाबले इस पक्ष को अबकी बार प्रदेश में 29 सीटों का नुकसान हो गया। लेकिन इसी तस्वीर का दूसरा पहलू देखिए कि राज्य की जनता ने दूसरे पक्ष को भी इतनी अधिक सीटें नहीं दी कि वह उत्तर प्रदेश के रास्ते देश की सत्ता पर (जैसा कि दावा किया जाता है) काबिज हो सके।
इसके बावजूद दोनों पक्ष अपने-अपने दावे-प्रतिदावे करने में लगे हैं। वह भी इस हद तक कि उनकी भाषा भी कई बार असंयमित हो जाती है। जबकि मुझे लगता है कि अयोध्या का चुनाव परिणाम दोनों पक्षों को आत्मावलोकन का अवसर प्रदान करता है। उन्हें संकेत करता है कि खुशफहमी, अतिआत्मविश्वास, किसी स्तर पर किसी को भी हो, आखिर में भारी ही पड़ता है। हालाँकि इस तरह का आत्मावलोकन कोई कर रहा होगा, फिलहाल ऐसा लगता नहीं क्योंकि दोनों पक्ष और उनके समर्थक दूसरे को हारा हुआ और स्वयं को विजेता साबित करने की कोशिश में लगे दिखते हैं, अभी। बावजूद इसके कि जनता ने विजेता और पराजित की स्पष्ट व्यवस्था दी नहीं है।
वैसे, दलों के समर्थकों को अपने-अपने स्तर पर खुशी और दुख व्यक्त करने का अधिकार है। लेकिन जीत-हार में एक-दूसरे को अपशब्द कहना सर्वथा अनुचित है। याद रखिए, जनतंत्र में जनता जनार्दन होती है। इसलिए सभी को उसके निर्णय को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। इसी से लोकतंत्र की गरिमा है।
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(नोट : अनुज दिल्ली में संस्कृत शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापकों में शामिल हैं। अच्छा लिखते हैं। इससे पहले डायरी पर ही ‘भारतीय दर्शन’ और ‘मृच्छकटिकम्’ जैसी श्रृंखलाओं के जरिए अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। समय-समय पर दूसरे विषयों पर समृद्ध लेख लिखते रहते हैं।)
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