बदमाश को बना दिया ‘अठन्नी छाप’ समाज-कंटकों का वास्तव में यही इलाज़ है!

टीम डायरी

समाचार दो-तीन दिन पुराना है। मगर इससे जुड़ा प्रयोग देश में ही नहीं सम्भवत: दुनियाभर में नया है। और इसके असर की बात करें, तो वह बहुत दूर तक हो सकता है। बशर्ते, इसमें निहित सन्देश को पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था सही अर्थों में ग्रहण करे, उसे क़दम-दर-क़दम लागू करे तो।  

पहले बात समाचार की, जो भरपूर ‘रोचक-सोचक’ है। मध्य प्रदेश की इन्दौर पुलिस ने दिसम्बर महीने की चार तारीख़ को बिट्‌टू गौड़ नाम के एक गुंडे को पकड़ा है। उस पर लोगों को डरा-धमकाकर रंगदारी वसूलने का आरोप है। बताते हैं कि आपराधिक मामलों के गवाहों को भी वह धमकियाँ देकर मुकरने के लिए मज़बूर किया करता है। हालाँकि, यहाँ तक बात एकदम सामान्य रही। लेकिन इसमें रोचक मोड़ तब आया, जब ये पता चला कि पुलिस ने इस बदमाश पर ‘अठन्नी’ यानि 50 पैसे का इनाम रखा है। सो, उसी के मुताबिक जिन चार पुलिसवालों को इसे पकड़ने का श्रेय दिया गया, उनके बीच 12.50-12.50 पैसे की इनामी राशि बराबर-बराबर बाँटी जाएगी।  

इसके बाद मीडिया और सोशल मीडिया के कई मंचों पर इस मामले को प्रमुखता से प्रकाशित, प्रसारित किया गया। उसमें पकड़े गए गुंडे को ‘देश का पहला अठन्नी छाप गुंडा’ बताया गया। अस्ल में, यही पुलिस चाहती भी थी कि बदमाशों की बेइज्ज़ती हो। इससे उनकी हिम्मत तो टूटेगी ही, समाज में उनका डर भी कम होगा। और वास्तव में देखा जाए तो यही होना भी चाहिए। सिर्फ़ गुंडे-बदमाशों का ही नहीं, हर तरह के समाज-कंटकों का यही इलाज़ होना चाहिए। ऐसे ही तरीक़ों से उनके हौसले पस्त होंगे, यह बात समझनी होगी।

यहाँ यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि समाज-कंटक किसी भी क़िस्म के हों, उनके द्वारा की जाने वाली हरक़तों के पीछे एक सोच यह भी होती है कि वे जल्दी ही सुर्ख़ियों में आ जाएँगे। शहर, प्रदेश, देश और हो पाया तो दुनिया में भी, वे मशहूर होंगे। मीडिया उन पर तरह-तरह की कहानियाँ बनाएगा। उनके साक्षात्कार लिए जाएँगे। उन साक्षात्कारों को भी हजारों-लाखों लोग बड़ी उत्सुकता से देखेंगे, पढ़ेंगे। उनके समर्थक और विरोधी अपने-अपने तरीक़ों से उन्हें मक़बूलियत (लोकप्रियता) मुहैया कराएँगे। मतलब, ‘बदनाम भी होंगे तो क्या नाम न होगा’ वाली बात हो जाएगी। ‘डॉन’ को 17 मुल्कों की पुलिस ढूँढ़ने लगेगी। पकड़े जाने के लिए सिर पर लाखों-करोड़ों का इनाम रखा जाएगा। यूँ उनका रुतबा बढ़ेगा और आम लोगों के दिलों में उनका ख़ौफ़ क़ायम होता जाएगा। 

लेकिन सोचकर देखिए कि अगर इन्दौर पुलिस जैसा ही क़ारनामा समाज-कंटकों के लिए हर कहीं होने लग जाए तो? समाज-कंटकों को चवन्नी-अठन्नी छाप न सिर्फ़ घोषित कर दिया जाए, बल्कि मान भी लिया जाए। मीडिया और सोशल मीडिया के मंच उन पर ध्यान देना पूरी तरह बन्द कर दें। अपने मंच पर उनका ज़िक्र करने लायक ही उन्हें न समझें तो? तब क्या इस सार्वजनिक मानमर्दन से वे हतोत्साहित नहीं होंगै? ज़रूर होंगे। इसीलिए, इस तरह के लोगों के लिए ऐसे ही इलाज़ की ज़रूरत है। उनका ये इलाज़ हम सब कर सकते हैं। #अपनीडिजिटलडायरी ने यही बात ध्यान में रखकर इस मामले को अपने तरीक़े से सामने रखा है। अब आपकी बारी है।  

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Neelesh Dwivedi

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