टीम डायरी
एक गाना है ‘सिलसिला’ फिल्म (1981) का, “ये कहाँ आ गए हम, यूँ ही साथ चलते-चलते”। इसे थोड़ा बदलिए और कुछ यूँ पढ़िए, “ये कहाँ आ गए हम, यूँ ही दूर चलते-चलते!” हाँ, इसमें चौंकने वाली बात नहीं है और न यह कोई शरारत है। बल्कि गाने में यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि गौवंश से हमारे जुड़ाव के ‘सिलसले’ में कितना बदलाव आ गया है अब। अजब-गजब बदलाव हुआ है। भारत जैसे देश में, जहाँ कभी पूरा जीवनचक्र, पूरी संस्कृति, गौ, गोविन्द और गाँवों के इर्द-गिर्द घूमती थी, वहीं अब लोग पैसे देकर कुछ मिनटों के लिए गायों को गले लगा रहे हैं! क्यों? ताकि उनका तनाव दूर हो सके। उन्हें मानसिक तौर पर राहत मिल सके।
अलबत्ता, ऐसी खबरें चूँकि चटखारेदार नहीं होतीं, इसलिए मीडिया-सोशल मीडिया में इन्हें ज्यादा जगह नहीं मिलती। पर फिर भी किन्हीं मीडिया संस्थानों का इन पर ध्यान गया है। वह भी उस वक्त जब अभी कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल के नए बने मुख्ण्मंत्री सुवेन्दु अधिकारी इस्कॉन (इन्टरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्ण कॉन्शसनेस) के मुख्यालय गए। बंगाल के नदिया जिले में इस्कॉन ने एक नगर बसाया है। ‘मायापुरी’ नाम दिया है उसे। वही संगठन का मुख्यालय है। वहाँ गौशाला में सुवेन्दु जब गायों को सहला रहे थे, तो मीडिया के किसी प्रतिनिधि का पास में लगे एक बोर्ड की तरफ ध्यान गया। उस पर ‘गौ-आलिंगन सेवा’ की दरें लिखी हुईं थीं। ‘इस्कॉन’ सामान्य लोगों के लिए इस तरह सेवाएँ उपलब्ध कराता है। और जैसा कि वहाँ हर ‘सेवा’ की दरें होती हैं, इसकी भी हैं!
खैर, तो वहाँ से यह विषय मीडिया के कुछ कोनों में सुर्खी बना और पता चला कि ‘इस्कॉन’ ही नहीं, बेंगलुरु, गुरुग्राम, भुवनेश्वर, जैसे कई शहरों-महानगरों में भी पेशेवर तौर पर ‘गौ-आलिंगन सेवाएँ’ उपलब्ध कराई जा रही हैं। कई पेशेवर संस्थाएँ इस काम में लगी हैं। लोग उन संस्थाओं द्वारा बताए गए स्थानों (गौशाला या किसी के खेत, आदि में) पर जाते हैं। एक घण्टे का 200-500 रुपए का शुल्क प्रतिव्यक्ति के हिसाब से लिया जाता है। वहाँ लोग गायों को गले लगाते हैं, उन्हें सहलाते हैं, दुलारते हैं और इस तरह रोजमर्रा की आपाधापी भरी जीवनशैली से उपजने वाले अपने तनाव, अवसाद को दूर करते हैं। यही नहीं, ‘गौ-आलिंगन सेवा’ ने बाकायदा व्यस्थित चिकित्सा-पद्धति का रूप ले लिया है। इस पद्धति से इलाज कराने का ‘पैकेज’ लाखों रुपए का होता है।
यहाँ तक अगर इस जानकारी से किसी को अचरज न हुआ तो आगे भी सुनिए। इन्टरनेट पर खोज-बीन करने पर पता चलता है कि ‘गौ-आलिंगन सेवा’ की खोज नीदरलैण्ड में हुई! वहाँ 2000 के दशक में कुछ किसानों ने इसे खोजा। उसे डच भाषा में ‘कोए नुफेलेन’ कहा गया। वहाँ से यह चलन पूरे यूरोप और पश्चिम के अन्य देशों में प्रचलित हुआ। अब यह ‘चलन’ भारत में आ गया है। और इस स्तर तक आ गया है कि एक वर्ग तो 14 फरवरी के दिन को ‘गौ आलिंगन दिवस’ के रूप में घोषित करने की सरकार से माँग करने लगा है।
अब सोचिए, यह सब उस देश में हो रहा है, जहाँ कभी करीब-करीब हर घर के सामने, आँगन में या गौशाला में कम से कम एक या दो गायें तो बँधी ही रहती थीं। उनके छोटे-छोटे बछड़े-बछड़ियों की पूँछ पकड़कर घर के बच्चे दौड़ लगाया करते थे। उन गायों, बछड़े-बछड़ियों को दुलारने का कोई पैसा नहीं लगता था, बल्कि वह ‘देवतुल्या गौ’ हमें ही सब देती रहती थी। हमारी संस्कृति में तो यह सब हजारों साल से रचा-बसा हुआ था। आज भी है। मगर अफसोस कि हमने इस सबको अनदेखा करते-करते लगभग भुला ही दिया है।
गाय के लिए हमने अपने घरों के दरवाजे बंद कर दिए। उसे हमने सड़कों पर आवारा घूमने, तेज रफ्तार वाहनों से टकराकर मरने और कसाइयों के हाथों काटे जाने के लिए लावारिस छोड़ दिया। उसे हमने पन्नियाँ और घरों से निकलने वाला जूठन खाने के लिए मजबूर कर दिया। और अब देखिए, हमारे इसी उपेक्षापूर्ण व्यवहार का श्राप लगा है हमें कि हम लगातार तनाव-अवसाद के अँधेरों में घिर रहे हैं। उससे राहत पाने के लिए हमें उसी गाय और गौवंश की शरण लेनी पड़ रही है। और हमारी मजबूरी, अज्ञानता का फायदा उठा रहे बिचौलिए किस्म के लोग-संस्थाएँ, जो हमारी ही ‘दौलत’ हमें टुकड़ों में बाँटकर अपनी जेबें भर रहे हैं!! अजब-गजब है न?
