शिवाजी ‘महाराज’ : आक्रान्ताओं से पहले….. दुग्धधवल चाँदनी में नहाती थी महाराष्ट्र की राज्यश्री!

बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से

महाराष्ट्र की भूमि देवी-देवताओं की भूमि है। अपने हाथों में नानाविध शस्त्रास्त्र धारण कर आसुरी शक्तियों का विध्वंस करने वाले देवी-देवता मराठों के घरों में, मन्दिरों में सदियों से विराजमान थे। इन देवी-देवताओं के भक्त सचेत थे। आक्रामकों को अनगिनत हाथों से रोक दिया जाता था। देवता अपने भक्तों के तन-मन में जाग रहे थे। महाराष्ट्र में ऐसा एक भी देवता नहीं था, जिसके हाथ में शस्त्र न हो। स्वतंत्रता के लिए, स्वधर्म के लिए, सज्जनों की रक्षा के लिए, दुर्जनों के नाश के लिए ताक़त और उत्साह से भरी पूरी ज़िन्दगी जियो और हँसते-हँसते शान से मरो। यही सन्देशा ये वीर मराठों को दे रहे थे।

मन का आपा खोकर, तल्लीन होकर भजन-पूजन करने वाले, वीरता का यह काम करने वाले तथा खेती-बाड़ी का काम करने वाले मराठी आदमी के होठों पर यही घोष जयघोष होता था, ‘हर हर महादेव, जय भवानी’, ‘उठो जय येलकोट मल्हार’, ‘पुण्डलीक वरदा हरि विठ्ठल’!

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चारों पुरुषार्थ-सम्पन्न करने के लिए महाराष्ट्र तत्पर था। चारों पुरुषार्थों को यहाँ समान सम्मान था। राजदंड, धर्मदंड और तराजू के काँटे समतोल विवेक से इस्तेमाल होते थे। यहाँ सेवा का आदर था। यज्ञभाग करने वाले वैरागियों एवं साधु-सन्तों को जनमानस में राजपुरुषों से ज़्यादा ऊँचा स्थान था। समाज में एकता थी।

महाराष्ट्र का ध्वज भगवा था। सन्त एवं सत्ताधारी भगवा ध्वज को कन्धे पर उठाकर नाच रहे थे। भक्तों की तीर्थयात्रा में और वीरों की रणयात्रा में इसी ध्वज को जी-जान से पूजा जाता था। गेरुआ रंग होता है, अरुण का रंग। यह त्याग का रंग है। सति-साध्वियों के सौभाग्य से, सन्तों के विराग से और वीरों के रुधिर से इस ध्वज का रंग गेरुआ हुआ है। ‘वैभव और विराग, सत्ता और सेवा का आदर्श स्थापित करो’, यह आदेश देने वाला, आग की लपटों की तरह फहराने वाला यह ध्वज सहस्रावधि वर्षों के तेजस्वी इतिहास, सुसंस्कृति और सद्धर्म का प्रतीक रहा है।

महाराष्ट्र वैभवशाली था। स्वतंत्र था। वाकाटक, चालुक्य, राष्ट्रकुल, शिलाहार, यादव, कदम्ब आदि राजवंशों ने, विद्वानों और कलावन्तों ने महाराष्ट्र को सजाया सँवारा था। शालिवाहन से लेकर यादवों के काल तक इस भाग्यभूमि पर परकीय दुश्मन का साया तक नहीं पड़ा था। महाराष्ट्र की सेना, सेनापति, राजा, प्रधान कूटनीतिज्ञ तथा तंत्रज्ञ अपने कर्तव्यों का दक्षता से पालन कर रहे थे। सीमाएँ सुरक्षित थीं। राज्य के खदानें एवं गोदाम समृद्ध थे। कलावन्त और विद्वानों का हर कहीं सम्मान किया जाता था। महाराष्ट्र के पराक्रम, कला, विद्या, स्वभाव और वैभव की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। पैठन, वाशिम, सूपरिक, गोपकपट्‌टन, ठाणे, चौल, देवगिरी आदि कई नगर शिल्प और सम्पदा से सजे हुए थे।

महाराष्ट्र के बाजारों के कस्बे तथा विद्वत्सभा की ओर दुनियाभर के लोग दौड़े चले आते थे। सार्वभौम और सम्पन्न महाराष्ट्र का ध्वज बुलन्दी पर था। हाल-शातवाहन से लेकर मुकुन्दराज तक अनेक प्रतिभावान कवियों ने महाराष्ट्र की साहित्य-सम्पदा को सम्पन्न बनाया था। और उसे मुकुट पहनाया था श्री ज्ञानेश्वरजी ने। मराठी भाषा राजाश्रय से मंडित थी। सकल सौभाग्य-सम्प्न्न थी। महाराष्ट्र की पैठन नगरी, पैठन की जरी और रेशम की आकर्षक साड़ियाँ और ज्ञानेश्वरी, अपनी खानदानी सुन्दरता से, शरद के नभोमंडल से स्पर्धा कर रही थी।

एलोरा-अजन्ता की गुफाएँ सहयाद्रि की राजरानियाँ थीं। अलौकिक शिल्पों से आलोकित ऐसी अमीर गुफाएँ, अमीरी शान से अकड़नेवाले नगाधिराज हिमालय के पास भी नहीं थी। एक हजार वर्षों के काल-कगार पर खड़ी ये गुफाएँ महाराष्ट्र के वैभव को उन हजार वर्षों का मिला रत्नजड़ित नजराना ही हैं। महाराष्ट्र की आर्थिक, सांस्कृतिक, शास्त्रीय और राजनीतिक सम्पन्नता की ये नौबत ही थी। एलोरा की कैलाश गुफा मानो कैलाशनाथ का मन्दिर ही है। शिव–पार्वती, गणेश सरस्वती और इन्द्र की सभा है एलोरा। वह मयसभा भी है। मराठी कला, मराठी मन, मराठी धन और मराठी लगन की पत्थरों में रची कहानी है वह। इसे पूरी करने में मराठों की कई पीढ़ियाँ बीत गई। ऐसी है मराठों को ज़िद।

महाराष्ट्र के गाँवों में खुशहाली थी। भीमा, पूर्णा, ताज, कृष्णा आदि नदियाँ लहराती, बलखाती बह रही थीं। सहयाद्रि और सतपुड़ा पर्वतमालाएँ निश्चिन्त थीं। घर के बड़े-बूढ़े भी निश्चिन्त थे। खेतों में उनके जवान बेटे-पोते जी लगाकर मेहनत करते। सोना उगलते घरों में बहू-बेटियों की हँसी खनकती रहती। महाराष्ट्र में स्वतंत्रता, प्रसन्नता, वैभव और सुरक्षा का स्वर्ग उत्तर आया था।

देवी-देवताओं तथा ऋषि-मुनियों का महाराष्ट्र की भूमि से नज़दीकी रिश्ता था। रुक्मिणीजी महाराष्ट्र की कन्या थीं। इस तरह यदुराज श्रीकृष्णजी महाराष्ट्र के दामाद हुए। भगवान रामचन्द्र एवं सीताजी ने दण्डकारण्य में, गोदावरी के किनारे पर्णकुटी बनाई। गृहस्थी बसाई। महाराष्ट्र की पहली गृहस्वामिनी, गृहलक्ष्मी थीं सीताजी। मराठों की राज्यश्री तथा गृहलक्ष्मी सकल सम्पदाओं से सम्पन्न थी। वे सदा सुहागन, अंगना थीं, वीरांगना थीं।

महाराष्ट्र सर्वांग सुन्दर था। कई राजवंशों ने, रणबाँकुरों ने, पंडित सन्त-महन्तों ने प्रतिभावन्तों एवं व्यापारियों ने, खेतिहरों ने, मजदूरों ने, महाराष्ट्र को समृद्ध किया था। यहाँ की राजसभाओं, विद्वत्सभाओं, बाजारों की ख्याति दशों दिशाओं में फैली हुई थी। चौसठ कलाएँ, विधाएँ, पैठणी साड़ी की तरह जगर-जगर कर रही थीं। पत्थरों में ख़ुदी कैलाश गुफाओं की शिल्पकृतियाँ काव्य की तरह सलोनी थीं। और काव्य सुन्दर शिल्पकृतियों सा मनभावन था।

पैठण, सिन्नर, तेर, ठाणे, करवीर, गोवा, वाशिम, पवनार, चौल, सोपारें आदि नगर श्री-समृद्धि से, ऐश्वर्य से मण्डित थे। प्रजा के शासक, सही मायने में प्रजा पालक थे। प्रजा से अमित स्नेह करते थे। राज्य की सीमाओं को किसी तरह का कोई ख़तरा नहीं था। स्वराज्य की सुरक्षा का भार सजग राजनीतिज्ञ एवं चतुरंग सेना खुशी-खुशी उठाए हुए थे।

देहातों में सुख-शान्ति थी। धरती सोना उगल रही थी। अनाज के लिए कोई भी मोहताज़ नहीं था। दरवाजे पर याचक, अतिथि, जरूरतमन्द, अथवा विद्यार्थी आता तो गृहस्वामी एवं गृहस्वामिनी आनन्द से उनकी अभ्यर्थना करते। याचक भी पापी पेट की ख़ातिर झोली नहीं फैलाते थे। वे होते थे व्रतस्थ ज्ञानी या फिर देवी-देवताओं को प्रसन्न करने वाले निष्ठावान् भक्त। अन्नदान करने वाला महाराष्ट्र तृप्त, समृद्ध, दानशील था। दिव्य मन्दिरों में अप्रतिम मूतियाँ थीं। रति-मदन को शरमाने वाला लावण्य छलक-छलक पड़ता। स्तोत्रों से मंत्रों से, मन्दिरों के प्राचीर गूँजते रहते। सुगन्ध से महकते रहते।

मन्दिर ज्ञानपीठ थे। उनके सभा मंडप ललित कलाओं के रंगमंच थे। यहाँ होते थे कीर्तन-प्रवचन, वेदपठन तथा शास्त्रार्थ भी चलते रहते। पंडित सभाएँ जोर-शोर से होतीं। कुशल कलावन्तों के गायन, वादन, नृत्य में रंगशालाएँ मगन होतीं। दीवारें, आँगन चित्रकारी से, रंगोलियों से सजे होते। मन्दिरों के देवताओं के सामने सकल कलाएँ, विद्याएँ, शास्त्र, सम्पदाएँ, सुख-दुःख दान-धरम तथा शिक़वे-शिकायतें भी प्रस्तुत थे। महाराष्ट्र श्री चरणों में सन्नद्ध था। लवलीन था। 
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(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।) 
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शिवाजी ‘महाराज’ श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ 
1- शिवाजी ‘महाराज’ : किहाँ किहाँ का प्रथम मधुर स्वर….

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