जो क्षमा करे वो महावीर, जो क्षमा सिखाए वो महावीर…

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 9/11/2021

एक सेठ ने अपने छोटे भाई को व्यापार शुरू करने के लिए कुछ धन दिया। लेकिन छोटे भाई ने व्यापार जमने के बाद धन वापस नहीं किया। धीरे-धीरे धन के कारण दोनों भाइयों में विवाद गहरा होता चला गया। दोनों में बातचीत बन्द हो गई। कई वर्ष बीत गए। 

सेठ का मन हमेशा इस बात से व्यथित रहता। किसी दिन सेठ ने एक महत्मा से अपनी व्यथा-कथा सुनाई। महात्मा ने कहा, “आप अपने भाई से क्षमा माँग लीजिए। आपकी व्यथा दूर हो जाएगी।” 

इस पर सेठ कहने लगे, “मैं क्यों क्षमा माँगूं?’ 

महात्मा ने कहा, “परिवार में ऐसा कोई संघर्ष नहीं होता, जिसमें दोनों पक्षों की गलती न हो, इसीलिए।”

सेठ ने अगला सवाल किया,“मुझसे क्या भूल हुई?” 

महात्मा बोले, “आप ने छोटे भाई को बुरा समझा, उसकी निन्दा की, आलोचना की, तिरस्कार किया।” 

यह सुनकर सेठ को अपनी पुरानी बातें याद हो आईं। वह व्यवहार याद हो गया, जो उन्होंने अपने भाई से किया। अब वे उस पर पश्चाताप कर रहे थे। इसी मनोदशा में वे छोटे भाई के घर जा पहुँचे।

उन्हें दरवाजे पर आया देख उनका छोटा भाई पहले ही सब भूल-भालकर दौड़ा-दौड़ा उनके पैरों पर गिर पड़ा। उसने पहले ही अपने किए पर क्षमा माँग ली। कारण कि पश्चाताप उसे भी था। 

सेठ यह देख आश्चर्य से भर गए। उन्होंने भाई को क्षमा कर दिया। अपने किए पर क्षमा भी माँग ली। उनके मन का मैल अब पश्चाताप और क्षमा के प्रभाव से आँसुओं में बह गया। वे अब आगे परस्पर स्नेह से रहने लगे। 

क्षमा के इसी महत्त्व को ध्यान में रखते हुए भगवान महावीर ने इसे अपनी शिक्षाओं में प्रमुखता से स्थान दिया। महावीर स्वामी भारत में पैदा होने वाली महान विभूतियों में शामिल रहे हैं। उन्होंने भारतीय परम्परा के मूलभूत सिद्धान्तों का सन्देश जनमानस को उसी की भाषा में पहुँचाया।

यहाँ से आगे ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की कड़ियों में हम भगवान महावीर की शिक्षाओं, उनके सिद्धान्ताें, उनके सन्देशों ,उनकी परम्परों, उनके आदर्शों और भारतीय ज्ञान परम्परा में योगदान का सामान्य रूप से परिचय प्राप्त करेगें।
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(अनुज, मूल रूप से बरेली, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। दिल्ली में रहते हैं और अध्यापन कार्य से जुड़े हैं। वे #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापक सदस्यों में से हैं। यह लेख, उनकी ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की 35वीं कड़ी है।) 
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अनुज राज की ‘भारतीय दर्शन’ श्रृंखला की पिछली कड़ियां… 
34 : बौद्ध अपनी ही ज़मीन से छिन्न होकर भिन्न क्यों है?
33 : मुक्ति का सबसे आसान रास्ता बुद्ध कौन सा बताते हैं?
32 : हमेशा सौम्य रहने वाले बुद्ध अन्तिम उपदेश में कठोर क्यों होते हैं? 
31 : बुद्ध तो मतभिन्नता का भी आदर करते थे, तो उनके अनुयायी मतभेद क्यों पैदा कर रहे हैं?
30 : “गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास”
29 : कोई है ही नहीं ईश्वर, जिसे अपने पाप समर्पित कर हम मुक्त हो जाएँ!
28 : बुद्ध कुछ प्रश्नों पर मौन हो जाते हैं, मुस्कुरा उठते हैं, क्यों?
27 : महात्मा बुद्ध आत्मा को क्यों नकार देते हैं?
26 : कृष्ण और बुद्ध के बीच मौलिक अन्तर क्या हैं?
25 : बुद्ध की बताई ‘सम्यक समाधि’, ‘गुरुओं’ की तरह, अर्जुन के जैसी
24 : सम्यक स्मृति; कि हम मोक्ष के पथ पर बढ़ें, तालिबान नहीं, कृष्ण हो सकें
23 : सम्यक प्रयत्न; बोल्ट ने ओलम्पिक में 115 सेकेंड दौड़ने के लिए जो श्रम किया, वैसा! 
22 : सम्यक आजीविका : ऐसा कार्य, आय का ऐसा स्रोत जो ‘सद्’ हो, अच्छा हो 
21 : सम्यक कर्म : सही क्या, गलत क्या, इसका निर्णय कैसे हो? 
20 : सम्यक वचन : वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के स्तर का पता चलता है 
19 : सम्यक ज्ञान, हम जब समाज का हित सोचते हैं, स्वयं का हित स्वत: होने लगता है 
18 : बुद्ध बताते हैं, दु:ख से छुटकारा पाने का सही मार्ग क्या है 
17 : बुद्ध त्याग का तीसरे आर्य-सत्य के रूप में परिचय क्यों कराते हैं? 
16 : प्रश्न है, सदियाँ बीत जाने के बाद भी बुद्ध एक ही क्यों हुए भला? 
15 : धर्म-पालन की तृष्णा भी कैसे दु:ख का कारण बन सकती है? 
14 : “अपने प्रकाशक खुद बनो”, बुद्ध के इस कथन का अर्थ क्या है? 
13 : बुद्ध की दृष्टि में दु:ख क्या है और आर्यसत्य कौन से हैं? 
12 : वैशाख पूर्णिमा, बुद्ध का पुनर्जन्म और धर्मचक्रप्रवर्तन 
11 : सिद्धार्थ के बुद्ध हो जाने की यात्रा की भूमिका कैसे तैयार हुई? 
10 :विवादित होने पर भी चार्वाक दर्शन लोकप्रिय क्यों रहा है? 
9 : दर्शन हमें परिवर्तन की राह दिखाता है, विश्वरथ से विश्वामित्र हो जाने की! 
8 : यह वैश्विक महामारी कोरोना हमें किस ‘दर्शन’ से साक्षात् करा रही है?  
7 : ज्ञान हमें दुःख से, भय से मुक्ति दिलाता है, जानें कैसे? 
6 : स्वयं को जानना है तो वेद को जानें, वे समस्त ज्ञान का स्रोत है 
5 : आचार्य चार्वाक के मत का दूसरा नाम ‘लोकायत’ क्यों पड़ा? 
4 : चार्वाक हमें भूत-भविष्य के बोझ से मुक्त करना चाहते हैं, पर क्या हम हो पाए हैं? 
3 : ‘चारु-वाक्’…औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होए! 
2 : परम् ब्रह्म को जानने, प्राप्त करने का क्रम कैसे शुरू हुआ होगा? 
1 : भारतीय दर्शन की उत्पत्ति कैसे हुई होगी?

 

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