टीम डायरी, 15/7/2021
उस ज़माने में ओडिशा या उत्कल प्रदेश के राजा हुआ करते थे इन्द्रद्युम्न। भगवान नीलमाधव, यानि श्रीहरि, श्रीकृष्ण के भक्त थे। कहते हैं, उन्हें एक रोज भगवान ने स्पप्न में आकर कहा, ‘समुद्र में लकड़ी का बड़ा लट्ठा द्वारका से बहकर तुम्हारी राजधानी की तरफ़ आ रहा है। तुम उसे मँगवा लो। उससे मेरी मूर्तियाँ बनवाकर मन्दिर में स्थापित करो।” भगवान के आदेश पर राजा ने अपने सैनिकों, सेवकों को समुद्र किनारे भेजा। वहाँ सच में एक लकड़ी का बड़ा लट्ठा उन्हें समुद्र में तैरता हुआ दिखाई दिया। उसे किसी तरह आदिवासियों की मदद से वे उठाकर राजप्रासाद तक लाए।
इसके बाद अब बारी भगवान के विग्रह को गढ़ने की आई। राजा ने स्वप्न में देखे हरिविग्रह के बारे में बड़े-बड़े मूर्तिकारों को बताया। लेकिन वे मूर्ति गढ़ने की बात तो दूर लकड़ी के उस लट्ठे पर आरी, छेनी, हथौड़ी तक न चला सके। वातावरण में निराशा छा रही थी। तभी वहाँ एक बूढ़े कारीगर आए। उन्होंने दावा किया कि वह हरिविग्रह काे गढ़ सकते हैं। लेकिन शर्त रखी कि इस काम में उन्हें 21 दिन लगेंगे। इस दौरान वह पूरे समय मन्दिर के भीतर बन्द रहेंगे। अपना काम करते रहेंगे। उनके काम में कोई भी व्यवधान नहीं डालेगा। राजा ने शर्त तुरन्त मंज़ूर कर ली।
काम शुरू हो गया। लेकिन कहते हैं, महारानी को अधीरता और उत्सुकता बहुत थी। इसलिए वे अक़्सर ही मन्दिर के बाहर दरवाज़े पर कान लगाकर छैनी-हथौड़ी चलने की आवाज़ें सुन आया करती थीं। इस तसल्ली के लिए काम चल रहा है या नहीं। इसी क्रम के दौरान एक दिन उन्हें भीतर से कोई आवाज़ नहीं आई। उनका मन घबराया और वे दौड़ी-भागी राजा के पास जा पहुँचीं। उन्हें पूरी ख़बर दी तो राजा भी आशंकित हुए कि कहीं बुज़ुर्ग कारीगर को कुछ हो तो नहीं गया है। वे आख़िर इतने दिनों से मन्दिर में बन्द हैं। ऐसे में, कुछ भी हाेनी-अनहोनी सम्भव है।
आशंकित राजा-रानी, उनके अनुचर आदि आनन-फानन में मन्दिर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर एक क्षण रुके कि दरवाज़ा खोला जाए या नहीं। फिर आख़िरकार खोल ही दिया गया। लेकिन भीतर क्या देखते हैं? उनकी आँखों के सामने से पलक झपकते ही बुज़ुर्ग कारीगर अदृश्य हो जाते हैं। वे देवलोक के शिल्पकार विश्वकर्मा थे, ऐसा कहा जाता है। उनके जाने के बाद भगवान जगन्नाथ नीलमाधव, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के विग्रह वहीं पीछे कार्यस्थल पर रह जाते हैं। लेकिन आधे-अधूरे। ऐसे कि अब उन विग्रहों को कोई और पूरा कर नहीं सकता था। राजा मन मसोस कर रह गए। ईश्वर की इच्छा मानकर उनके इसी स्वरूप को उन्होंने पूरे विधि-विधान से मन्दिर में स्थापित करा दिया। और तब से भगवान के उन्हीं विग्रहों की उसी अवस्था में पूजा होती आ रही है।
—
इस कहानी के आगे पीछे और भी बहुत-कुछ कहा-सुना जाता है। लेकिन इस छोटे प्रसंग से हमारे लिए जो सबक निकलता है, वह अचूक और अद्भुत है। सबक ये कि अधीरता अक्सर हमारे सामने हमेशा के लिए अधूरापन छोड़ जाती है। इसीलिए बड़े-बुज़ुर्ग धैर्य और संयम की अहमियत बताते हुए कह गए हैं, “धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय, माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।” भगवान जगन्नाथ की पुरी में इन दिनों रथयात्रा का महोत्सव चल रहा है। धार्मिक रस्म-ओ-रिवाज़ के तहत मुख्य मन्दिर से भगवान के विग्रह 12 जुलाई को ही पास के गुंडीचा मन्दिर ले जाए गए हैं। वहाँ से नौवें दिन यानि 21 जुलाई को वापस उन्हें मुख्य मन्दिर लाया जाएगा। सो, भगवान से जुड़े इस बड़े आयोजन-अवसर पर हम इंसान उनके कथा-प्रसंग के इस छोटे रोचक-सोचक सन्दर्भ से कुछ पुख़्ता, कुछ पूर्ण हासिल कर सकें तो कितना अच्छा हो।
मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More
लिंक्डइन के जरिए नौकरी का जाल बिछाकर, रोजगार की तलाश कर रहे लोगों को काम… Read More
देश की एक जानी-मानी ‘पत्रकार’ ने ऑनलाइन पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए कह दिया कि… Read More
अभी एक-दो दिन से मीडिया-सोशल मीडिया में यह बहस चल रही है कि हम भारतीयों… Read More
एक नया अध्ययन हुआ है। इसमें भारत और उसके आस-पास के देशों में लगातार बढ़ती… Read More
खुशी पाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। ज्यादातर लोग अमूमन बड़ी से बड़ी नौकरी… Read More