बीजापुर का सुल्तान सनकी, क्रूर और व्यभिचारी था।
बाबा साहब पुरन्दरे द्वारा लिखित और ‘महाराज’ शीर्षक से हिन्दी में प्रकाशित पुस्तक से
लखुजी और शहाजी (श्वसुर-दामाद) में सदा के लिए मनमुटाव हो गया। वे एक-दूसरे के बैरी हो गए। लेकिन शहाजी राजे और जिजाऊ साहब में पहले जैसा ही प्यार रहा। उनके हृदय एकरूप रहे। शहाजी राजे के पराक्रम चढ़ते सूरज की तरह दीप्तिमान थे। भातवड़ी में निजामशाही फौज की दिल्ली की मुगलिया तथा बीजापुर की आदिलशाही फौज से मुठभेड़ हुई। घनघोर युद्ध हुआ। इसमें जान की बाजी लगाकर शाहाजी राजे ने निमाजशाह को जीत दिलाई। राजे के सगे भाई शरीफ राजे इसी युद्ध में काम आए। दो बादशाहियों को पराभूत करने की ताकत मराठों की कलाई में थी। फिर भी खुद स्वतंत्र राजा होने की आकांक्षा अभी उनके दिल में अंकुरित नहीं हुई थी।
लड़ाईयाँ तो होती ही रहती थीं महाराष्ट्र में। एक सुल्तान दूसरे सुल्तान से लोहा ले रहे थे और इस हो-हल्ले में मराठों की घर-गिरस्ती की ख्वाम-ख्वाह बलि चढ़ रही थी। गोमन्तक (आज का गोवा) में फिरंगी पोर्तुगीझ (पुर्तगाली) आ चुके थे। वे धर्म के नाम पर कहर बरपा रहे थे। गरीब की चीख-पुकार सुननेवाला कहीं कोई नहीं था। ऐसी विपरीत स्थिति में भी महाराष्ट्र के विद्वान् ब्राह्मण छोटी-छोटी बातों के लिए वितंडवाद खड़ा करते। क्षत्रियों की तलवारें अपनों के लहू से रंग जातीं। गरीब लोग बिना वजह कीड़े-मकोड़ों की तरह मसल दिए जाते।
निजामशाह की तरफ से शहाजी राजे मराठवाड़ा में मुगलों से जूझ रहे थे। लड़ाइयों का दौर कभी-कभार ही रुकता। ऐसे में ही, जिजाऊ साहब के पाँव फिर से भारी हो गए। धरम-करम और दान-धर्म में उनकी रुचि थी। उनकी ठीक तरह से देखभाल करने के लिए शहाजी राजे ने बुजुगों को कोठी में रखा हुआ था। जिजाऊ साहब का मायका तो अब बिछड़ ही चुका था। सो इस नाजुक अवस्था में वह जिद करतीं, रूठ जातीं, कुछ माँगती तो सिर्फ भवानी देवी से ही।
लेकिन इस बार जिजाऊ साहब के दोहद (अपेक्षाएँ) कुछ अलग ही किस्म के थे। उन्हें अनार, मिठाई, इत्र-फुलेल या शरबत, इनमें से कुछ भी नहीं चाहिए था। चाँदनी में घूमने का उनका मन नहीं होता था। इस बार उनका मन करता कि पहाड़ी किलों पर चढ़ें। हाथी पर बैठेंं। राजछत्र, चँवर के नीचे बैठकर खूब दान-धर्म करें। ऐसे दोहद शायद सुभद्रा के, पार्वती जी के या कौशल्या जी के ही होंगे। पथरीला शिवनेरी (किला) जिजाऊ साहब के पदसंचार से फूल सा कोमल हो उठा। उनके अनोखे दोहद देख उसका रोम-रोम खिलने लगा। ममता भरे आशीष देने लगा कि इस सात्विक क्षत्राणी के भी अभिमन्यु कार्तिकेय या प्रभु रामचन्द्र की तरह पराक्रमी बालक हो।
उधर, सुल्तान क्रूर भी कम नहीं थे। इन सुल्तानों की नजरों में कौन, कब गिर जाएगा, किस वफादार नौकर की शामत आएगी, यह खुदा भी नहीं बता सकता था। सुल्तानों के मन और कारोबार की रीति-नीति का कोई भरोसा नहीं था। निजामशाह ने दौलताबाद (देवगिरि) को राजधानी का दर्जा दिया था। वहीं निजाम की सेवा में एक बहुत रुतबेवाला सरदार था। नाम था हमीद खान। उसकी बीवी के कारण उसे सरदारी बख्शी गई थी। इस खान ने सुल्तान से कहा, “यह जाधवराव दगाबाज है। बेईमान है। इसकी गर्दन उतार दो।” खान ने कहा और सुल्तान ने मान लिया।
उस वक्त लखुजी जाधवराव का डेरा देवगिरि के करीब, कुतलघ हौज के पास था। लखुजी राजे और उनके पुत्र अचलोजी, रघोजी और यशवंत राव एक दिन सुल्तान को आदाब बजाने के लिए किले में गए। सुल्तान तैयार बैठा था। दरबार में हमीद खान, फराद खान, मुख्त खान, सफदर खान, मोती खान, वगैरा सरदार मौजूद थे। जाधवराव पिता-पुत्र कुर्निस्तान (आदाब) करने नीचे झुके और सुल्तान अचानक उठकर दरबार से चला गया। यही वह इशारा था। अब जैसे ही जाधवराव लौटने लगे, सरदारों ने उन्हें घेर लिया। सभी उन पर टूट पड़े। बेहरमी से उन पर तलवारें चलाने लगे। कुछ ही क्षणों में लहू से लथपथ चार जाधवरावों की लाशें नीचे गिर गईं। वह श्रावण की पूनम थी। दिनांक 25 जुलाई 1629 की। महज मन की सनक और सुल्तान ने जिजाऊ साहब का मायका उजाड़ डाला।
निजामशाह ने जिजाऊ साहब के पिता और तीन भाइयों को मौत के घाट उतारा था। दुःख और सन्ताप से उनका कलेजा सुलग उठा। निजामशाह की दगाबाजी से शहाजी राजे भी भड़क उठे थे। उन्होंने उसकी नौकरी छोड़ दी। जल्दी ही वे पुणे आए। पुणे का इलाका बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की सल्तनत में आता था। उस इलाके पर शहाजी राजे ने धावा बोला और उसे अपने कब्जे में ले लिया। अपनी पुणे जागीर का शासन अब वे स्वतंत्र रूप से करने लगे। इसी समय शहाजी राजे के चचेरे भाई खेलोजी राजे भोसले की पत्नी गोदावरी में स्नान करने गई। तभी मुगल सरदार महावत खान मौका देखकर उन्हें जबर्दस्ती उठा ले गया। जिजाऊ साहब की जेठानी का यह हाल था। फिर गरीब के घर पैदा हुई सुन्दर लड़कियों का तो खुदा ही रखवाला था।
सुल्तान विषयासक्त भी थे। ये सुल्तान कभी किसी को मालामाल कर देते तो कभी मटियामेट। महाराष्ट्र में हजारों जिजाऊ अपने माँ-बाप के लिए भाई-भावजों के लिए बिलख रही थीं। सुन्दर औरतें बदकिस्मती पर रो रही थीं। सूरमाओं की माँ- बहनें, अपमान, अत्याचार, जुल्म-जबर्दस्ती की शिकार हो रही थीं। महाराष्ट्र ऐसी ज़िन्दगी जी रहा था।
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(नोट : यह श्रृंखला #अपनीडिजिटलडायरी पर डायरी के विशिष्ट सरोकारों के तहत प्रकाशित की जा रही है। छत्रपति शिवाजी के जीवन पर ‘जाणता राजा’ जैसा मशहूर नाटक लिखने और निर्देशित करने वाले महाराष्ट्र के विख्यात नाटककार, इतिहासकार बाबा साहब पुरन्दरे ने एक किताब भी लिखी है। हिन्दी में ‘महाराज’ के नाम से प्रकाशित इस क़िताब में छत्रपति शिवाजी के जीवन-चरित्र को उकेरतीं छोटी-छोटी कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उसी पुस्तक से ली गईं हैं। इन्हें श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करने का उद्देश्य सिर्फ़ इतना है कि पुरन्दरे जी ने जीवनभर शिवाजी महाराज के जीवन-चरित्र को सामने लाने का जो अथक प्रयास किया, उसकी कुछ जानकारी #अपनीडिजिटलडायरी के पाठकों तक भी पहुँचे। इस सामग्री पर #अपनीडिजिटलडायरी किसी तरह के कॉपीराइट का दावा नहीं करती। इससे सम्बन्धित सभी अधिकार बाबा साहब पुरन्दरे और उनके द्वारा प्राधिकृत लोगों के पास सुरक्षित हैं।)
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शिवाजी ‘महाराज’ श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ
5- शिवाजी ‘महाराज’ : …जब एक हाथी के कारण रिश्तों में कभी न पटने वाली दरार आ गई
4- शिवाजी ‘महाराज’ : मराठाओं को ख्याल भी नहीं था कि उनकी बगावत से सल्तनतें ढह जाएँगी
3- शिवाजी ‘महाराज’ : महज पखवाड़े भर की लड़ाई और मराठों का सूरमा राजा, पठाणों का मातहत हुआ
2- शिवाजी ‘महाराज’ : आक्रान्ताओं से पहले….. दुग्धधवल चाँदनी में नहाती थी महाराष्ट्र की राज्यश्री!
1- शिवाजी ‘महाराज’ : किहाँ किहाँ का प्रथम मधुर स्वर….
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