‘मायावी अम्बा और शैतान’ : इत्तिफाक पर कमजोर सोच वाले लोग भरोसा करते हैं

ऋचा लखेड़ा, वरिष्ठ लेखक, दिल्ली

“आपके सुझाव में आरोप है, जो बेबुनियाद भी है।” इस बात पर वजन देने के लिए उसने अपनी बंदूक खींच ली। “लेकिन सोचिए कि आप वापस लौटे और वहाँ जाकर यहाँ की कारोबारी संभावनाओं के बारे में भ्रांतियाँ फैलाईं, भय का माहौल बनाया तो? आपको इसकी इजाजत नहीं दी जा सकती।”

“मतलब तुम कह रहे हो कि मैं अब कैद में ही रहूँगा? लेकिन किन आरोपों में भला?”

“अरे, हमें इतना नीचे गिरने की जरूरत नहीं है। हम आम मुद्दों को सामने रखेंगे। जैसे- आपको यहाँ आपकी हिफाजत के लिए कैद किया गया। क्योंकि आप सोच भी नहीं सकते कि अगर स्थानीय जंगली हबीशियों ने आपको, एक सरकारी नुमाइंदे को पकड़ लिया, तो वे उसका क्या हाल करेंगे। इसलिए हमने आपकी सुरक्षा के लिए आपको यहाँ कैद किया।”

“तुम सिरफिरे हो।”

“सिरफिरा! सच में? जनाब नाथन, मैं वो हूँ जो इस जमीन से दाग-धब्बे हटा रहा है। ये हबीश आदिवासी, ये गंदे कीड़े, ये बेहतरी के लिए की गई हमारी हर कोशिश पर लगी दीमक की तरह हैं।”

“और यह सब तुम किसलिए कर रहे हो? यहाँ की जमीन में दबे स्वर्ण-भंडार के लिए न?

“सिर्फ स्वणँ-भंडार के लिए? यह बात उन कारोबारियों से कहो, जो यहाँ से थोड़ा-थोड़ा सोना निकालने के बजाय अपनी गाड़ियों में ढेर-ढेर भरकर स्वर्ण ले जाने को बेचैन हैं। आप जानते हैं, हम यहाँ से किस राजस्व पर ध्यान दे रहे हैं? इस इलाके में मौजूद कारोबारी संभावनाओं के कारण पूरे क्षेत्र में इन दिनों कारोबारियों की बा़ढ़ आ गई है। नीचे घाटी में मौजूद सभी होटल अपनी क्षमता से ज्यादा भरे हुए हैं। हर कोई यहाँ आने को बेकरार है। लोग सरकार के भीतर पुरानी-पुरानी जान-पहचान निकालने कोशिश में लगे हैं ताकि होरी पर्वतों की छाती में कुदाल चलाने का लाइसेंस हासिल कर सकें। यहाँ बड़े दफ्तर खुल रहे हैं, जिससे दावों का निपटारा और खनन अधिकारों का हस्तांतरण यहीं, मौके पर किया जा सके। बड़े कारोबारियों से अधिकार-पत्र लेकर कई मध्यस्थों ने भी यहाँ कार्यालय खोल लिए हैं। कई और खुलने वाले हैं। यह सब तो पता ही होगा आपको। तो सोचिए, यह जगह हमेशा के लिए कितनी बदलने वाली है। यह इलाका बड़ा औद्योगिक केंद्र बनने वाला है।”

“और इस सबमें उन गरीब आदिवासियों की कोई हिस्सेदारी नहीं होगी? उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिलेगा? यहाँ तक कि उन गरीबों से कोई पूछेगा भी नहीं कि आखिर वे चाहते क्या हैं?”

“तो आपको क्या लगता है, हम उनके चौड़े सीनों में लगे घावों पर मरहम लगाने वाले हैं कोई? हम… हम बंदूक हैं, हम सैनिक हैं। सुना आपने? इसमें आप भी हमारे हिस्सेदार हो सकते हैं। ज्यादा दिन नहीं बचे हैं, जब आपको सेवानिवृत्ति दे दी जाएगी। इसके बाद आप मामूली सी पेंशन लेकर किसी वृद्धाश्रम में पड़े रहेंगे। इसलिए बेहतर है कि आप भी इसमें शामिल हो जाएँ। यहाँ हर घंटे नया कारोबार शुरू हो रहा है। नए प्रतिष्ठान खुल रहे हैं। इस पर्वत की कोख में बेशुमार सोना है। उसकी अनुमानित कीमत भी आप सुन लें तो दिमाग चकरा जाएगा। असल कीमत का तो अब तक अंदाजा भी नहीं लगाया जा सका है। आप क्या सोचते हैं, इतने बड़े खजाने को हम इन जंगली हबीशों के भरोसे छोड़ दें?”

“यानी ये हबीशी जाएँ भाड़ में और उनके अधिकार भी! है न?”

“उनके अधिकार? अधिकार सभ्य समुदाय के हुआ करते हैं, ऐसे जंगलियों के नहीं। हम यहाँ किन्हीं सभ्य, सम्मानित लोगों से नहीं निपट रहे हैं, जो किसी महान् संस्कृति के वाहक हों। मेरी बात मानिए, नाथन साहब। आप भी हमसे हाथ मिल लीजिए। हमसे मिल जाइए।”

“मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ, पागल इंसान। तुम्हें कभी इन लोगों को यहाँ से खदेड़ने की इजाजत नहीं मिलेगी।”

“इजाजत? वह चाहिए किसे है? और इस इजाजत की हैसियत भी कितनी है? कोकीन से भरे गैलन में मक्खी के बराबर? इस जंगली इलाके का राजा मैं हूँ। मैं ही यहाँ का भगवान हूँ। यहाँ मैं जो चाहूँगा, वह करूँगा।” 

इसी बीच, मैडबुल कुछ सोचते हुए अपनी अँगुलियों पर हिसाब-किताब लगाने लगा। फिर किसी कवि की तरह उसने अतिरंजना और लोकोक्तियों के साथ बोलना शुरू कर दिया। उसकी बातों का अर्थ गंभीर प्रतीत हो रहा था लेकिन उसमें स्पष्टता नहीं थी। उसने कहा, “जिस व्यक्ति की याददाश्त ठीक नहीं, वह दूरदर्शी भी नहीं होता।” और “जो इंसान दोनों हाथ से बंदूक पकड़ता है, वह मूर्ख होता है।” इसके अलावा “कैसे एक बड़े पेड़ में हमेशा कुछ मृत शाखाएँ होती ही हैं।” मैडबुल की इन बातों का न कोई संदर्भ था और न ही वे आपस में जुड़ रही थीं। नाथन भी दिमाग पर पूरा जोर डालने के बावजूद इन बातों को समझ नहीं पा रहा था। सिवाय इतने के कि मैडबुल अब पूरी तरह मानसिक विक्षिप्तता की हालत में पहुँच गया है। इस हालत में वह अपने किसी काम के लिए जिम्मेदार नहीं होगा। वह ज्यादा खतरनाक हो गया था।

“देखो, मुझे ऊपर अपनी रिपोर्ट देनी है। नहीं दी, तो नई जाँच बैठ जाएगी।” नाथन समझ गया था कि मानसिक तौर पर विक्षिप्त मैडबुल से अब कोई भी बात करना बेकार है। इसलिए उसने अपना आखिरी मंतव्य बताया।

“आप मथेरा से तो मिले ही होंगे? उसे आस-पास ही देखा होगा आपने। उसे देखकर क्या आपको ये नहीं लगा कि वह कितना खूँख्वार आदमी होगा? ऐसा, जिसे किसी के हलक में हाथ डालकर आँतें खींच लेने में आनंद आता हो? जो अपने शिकार के गुप्तांगों को काटकर कुत्तों के सामने फेंक देता हो, खाने के लिए? अपने शिकार के अंदरूनी अंगों को भूनकर खुद भी खा लेने का आनंद लेता हो? और मेरी पूरी बात सुनिए। पता चला है कि मथेरा अकेला नहीं है। उसका एक भाई भी इसी विभाग में है – ”

“क्या इत्तिफाक है!”

“इत्तिफाक पर कमजोर सोच वाले लोग भरोसा करते हैं, जनाब। आपको पता है, आपकी यहाँ मौजूदगी के बारे में किसी को भी पता नहीं है, ऐसा मथेरा ने मुझे बताया। यानी अगर कोई आपको ढूँढना चाहे, आपसे मिलना चाहे, तो भी वह यहाँ नहीं आएगा। अव्वल तो किसी को पता ही नहीं चलेगा कि आपको ढूँढें कहाँ। और मान लीजिए कि कोई आपको ढूँढते हुए यहाँ तक आ भी गया, तो उसे मालूम पड़ेगा कि इस इलाके के लोग गुस्से में बेकाबू हो जाते हैं। अपना गुस्सा सरकारी अधिकारियों पर निकालते हैं। उन्हें जिंदा नहीं छोड़ते। यानी, कर्नल मैडबुल और उसकी फौज को कोई भी जिम्मेदार नहीं ठहराने वाला।”

मैडबुल अब घुटनों के बल नीचे बैठ गया था। उसने एक जगह से मास्टर चाबियों का गुच्छा निकाला और बोला, “तो अब बताइए नाथन साहब, क्या हम आपकी तरफ से सेना के जनरल को पत्र लिखें? जिसमें हबीशियों के खतरे के बारे में बताया जाए? और यह भी लिखा हो कि उन आदिवासियों ने कैसे आप पर हमला किया?”

“मैं ऐसा कुछ नहीं लिखने वाला।”

“अरे, आपको कहाँ कुछ लिखना है। हमने सब लिख रखा है। बस, उस पर आपकी मुहर लगाने की जरूररत है।”

“इस झूठ पर कोई भरोसा नहीं करेगा।”

“कुछ समय के लिए तो कर ही लिया जाएगा। आप सरकारी अफसरों की बेवकूफी को कम समझते हैं क्या? इसके अलावा सच्चाई का तथ्यों से ज्यादा लेना-देना नहीं होता। यह तो आम सहमति का मामला है।”

वह अब किसी पुराने योद्धा की तरह लग रहा था। दुश्मन से नफरत करने वाला मौत का दूत। तिस पर वह मनोविकारी तो था ही, जिसके साथ हत्यारों की भरी-पूरी फौज थी।

“और अगर आप रहस्य की बात जानना ही चाहते हैं तो सुनिए —”, मैडबुल ने नाथन के करीब आकर कहा।

“यह बहुत आसान है। ‘रैड हाउंड्स” को सभ्य और अनुशासित देखने के लिए आपको बस एक काम करना होगा। इन रंगरूटों को अनुमति देनी होगी कि वे यहाँ के जंगली आदिवासियों को मारकर खत्म कर दें। जितनी अधिक हत्याएँ कर सकते हों, करें। ये जितनी ज्यादा हत्याएँ करेंगे, उतने सुलझते जाएँगे।” 
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(नोट :  यह श्रृंखला एनडीटीवी की पत्रकार और लेखक ऋचा लखेड़ा की ‘प्रभात प्रकाशन’ से प्रकाशित पुस्तक ‘मायावी अंबा और शैतान’ पर आधारित है। इस पुस्तक में ऋचा ने हिन्दुस्तान के कई अन्दरूनी इलाक़ों में आज भी व्याप्त कुरीति ‘डायन’ प्रथा को प्रभावी तरीक़े से उकेरा है। ऐसे सामाजिक मसलों से #अपनीडिजिटलडायरी का सरोकार है। इसीलिए प्रकाशक से पूर्व अनुमति लेकर #‘डायरी’ पर यह श्रृंखला चलाई जा रही है। पुस्तक पर पूरा कॉपीराइट लेखक और प्रकाशक का है। इसे किसी भी रूप में इस्तेमाल करना कानूनी कार्यवाही को बुलावा दे सकता है।) 
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पुस्तक की पिछली 10 कड़ियाँ 

34- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : जो गैरजिम्मेदार, वह कमजोर कड़ी
33- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह वापस लौटेगी, डायनें बदला जरूर लेती हैं
32- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह अचरज में थी कि क्या उसकी मौत ऐसे होनी लिखी है?
31- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : अब वह खुद भैंस बन गई थी
30- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : खून और आस्था को कुरबानी चाहिए होती है 
29- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : मृतकों की आत्माएँ उनके आस-पास मँडराती रहती हैं
28 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : वह तब तक दौड़ती रही, जब तक उसका सिर…
27- ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : “तू…. ! तू बाहर कैसे आई चुड़ैल-” उसने इतना कहा और…
26 – ‘मायावी अम्बा और शैतान’ : कोई उन्माद बिना बुलाए, बिना इजाजत नहीं आता
25- ‘मायाबी अम्बा और शैतान’ : स्मृतियों के पुरातत्त्व का कोई क्रम नहीं होता!

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