‘मनी म्यूल’ यानि पैसे ढोने वाले गधे, देखिए कहीं कोई अपने आस-पास तो नहीं है!

टीम डायरी

इन दिनों भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) लगातार विभिन्न प्रचार माध्यमों से एक दिलचस्प विज्ञापन जारी कर रहा है। इसमें लिखा होता है-  ‘मत बनिए ‘मनी म्यूल’। मनी म्यूल के रूप में काम करना अपराध है।’ फिर तीन चेतावनियाँ दी जाती हैं। पहली- दूसरों को उनके धन के आवागमन के लिए अपने बैंक ख़ाते की संचालन कीअनुमति न दें। दूसरी – आपके बैंक ख़ाते के माध्यम से किसी दूसरे का धन प्राप्त करने या उसे आगे भेजने के लुभावने प्रस्ताव आपको जेल पहुँचा सकते हैं। और तीसरी- कभी किसी ऐसे व्यक्ति को अपने बैंक ख़ाते का विवरण न दें, जिसे आप जानते न हों या जिस पर आपको विश्वास न हो। 

नीचे वह विज्ञापन दिया गया है, जो आरबीआई अपने जागरुकता अभियान के तहत लगातार प्रसारित कर रहा है। देखा जा सकता है।

इस विज्ञापन को देखने के बाद विस्तार से यह जानने में कई लोगों की दिलचस्पी हो सकती है कि आख़िर ये ‘मनी म्यूल’ यानि पैसे ढोने वाले गधे कौन लोग होते हैं? तो इस बारे में कुछ वित्तीय संस्थानों की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी बताती है कि ‘मनी म्यूल’ एक ऐसा व्यक्ति होता है, जो किसी अन्य व्यक्ति की ओर से भेजा गया धन अपने बैंक ख़ाते में लेता है। फिर उस धन को आगे किसी अन्य व्यक्ति के ख़ाते में हस्तान्तरित कर देता है। इसके बदले में उसे लिए-दिए गए धन का छोटा सा हिस्सा कमीशन के रूप में मिलता है। जैसे- ‘गधे का चारा’। 

हालाँकि यहाँ सवाल हो सकता है कि ऐसे व्यक्ति को ‘गधा या खच्चर’ ही क्यों कहा गया। तो वह इसलिए कि इस तरह से धन के हस्तान्तरण का ग़ैरकानूनी ज़रिया बनने वाले अधिकांश लोगों को पता ही नहीं होता कि वे वित्तीय धोखाधड़ी और विभिन्न तरीक़ों से की गई तस्करी से जुटाए गए अवैध धन को वैध करने का माध्यम बने हैं। काले धन को सफ़ेद कर रहे हैं। और तो और उन्हें ये भी नहीं पता होता कि पुलिस या आर्थिक अपराधों की जाँच करने वाली एजेंसियाँ जब ऐसे किसी मामले की पड़ताल करेंगी, तो वे पहले इन ‘पैसा ढोने वाले गधों’ को ही दबोचेंगी। 

वैसे, बताया तो यह भी जाता है कि इस तरह के धन्धे में लगे कुछ लोगों को यह जानकारी होती है कि वे अवैध धन को इधर से उधर पहुँचाने का माध्यम बन रहे हैं। लेकिन फिर भी वे कमीशन के रूप में बिना किसी मेहनत के, आसानी से मिलने वाले पैसों के लालच में हर तरफ़ से आँखें बन्द कर के यह धन्धा करते रहते हैं। अलबत्ता, कहलाते वे तब भी ‘गधे’ ही हैं क्योंकि वे जानते-बूझते आँख के अन्धे बने रहकर ऐसे कामों में लगे रहते हैं। 

जानकारी के मुताबिक, इस तरह का काम तीन चरणों में होता है। पहला- अपराधी प्रवृत्ति के लोग किसी माध्यम से ऐसे लोगों को अपने जाल में फँसाते हैं, जो उनके काले ‘धन को ढोने वाले गधे’ बनने के लिए तैयार हो जाएँ। उन्हें बैठे-बिठाए मिलने वाले कमीशन का लालच दिया जाता है। दूसरा- जब व्यक्ति राज़ी हो जाता है, तो अपराधी उसके ख़ाते में अपना पैसा हस्तान्तरित कर देते हैं। यह भी बताते हैं कि आगे किसके ख़ाते में पैसा भेजना है। फिर तीसरे चरण में वह व्यक्ति अपना कमीशन काटकर बाकी रक़म अगले व्यक्ति को हस्तान्तरित कर देता है। 

इस तरह एक, दो, या तीन गधों से होते हुए अपराधी की रकम वापस उसके ख़ाते में पहुँच जाती है, वह भी वैध होकर। अलबत्ता, इन तीन चरणों के बाद एक चौथा चरण भी होता है। कानून के शिकंजे का। जैसा कि पहले बताया, पुलिस या आर्थिक अपराधों की जाँच करने वाली एजेंसियाँ जब भी ऐसे किसी मामले की पड़ताल करती हैं, तो वे पहले इन ‘पैसा ढोने वाले गधों’ को ही दबोचती हैं। हालाँकि इनके चक्कर में कई बार असली अपराधी बच निकलते हैं, जो बड़ी चिन्ता की बात है। इसीलिए आरबीआई कहता है- ‘जानकार बनिए, सतर्क रहिए’।

लिहाज़ा देखिए, कि कहीं ‘पैसा ढोने वाला कोई गधा’ अपने आस-पास तो नहीं है। मिल जाए, तो उसे रोकिए। उसको बताइए, समझाइए कि वह अपने लिए तो ख़तरा मोल ले ही रहा है, देश की अर्थव्यवस्था में भी दीमक की तरह साबित हो रहा है। और अगर समझाने-बुझाने से भी वह न माने तो उसके बारे में पुलिस, आरबीआई, या जिस किसी भी जाँच एजेंसी को उचित समझें, उस तक सूचना पहुँचााइए। यह भी देशसेवा ही है।   

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Neelesh Dwivedi

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