मुंबई की लोकल, शहर की जीवन-रेखा कही जाती है।
विकास वशिष्ठ, मुंबई से
छूटने से ऐन पहले लोकल को किसी तरह दौड़ते-भागते पकड़ लेना, टूटती साँस की डोर को थाम लेने जैसा आभास कराता है। ये लक्ष्य तय करना और फिर उस लक्ष्य का पीछा करते हुए उसे हासिल करने के संतोष से उपजे सुकून तक पहुँचाता है। क्रिकेट मैच में लक्ष्य का पीछा करते हुए जीत की ख़ुशी अलग होती है। दर्शक भी उस लक्ष्य को हासिल किए जाने तक ही मैच से जुड़े रहते हैं। जैसे ही जीत का विकेट या रन मिला, रग़ों में दौड़ते लहू की रफ़्तार बदल जाती है। उधर विकेट या रन मिलता है और इधर दर्शक ख़ुश हो जाते हैं। लोकल को दौड़ते हुए पकड़ने वाले को भी दरवाज़े पर लटके लोग उसी आख़िरी गेंद की तरह देखते हैं, जिसके पिच पर गिरने से लेकर बल्ले को छूने के बीच के दरमियान ही ताज तय हो जाता है।
एक शख़्स स्टेशन पर दूर से दौड़ता हुआ आ रहा है। उसका लक्ष्य है, सात सत्तावन की गोरेगाँव पकड़ना। वह सात छप्पन पर टैक्सी से उतरता है। सोचता है कि बारिश के कारण सम्भव है कि ट्रेन एक मिनट की देरी से हो और इस एक मिनट का लाभ वह उठा ले। वह लक्ष्य का पीछा करता है। हाँफता हुआ प्लैटफ़ॉर्म पर पहुँचता है। घड़ी में सात सत्तावन हो चुके हैं। दूसरे प्लैटफ़ॉर्म पर बोरिवली वाली गाड़ी आ रही है। जैसे ही वो लगी, ये छूटी। मुंबई में एक लोकल के छूटने के साथ बहुत कुछ छूट जाता है। वह शख़्स अपनी रफ़्तार को बढ़ाता है। भीड़ को चीरते हुए ट्रेन के पहले सेकेंड क्लास डिब्बे तक पहुँचता है। ट्रेन खुल जाती है। उसकी नज़रों के सामने से निकलने लगती है। छूटने का ख़्याल उसे ट्रेन को पकड़ने के लिए उसकी ओर धकेलता है। आख़िरकार वह ट्रेन पकड़ लेता है। उसकी फूली हुई साँस को देखकर उसके अनजान सहयात्री भी संतोष से भर उठते हैं कि चलो मिल गई।
ये किसी काम के पूरा होने या पूरा करने की दिशा में बढ़ने वाले एक सफल कदम पर मिलने वाले संतोष सरीखा होता है। लोकल बहुत सारी चीज़ें सिखाती है। ज़िन्दगी के बहुत सारे फ़लसफ़े बताती है। कभी तय कीजिए अपने लिए किसी एक दिन का कोई लक्ष्य। फिर कीजिए उसका पीछा और दिन ढलने से पहले हासिल कीजिए अपने उस लक्ष्य को। कीजिए हर मुमकिन कोशिश। मैं दावे से कहता हूँ कि यह अलग क़िस्म का सुकून हासिल होगा।
वैसे, दौड़ते हुए पकड़ना ट्रेन को, हाँफते हुए बैठना सीट पर खिसकाकर दो लोगों को और फिर छोड़ना फूलती साँस को बाहर, चढ़ती उम्र का भी एहसास कराता है। दरअसल, बहुत क्रूर है ये लोकल। तोड़ देती है इंसान का हर भरम। समान है इसमें दुनिया का हर धरम।
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(नोट : विकास मुम्बई में एक एक निजी कम्पनी में काम करते हैं। लिखने-पढ़ने में ख़ासी रुचि है। एक उपन्यास भी लिख चुके हैं।)
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