प्रकृति की विनाश-लीला अस्ल में हमारी विकास-लीला का ज़वाब है, चेत जाइए!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

आज, 11 जुलाई को पूरी दुनिया में ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ मनाया गया। भारत में इस बार यह अवसर दो अर्थों में ख़ास रहा। पहला- इसलिए कि अभी कुछ समय पहले ही भारत दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश बना। और दूसरा- इसलिए कि ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ के एक दिन पहले ही हिमाचल में प्रकृति ने अपनी ‘विनाश-लीला’ का प्रदर्शन किया है। अब जो समझदार हैं, वे समझ चुके होंगे कि इन दोनों ही बातों का आपस में सम्बन्ध है। और जो नहीं समझे, उन्हें 11 जुलाई के अख़बारों और मीडिया के अन्य माध्यमों ने विस्तार से समझाने की कोशिश की।

मीडिया के माध्यमों ने पहले तो प्रकृति की ‘विनाश-लीला’ का ख़ाका खींचा। इसमें बताया कि हिमाचल के कुल्लू, मनाली, मंडी जैसे इलाक़ों में बादल फटने के बाद ब्यास नदी में आई बाढ़ से जैसी तबाही हुई, वैसी क़रीब 100 पहले हुई थी। विकास के नाम पर हम इंसानों ने इतने सालों में बड़ी-बड़ी कोठियाँ, होटल, सड़कें, पुल वग़ैरा जो खड़े किए थे, वे सब देखते ही देखते सूखे पत्तों की तरह ढह गए। बह गए।

फिर, इन्हीं ख़बरों में याद दिलाया गया कि 2021 में इसी मौसम में उत्तराखंड की ऋषिगंगा नदी में बाढ़ आई थी। यह बाढ़ रेणी और तपोवन इलाक़ों में दो बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को मिट्‌टी में मिला गई थी। अन्य जो जन-धन हानि हुई, वह अलग। साल 2021 में हिमाचल के किन्नौर की सांगला घाटी में इसी तरह की बाढ़ आई थी। जबकि 2018 में केरल को बीती एक सदी की सबसे भीषण बाढ़ ने लपेटे में लिया था।

यही नहीं, साल 2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ में जो इसी तरह की तबाई मची थी, उसे भी याद दिलाया गया। इन हादसों में हजारों लोग मारे गए। क़रीब 5,000 लोग तो केदारनाथ हादसे में मारे गए थे। हालाँकि जो लोग ऊँची तरक़्क़ी के लिए ‘विकास-लीला’ के पक्षधर हैं, वे इंसानों की ज़िन्दगियों को तो गिनते नहीं। साे, उन्हें भी इन ख़बरों में आंकड़े दिए गए। बताया गया कि यही कोई 313 अरब रुपए (3.8 अरब डॉलर) की सम्पत्ति को सिर्फ केदारनाथ हादसे में ही पानी में बह गई। बाकी ऐसे सभी हादसों में हुई धन-हानि को जोड़ें तो वह लाखों करोड़ रुपए तक होगी।

फिर लगातार बढ़ती आबादी से पैदा होने वाले ख़तरों की तस्वीर भी सामने रखी गई। बताया गया कि इस आबादी ने धरती से इतना पानी खींच लिया है कि वह अपनी धुरी से खिसक गई है। इससे उसका सन्तुलन गड़बड़ा गया है। यही स्थिति रही तो अगले कुछेक सालों में धरती पर खड़े तमाम बुनियादे ढाँचों की नींव भी हिल जाने वाली है। यह भी बताया गया कि साल 2050 तक भारत की ही 12 नदियों को अपने आस-पास बसे 120 करोड़ लोगों का बोझ अपने कन्धों पर उठाना होगा। इसमें से 70 करोड़ लोग तो सिर्फ़ गंगा नदी पर ही निर्भर हो जाएँगे।

ये भी कि बढ़ती आबादी वातावरण में, पर्यावरण में प्रदूषण का बड़ा कारण बन रही है। इससे भारत दुनिया का आठवाँ सबसे प्रदूषित देश हो चुका है। भारत में दुनिया की 18 फ़ीसद आबादी है। लेकिन यहाँ इस आबादी के लिए दुनिया की कुल ज़मीन का महज 2.4 प्रतिशत ही है। जबकि पानी सिर्फ चार फ़ीसदी। और नतीज़ा ये भी कि प्रकृति हमें सालभर इस्तेमाल करने को जो संसाधन देती है, वे इस आबादी के लिए महज़ छह महीनों के लिए ही होते है।

मतलब कुल मिलाकर मामला ये कि हमारा ‘विकास’ किसी भी रूप में हो, आबादी या फिर भौतिक संसाधन जुटाने के लिहाज़ से, हम धरती पर, प्रकृति पर बोझ ही बन रहे हैं। या कहें कि बन चुके हैं। सो, प्रकृति भी हमारी इस ‘विकास-लीला’ का ज़वाब अपनी ‘विनाश-लीला’ से देने लगी है। और अगर हम चेते नहीं, प्रकृति की चेतावनी को माना नहीं, तो यह ‘विनाश-लीला’ दिन-ब-दिन, साल-दर-साल और भीषण, भयावह होने वाली है। सँभल जाइए, या ज़मींदोज़ होने के लिए तैयार रहिए। दिन गिनते रहिए…. ‘काल हमारी बार’।

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