अंग्रेजों ने ज़मीन और खेती से जुड़े जो नवाचार किए, उसके नुकसान क्या हुए?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 9/9/2021

ब्रिटिश सरकार ने ज़मीन से संबंधित जो कानून बनाए उनका पहला उद्देश्य था कि मालिक़ाना हक़ की स्थिति परिभाषित की जाए। राजस्व संग्रह बेहतर करने के लिए यह ज़रूरी था। लेकिन लगान के ऊँचे आकलन ने ग्रामीण इलाकों में लोगों की आर्थिक स्थिति को झिंझोड़ डाला। ज़मीन के मामलों से जुड़ीं दो अलग-अलग प्रणालियों- ज़मींदारी और रैयतवाड़ी ने सामाजिक अव्यवस्था की स्थिति भी पैदा कर दी। ख़ासकर, जिन इलाकों में ज़मींदारी सिद्धांत के आधार पर ‘स्थायी बंदोबस्त’ लागू था, वहाँ गैर-ग्रामीण ज़मींदारों की तादाद बढ़ गई। वे गाँवों के बजाय दूसरी जगहों, शहरों आदि में रहते थे। ज़मीनों से मुनाफ़ा वसूली उनका मुख्य मक़सद था। इससे कृषक और ज़मींदार के बीच पहले से बना विशिष्ट रिश्ता दरकने लगा। किसानों को लाभ होने के बज़ाय भूमिहीन मज़दूर वर्ग की तादाद बढ़ने लगी। 

ब्रिटिश सरकार ने 19वीं सदी के उत्तरार्ध तक भी भारत में कृषि और सिंचाई की स्थिति सुधारने के विशेष प्रयास नहीं किए। बस, कंपनी की माली हालत के हिसाब से पहले से मौज़ूद सिंचाई प्रणालियों की साफ-सफाई और नवीनीकरण के कुछ काम ही किए। सरकार ने नदियों पर कुछ बड़े तटबंध भी बनवाए। मक़सद था कि नदियों का पानी बारिश में निचले इलाकों में न भरे। उत्तर भारत में यह काम 1820 और दक्षिण में 1834 में शुरू हुआ। लेकिन इसका नतीज़ा भी उल्टा हो गया। कई इलाकों में ज़मीन के नीचे का जलस्तर ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ने से नमक की मात्रा बढ़ गई। इससे ज़मीन की उर्वरता नष्ट होने लगी। साथ ही रुके पानी में मच्छर पैदा होने से मलेरिया की बीमारी फैलने लगी। 

कृषि क्षेत्र में कंपनी के नवाचारों से भी दिक्क़त हुई। इसके तहत कई क्षेत्रों में ऐसी फ़सलें लगवाई गईं थी, जो व्यावसायिक तौर पर फायदेमंद हों। जैसे- नील, अफ़ीम, कपास, जूट, चाय, आदि। लेकिन चूँकि इन फ़सलों के उत्पादन पर यूरोपीय एकाधिकार था। इसलिए ये भारतीय कृषक वर्ग के शोषण का ज़रिया बन गईं। हालाँकि इस स्थिति को नज़रंदाज़ कर कंपनी ने नील का उत्पादन बढ़ाया। इतना कि 1848-49 में इसका निर्यात एक करोड़ पाउंड (वज़न) तक पहुँच गया। चाय का उत्पादन भी 1851 में 22,000 पाउंड तक पहुँच गया। अफ़ीम का मामला तो ऐसा था कि 1849-50 में इससे सरकार को 33,09,637 पाउंड (मुद्रा) राजस्व हासिल हुआ। कंपनी के लिए अफ़ीम के व्यापार की कितनी अहमियत थी, इसका अंदाज़ा 1839-42 में हुए ‘अफीम युद्ध’ से लग सकता है। इसके ज़रिए चीन सरकार को अंग्रेजों ने मज़बूर किया कि वह अफीम के निर्बाध व्यापार की ईस्ट इंडिया कंपनी को अनुमति दे। 

कंपनी के निदेशकों ने इधर, 1788 में बंगाल सरकार से कहा कि वह बेहतर कपास के उत्पादन और व्यापार को प्रोत्साहित करे। कारण कि भारतीय कपास का रेसा छोटा होता था। वह सूत कातने वाली मशीनों के अनुरूप नहीं था। लिहाज़ा, बड़े रेशे वाले कपास की नई किस्मों से भारतीय किसानों का परिचय कराया गया। लेकिन वह कपास पर्याप्त मात्रा में ब्रिटेन नहीं पहुँच सका। क्योंकि अमेरिका से ब्रिटेन पहुँच रहे कपास की मात्रा पहले ही काफ़ी अधिक थी। इस स्थिति में कई लोगों को लगा कि कंपनी ने असल में भारत के बड़े रेशे वाले कपास को ब्रिटेन पहुँचाने की कोशिश ही नहीं की। जबकि सच्चाई ये थी कि भारत में लंबे रेशेवाले कपास के उत्पादन को लेकर कृषक समुदाय में ही विरोध था। वे कपास की स्थानीय किस्म का उत्पादन करने के पक्ष में थे। ताकि उसे स्थानीय बाज़ार में बेचा जा सके। भारतीय कपास की माँग चीन और दक्षिण एशिया में भी ख़ूब थी। 

अलबत्ता, 1858 से पहले तक भारत में सड़कों, रेल-मार्गों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं होने से ग्रामीण क्षेत्र कटे-कटे रहते थे। कृषि उत्पादों का व्यापार-व्यवसाय स्थानीय स्तर पर अधिक होता था। इन उत्पादों की कीमतें भी अलग-अलग जगहों पर भिन्न-भिन्न होती थीँ। जब ज़्यादा उपज होती तो स्थानीय स्तर पर उसकी अतिरिक्त मात्रा जमा कर ली जाती थी। इससे उस उपज की कीमतें उस स्थान-विशेष में कम हो जाती थी। पर्याप्त परिवहन सुविधा नहीं थी। इसलिए अतिरिक्त उपज को बिक्री के लिए अन्य स्थानों तक ले जाना संभव नहीं था। इसी तरह अगर कहीं उपज विशेष की कमी हो जाए तो अन्य स्थानों से लाकर वहाँ उसकी कमी पूरी नहीं की जा सकती थी। कई बार तो यह कमी इतनी हो जाती कि विशिष्ट इलाकों में अकाल की स्थिति बन जाती थी। इससे स्थानीय आबादी की तकलीफ़ें भयानक बढ़ जाती थीं। 

मद्रास के गुंटूर जिले में 1833 में ऐसा ही भयावना अकाल पड़ा था। इस बारे में एक प्रत्यक्षदर्शी अंग्रेज अफ़सर ने लिखा था, “कोरिंथ की लड़ाई (अमेरिकी गृह युद्ध) के विवरण में बताया गया है कि कुत्ते किस तरह वहाँ मानव खोपड़ियाँ खा रहे थे। लेकिन यहाँ (मद्रास) हम जो देख रहे हैं, उसके सामने कोरिंथ की लड़ाई का विवरण फीका है। यह देखकर दिल दहल जाता है कि लोग कैसे क्या-क्या खाकर अपनी भूख मिटा रहे हैं। वे मरे हुए कुत्तों और घोड़ों तक को भकोस रहे हैं। एक दिन तो कोई बदकिस्मत गधा किले से भटककर लोगों के बीच आ गया। उसे देखते ही सब उस पर टूट पड़े। उसे मारकर क्षत-विक्षत कर दिया और मौके पर ही चट कर गए।” उस अकाल में लगभग आधी आबादी भूख से मर गई थी। दो-तिहाई पशुधन भी जान से हाथ धो बैठा था। इसी तरह स्थिति 1837 में उत्तर भारत में बनी थी। लेकिन सरकार इन हालात से ठीक तरह निपट नहीं सकी। कारण कि उसके पास अकाल संबंधी कोई नीति नहीं थी।  

कुल मिलाकर पारंपरिक कृषि क्षेत्र में सरकार की दख़लंदाज़ी सिर्फ़ नीतियों का अनुसरण करने, उनको लागू कराने तक सीमित थी। उन नीतियों का प्रभाव भी अलग-अलग जगहों पर भिन्न-भिन्न था। सरकार स्वदेशी कृषि को लेकर उदासीन थी। व्यावसायिक फसलों का उत्पादन लगभग पूरी तरह यूरोपीय लोगों के हाथ में था। इसके बावज़ूद कि यूरोपीय लोग 1817 तक भारत में ज़मीन मालिक नहीं हो सकते थे। कंपनी की ख़ुद व्यावसायिक मामलों में दिलचस्पी ज़्यादा थी। वह तब तक बनी रही, जब तक कि 1833 के अधिकार पत्र कानून के ज़रिए उससे व्यावसायिक अधिकार वापस नहीं ले लिए गए।

(जारी…..)

अनुवाद : नीलेश द्विवेदी 
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(नोट : ‘ब्रिटिश भारत’ पुस्तक प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से जल्द ही प्रकाशित हो रही है। इसके कॉपीराइट पूरी तरह प्रभात प्रकाशन के पास सुरक्षित हैं। ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ श्रृंखला के अन्तर्गत प्रभात प्रकाशन की लिखित अनुमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर इस पुस्तक के प्रसंग प्रकाशित किए जा रहे हैं। देश, समाज, साहित्य, संस्कृति, के प्रति डायरी के सरोकार की वज़ह से। बिना अनुमति इन किस्सों/प्रसंगों का किसी भी तरह से इस्तेमाल सम्बन्धित पक्ष पर कानूनी कार्यवाही का आधार बन सकता है।)
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पिछली कड़ियाँ : 
23. ‘रैयतवाड़ी व्यवस्था’ किस तरह ‘स्थायी बन्दोबस्त’ से अलग थी?
22. स्थायी बंदोबस्त की व्यवस्था क्यों लागू की गई थी?
21: अंग्रेजों की विधि-संहिता में ‘फौज़दारी कानून’ किस धर्म से प्रेरित था?
20. अंग्रेज हिंदु धार्मिक कानून के बारे में क्या सोचते थे?
19. रेलवे, डाक, तार जैसी सेवाओं के लिए अखिल भारतीय विभाग किसने बनाए?
18. हिन्दुस्तान में ‘भारत सरकार’ ने काम करना कब से शुरू किया?
17. अंग्रेजों को ‘लगान का सिद्धान्त’ किसने दिया था?
16. भारतीयों को सिर्फ़ ‘सक्षम और सुलभ’ सरकार चाहिए, यह कौन मानता था?
15. सरकारी आलोचकों ने अंग्रेजी-सरकार को ‘भगवान विष्णु की आया’ क्यों कहा था?
14. भारत में कलेक्टर और डीएम बिठाने की शुरुआत किसने की थी?
13. ‘महलों का शहर’ किस महानगर को कहा जाता है?
12. भारत में रहे अंग्रेज साहित्यकारों की रचनाएँ शुरू में किस भावना से प्रेरित थीं?
11. भारतीय पुरातत्व का संस्थापक किस अंग्रेज अफ़सर को कहा जाता है?
10. हर हिन्दुस्तानी भ्रष्ट है, ये कौन मानता था?
9. किस डर ने अंग्रेजों को अफ़ग़ानिस्तान में आत्मघाती युद्ध के लिए मज़बूर किया?
8.अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान को किसकी मदद से मारा?
7. सही मायने में हिन्दुस्तान में ब्रिटिश हुक़ूमत की नींव कब पड़ी?
6.जेलों में ख़ास यातना-गृहों को ‘काल-कोठरी’ नाम किसने दिया?
5. शिवाजी ने अंग्रेजों से समझौता क्यूँ किया था?
4. अवध का इलाका काफ़ी समय तक अंग्रेजों के कब्ज़े से बाहर क्यों रहा?
3. हिन्दुस्तान पर अंग्रेजों के आधिपत्य की शुरुआत किन हालात में हुई?
2. औरंगज़ेब को क्यों लगता था कि अकबर ने मुग़ल सल्तनत का नुकसान किया? 
1. बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के बावज़ूद हिन्दुस्तान में मुस्लिम अलग-थलग क्यों रहे?

 

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