ऑनलाइन दुनिया में भिखमंगों-दानियों का खेल और ग़ैरहाज़िर सरगना

समीर शिवाजीराव पाटिल, भोपाल

जीव में लोभ प्राकृत है। हम सब चाहते हैं कि हमें कोई कुछ दे दे। किसी से हमें कुछ मिल जाए। जीवों के आपसी सम्बन्ध और विनिमय की हरक़तों में यह लोभ स्थायी भाव है। यदि कोई वस्तु पदार्थ नहीं चाहता तो प्रशंसा के दो शब्द की अपेक्षा रहती है। यह भी न रहे तो इतना भाव तो बच ही जाता है कि हमारे त्याग, विरक्ति-उपरति को कोई गुणग्राही देख भर ले। यानि हम सब कहीं न कहीं भिखारी हैं। 

हालाँकि विशुद्ध भिखारियों की बात करें तो पिछले ज़माने वे रोटी-टुकड़ा या दवा-दारू के नाम पर सड़कों पर पैसे माँगते थे। बहुत से अब भी माँगते हैं। लेकिन इसके साथ ही इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के ज़माने में भीख माँगने के तौर-तरीक़ों में भी अच्छी प्रगति हो चुका है। इसका अंदाज़ परिष्कृत हो गया है। अब विभिन्न बहानों से ऑनलाइन भीख माँगी जानी लगी है। इस काम ने अच्छे-ख़ासे व्यवसाय का रूप ले लिया है। और यह सब ऐसी सफाई से किया जाता है कि अस्ल भिखारी (अर्थात् धन्धे के सरगना) को तो कोई जान ही नहीं पाता। हमें पता ही नहीं चलता जो दान या भीख हम दे रहे हैं, उसका खरा फ़ायदा उठा कौन रहा है?

इसके कुछ उदाहरण देखिए। मान लीजिए, हम यूट्यूब पर जब कोई भावनात्मक वीडियो देख रहे हैं। भजन-कीर्तन या कथा, प्रवचन सुन रहे हैं। तभी यकायक बीच में एक विज्ञापन नज़र आने लगता है। उसमें कोई भाई, कोई बहन किसी गौशाला के सामने खड़े दिखाई देते हैं। पीछे स्क्रीन पर बीमार, अपाहिज गौवंश तथा अन्य जानवर नज़र आते हैं। उनकी हवाला देकर लोगों से अपील की जाती है कि वे कुछ पैसे दानस्वरूप दे दें। इसके लिए स्क्रीन पर बाक़ायदा ख़ाता नम्बर भी साझा किया जाता है। और दिलचस्प बात इसमें यह कि हम ऐसे विज्ञापन देखना चाहें या नहीं पर हमें 10-20 सेकेंड तो उन्हें देखना ही पड़ता है। यूट्यूब जैसे मंचों पर ऐसा बन्दोबस्त है।

इसी तरह, हम कभी-कभार समाचारों से सम्बन्धित या ऐसी ही किसी अन्य वेबसाइट पर जाते हैं। वहाँ भी किसी न किसी कोने में कोई विद्रूप चेहरा प्रमुखता से चस्पा हुआ दिखाई देता है। शरीर में भयंकर कोढ़ जैसी कोई बीमारी है। और वह लोगों से अपनी त्रासद कथा कहते हुए पाया जाता है कि उसे जानलेवा बीमारी है। इस पर लाखों, करोड़ों रुपए ख़र्च होने वाले हैं, जो उसके पास हैं नहीं। उसे इलाज़ कराना है और पैसे नहीं मिले तो वह मर जाएगा। इसके साथ ही लोगों से अपील भी कि वे खुले मन से दान दें ताकि उसका इलाज़ हो सके।  

ऐसे ही कहीं किसी जगह बीमार मासूम नज़र आता है। उसके सिरहाने माँ या पिता खड़े दिखाई देते हैं। बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए वे बताते हैं कि मासूम को कोई दुर्लभ बीमारी हुई है। करोड़ों रुपए का इलाज़ का ख़र्चा है। अब तक घर, गहने वग़ैरा सब बिक चुके हैं। बस, भलेमानस लोगों से थोड़ी-बहुत आस बची है। वे कुछ दान दे दें तो बच्चे के इलाज़ का हो जाए। उसकी जान बच जाए। कभी-कभार ऐसे लोगों के साथ कोई विशेषज्ञ भी मदद की गुहार लगाता दिख जाता है। ऐसे मामलों की फ़ेहरिस्त बहुत लम्बी है। भूखे-प्यासे कचरा बीनने वाले बच्चे, दुष्कर्म से पीड़ित महिलाएँ, घरों से निकाले गए बुज़ुर्ग लाचार इंसान, और न जाने क्या-क्या, कैसी-कैसी चीज़ें।   

इस तरह पैसे जुटाए जाने की प्रक्रिया को आधुनिक शब्दावली में ‘क्राउडफंडिंग’, ‘ऑनलाइन डोनेशन’, आदि संज्ञाएँ दी जाती हैं। इन मामलों की तह तक जाने की कोशिश करें, तो हम पाते हैं कि इन सभी के पीछे समाजसेवा या लोकल्याण के उद्देश्य से चलने वाली कोई स्वयंसेवी संस्था, न्यास, या ऐसा ही कोई संगठन है। और फिर हम पाएँगे के इस क़िस्म की संस्थाओं, संगठनों के लिए ऐसे मामलों की आड़ में धन जुटाना कोई यदा-कदा किया जाने वाला कृत्य नहीं है। बल्कि यह उनकी नियमित क़वायद होती है। या दूसरे शब्दों में कहें तो व्यवसाय।

इसीलिए इस सन्दर्भ में कुछ सवाल असुविधाजनक लग सकते हैं। किन्तु ये गलत नहीं हैं। मसलन- छह-सात करोड़ रुपए या इससे ज़्यादा भी खर्च कर के किए जाने वाले किसी मरीज़ के इलाज़ में अस्पताल, डॉक्टर, दवा निर्माताओं का कितना हिस्सा होता है? जिन वेबसाइटों, चैनलों, यूट्यूब आदि में ऐसे विज्ञापन दिखाए जाते हैं, उनकी कितनी हिस्सेदारी होती है, इस तरह जुटाई रकम में? वातानुकूलित दफ़्तरों में बैठकर मोटी तनख्वाह पाने वाले तथा संस्था के लिए दान का लक्ष्य हासिल करने की रणनीति बनाने वाले पढ़े-लिखे युवा इस काम को कितना उचित मानते हैं? और पैसे हासिल करने के लिए किसी की बेचारगी, विद्रूपता को दिखाना कितना न्यायपूर्ण है? 

ऐसे तमाम सवाल हैं, जिन पर आत्मचिन्तन होना चाहिए। लेकिन उसका सर्वथा अभाव दिखाई देता है, हर जगह। बल्कि ऐसे कृत्यों के समर्थन में कुतर्क मौज़ूद हैं। मसलन- क्राउडफंडिंग करने वाले संगठनों की दलील होती है कि वे बहुत ही मामूली सा हिस्सा लेते हैं, ऐसी रकम में। वह भी इसलिए क्योंकि उन्हें ऐसा कोई अभियान चलाने के लिए तमाम संसाधनों का ख़र्च उठाना होता है। जबकि, एक अध्ययन बताता है कि ऐसे संगठन कुल प्राप्त होने वाले दान का छह प्रतिशत तक शुल्क लेते हैं। साथ ही अभियान चलाने के लिए एकमुश्त रकम भी लेते हैं। 

इस सिलसिले में सरकार भी भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जानकारी के मुताबिक, वह इस क़िस्म के अभियानों को रोकने की कोई क़ोशिश नहीं करती। बल्कि ऐसे अभियान चलाने वालों से 18 फ़ीसदी तक कर वसूल करती है। ठीक उसी तरह जैसे वह शराब, सिगरेट, जीव-जन्तुओं की हत्या कर उसकी तिज़ारत पर कर वसूलने से ग़ुरेज़ नहीं करती। मतलब सीधे शब्दों में कहें तो कुछ इंसानों, जीव-जन्तुओं की बेचारगी की आड़ में संस्थाओं से लेकर सरकार तक सब पैसे बनाने में लगे हुए हैं। और दिलचस्प बात है कि ऐसे तौर-तरीक़ों से पैसा बनाने वालों की अस्ल पहचान कभी उज़ागर ही नहीं होती। कैसी सोचनीय स्थिति है? और बहुत हद तक दयनीय भी! 

कहते हैं, मज़बूरी इंसान को बेग़ैरत बना देती है। इन मामलों में क्राउडफंडिंग अभियानों का चेहरा-मोहरा बने मज़बूरों की बेग़ैरती तो फिर भी समझी जा सकती है। लेकिन इन अभियानों के अस्ल सरगनाओं का क्या? वे आख़िर क्यों ऐसी बेग़ैरती पर उतारू हैं? और क्या उनकी यह हरक़त क्षम्य है? सोचिएगा! 
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(नोट : #अपनीडिजिटलडायरी के शुरुआती और सुधी-सदस्यों में से एक हैं समीर। भोपाल, मध्य प्रदेश में नौकरी करते हैं। उज्जैन के रहने वाले हैं। पढ़ने, लिखने में स्वाभाविक रुचि रखते हैं। वैचारिक लेखों के साथ कभी-कभी उतनी ही विचारशील कविताएँ, व्यंग्य आदि भी लिखते हैं। डायरी के पन्नों पर लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराया करते हैं।)

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