अपना आउटलेट खुला रखिए, ताकि बाँध फूटने से बचा रहे

विपिन दुबे, भोपाल मध्य प्रदेश

लाखों जीवन लेने वाले जर्मन तानाशाह हिटलर ने आख़िर आत्महत्या की! 

सुन्दर विचार देने वाले साने गुरुजी (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी) भी आत्महत्या कर लेते हैं। 

आधुनिक समय में गृहस्थ सन्त के रूप में पहचाने गए और कई लोगों को सहारा देने वाले भैयूजी महाराज अपना जीवन अपने हाथों से समाप्त कर लेते हैं।

फिल्मों में अभिनय करने वाले सुशान्त सिंह राजपूत अवसाद से ग्रस्त होकर आत्महत्या कर लेते हैं।

और अभी चार साल पहले तक सभी को अवसाद से लड़ना कैसे है, यह सिखाने वाली शीतल (आमटे) करजगी (समाजसेवी बाबा आमटे की पौत्री) अपना जीवन समाप्त कर लेती हैं। 

इन कुछ उदाहरणों से हमें क्या पता चलता है?

यही कि मनुष्य ऊपर से जितना मज़बूत दिखता है उतना ही अन्दर से हो, यह जरूरी नहीं। जैसे, पानी में तैरती बत्तख ऊपर से शान्त दिखती है। लेकिन पानी के नीचे उसके पैर तेजी से हिल रहे होते हैं। शान्ति से तैरते हुए दिखने के लिए उसे जो संघर्ष करना पड़ता है, ऊपर से देखने वालों काे उसका पता नहीं चलता। इसी तरह, शान्त दिखने वाले या ख़ुशी से चहकते चेहरों के पीछे भी मन में बड़ी हलचल मची हो, ये मुमकिन है। और यह भी सम्भव है कि वही हलचल कभी ख़ुद उनके लिए ही जानलेवा बन जाए। 

तो फिर क्या करें? 

इसका ज़वाब भैयूजी महाराज की आत्महत्या (2018 में) के बाद उनके मित्र अशोक वानखेड़े ने दिया। एक समाचार चैनल पर उन्होंने कहा, “भले ही भैयूजी एक आध्यात्मिक गुरु रहे, लेकिन थे तो वे भी एक इंसान ही। और शायद वे भी उन लोगों में शामिल रहे, जिनके पास मन का तनाव बाहर निकालने के लिए आउटलेट नहीं होता।” 

तो आख़िर क्या है ये आउटलेट और कितना महत्त्वपूर्ण है? 

इसे एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए, करोड़ों रुपए खर्च कर के किसी नदी या तालाब पर विशाल बाँध बनाया गया। लेकिन उसमें उसकी क्षमता से अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने के लिए कोई जगह नहीं दी गई। तो क्या होगा? एक समय में वह बाँध फूट जाएगा। लेकिन अगर अतिरिक्त पानी को बाहर निकालने  का रास्ता बनाया गया है, तो वह बाँध न सिर्फ़ बचेगा बल्कि सालों-साल सुरक्षित रहा आएगा। 

इस उदारण में बाँध से अतिरिक्त पानी बाहर निकालने का जो रास्ता है, वही है आउटलेट। और इसकी अहमियत? बाँध को बचाना और उसकी ज़िन्दगी बढ़ाना।

ऐसे ही हमें भी अपने व्यक्तित्त्व में अपना आउटलेट ढूँढना है। उसका उपयोग करना है। उसे हमेशा खुला रखना है। ताकि हमारे भीतर का बाँध भी टूटने से बचा रहे।  

हमें मुँह के आउटलेट का उपयोग कर अपनी समस्याएँ अपने लोगों को बताना है। अन्तर्मन का आउटलेट खोलने के लिए ध्यान का सहारा लेना है। आँखों के आउटलेट से, समय आने पर, आँसुओं को बह जाने देना है। अपने व्यवहार के आउटलेट से मित्र बनना है, बनाना है। ताकि मन के बाँध में कोलाहल का जलस्तर बढ़ने पर मित्र के साथ बैठकर अतिरिक्त जल बहाया जा सके। मन हल्का हो सके।

परिवार भी हमारे लिए एक सक्षम आउटलेट है। इसलिए परिजनों के साथ वक़्त बिताना है। हँसना है! बातें करना है! रोना-झगड़ना है! ख़ुद को व्यक्त करना है!! मुक्त करना है, स्वयं को स्वयं के शोर से!! 

याद रखिए, हमारे पीछे कोई हमें ‘मिस यू’ कहे, इससे बेहतर है कि जब तक हम साथ हैं, एक-दूसरे को ‘विद यू’ कहें।

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(नोट : ये विचार किसने लिखे, यह मालूम नहीं। लेकिन #अपनीडिजिटलडायरी के एक पाठक भोपाल के व्यवसायी विपिन दुबे को यह मालूम था कि ये विचार डायरी के सरोकारों से जुड़े ज़रूर हो सकते हैं। इसीलिए जैसे ही उनके वॉट्सएप पर सन्देश की शक्ल में यह लेख आया, उन्होंने उसे डायरी के पन्नों में दर्ज़ करने के लिए भेज दिया। डायरी का कारवाँ ऐसे ही सहयोग से आगे बढ़ता है।) 

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