प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार)
टीम डायरी
अभी कुछ दिन पहले ही एक अध्ययन रिपोर्ट निगाहों से गुजरी। स्वीडन के स्टॉकहोम विश्वविद्यालय में यह अध्ययन हुआ है। इसका नतीज़ा ये कि टालमटोल की आदत, जिस किसी में भी हो, उसे बुरी तरह ख़राब करती है। टालमटोल करने वाले एक वक़्त के बाद ख़ुद को अकेला महसूस करने लगते हैं। वे अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं। कई बार अवसाद में भी चले जाते हैं। उनका पढ़ना, लिखना प्रभावित होता है। नींद नहीं आती। जितनी आती है, उतनी पूरी नहीं होती। जाहिर तौर पर इससे शरीर में तमाम दीगर बीमारियाँ भी घर करने लगती हैं। और कुल जमा नतीज़ा ये कि ज़िन्दगी में जो लक्ष्य तय किए हैं, वे दिन-ओ-दिन दूर होते जाते हैं। क़ामयाबी दूर की कौड़ी लगने लगती है।
ये तो हुई एक बात। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है, ग़ौरतलब। कई साल पहले दूरदर्शन पर एक धारावाहिक आया करता था, ‘भारत एक खोज’। कई लोगों को याद होगा। उसमें इसका ज़िक्र है। उस धारावाहिक की एक कड़ी में रावण-वध के बाद का प्रसंग दिखाया गया है। दृश्य में रावण मृत्यु-शैया पर है। उस वक़्त श्री राम अपने छोटे भाई श्री लक्ष्मण के साथ रावण के पास जाते हैं। ताकि ज्ञानी ब्राह्मण से कुछ ज्ञान की बातें सीख सकें। रावण के पैरों की तरफ़ खड़े होकर श्री राम अपना आग्रह रखते हैं। ज़वाब में रावण ने बताया है, ‘व्यक्ति को अच्छे काम जितनी जल्दी हो, कर डालने चाहिए। शुभस्य शीघ्रम्। नहीं तो फिर वे आगे टलते जाते हैं। इसके ठीक उलट जहाँ तक सम्भव हो, बुरे कामों को टालना चाहिए। क्योंकि यह टालमटोल का रास्ता बुरे कामों से बचने का आसान और प्रभावी रास्ता बन पड़ता है।”
मतलब, बात बहुत सीधी सी और ‘रोचक-सोचक¹ है कि आधुनिक अध्ययन कुछ भी निष्कर्ष बताएँ। टालमटोल की आदत इतनी भी बुरी नहीं है। बशर्ते, हम सचेत हों हमेशा कि टालना किस चीज़ को है और कब।
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