राज्यसभा में रंजन गोगोई : जो छह साल तक बोले नहीं, उनकी ‘आवाज’ कैसे याद आएगी?

टीम डायरी

देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और राज्यसभा के सदस्य रंजन गोगोई का उच्च सदन में छह साल का कार्यकाल पूरा हो गया। उन्हें 16 मार्च-2020 में मनोनीत सदस्य के रूप में उच्च सदन की सदस्यता मिली थी। वह भी उच्चतम न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त होने के महज चार महीनों के भीतर। तब इसकी काफी आलोचना हुई थी क्योंकि जस्टिस गोगोई ही थे, जिनकी अध्यक्षता वाली पीठ ने अयोध्या के ‘राम जन्मभूमि मामले’ में ऐतिहासिक फैसला देते हुए विवादित जमीन का मालिकाना हक रामलला और हिन्दू पक्ष को सौंप दिया था। अब सोमवार, 16 मार्च को उच्च सदन से जस्टिस गोगोई काे विदाई दे दी गई। इस अवसर पर राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने कहा, “एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता के रूप में जस्टिस गोगोई ने उच्च सदन की चर्चाओं में अपनी बेजोड़ कानूनी समझ और अनुभव का परिचय दिया। उच्च सदन में उनकी ‘आवाज’ को बहुत याद किया जाएगा।” 

कहने-सुनने के लिहाज से यह अच्छी बाात है। विदाई भाषण में ऐसी बातें कही ही जाती हैं। अलबत्ता सच्चाई ऐसी बातों से अक्सर दूर होती है। जस्टिस गोगोई भी इस मामले में अछूते नहीं हैं और उनकी सच्चाई यह है कि उन्होंने अपने छह साल के कार्यकाल में सिर्फ एक बार सदन की बहस में हिस्सा लिया। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च नाम की एक संस्था है। उसके पास देश के सभी सांसदों-विधायकों के कार्यनिष्पादन, आदि से जुड़ी जानकारियाँ होती हैं। गोगोई से जुड़ी जानकारी भी उसी संस्था के हवाले से सामने आई है। उसके अनुसार,जस्टिस गोगोई ने पूरे कार्यकाल में सदन में एक भी प्रश्न नहीं उठाया और सदन में महज 53% उनकी उपस्थिति रही।

जबकि उनके कार्यकाल के दौरान ऐसे कई विधेयक उच्च सदन में आए जिन पर बात रखते हुए वह ‘अपनी विशेषज्ञ समझ का परिचय दे सकते थे’। जेसे कि कृषि विधेयक, वक्फ संशोधन विधेयक, नए आपराधिक कानून, महिलाओं के लिए आरक्षण से जुड़ा विधेयक, आदि। पर इनमें से किसी में जस्टिस गोगोई ने हिस्सा नहीं लिया। दिलचस्प बात यह कि जिस विधेयक पर उन्होंने अपनी बात रखी वह था- दिल्ली सेवा विधेयक। इसके जरिए दिल्ली सरकार के अधिकारों को केन्द्र ने नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की, जिसका सदन के सदस्य के रूप में गोगोई ने समर्थन किया। जबकि मुख्य न्यायाधीश के रूप में ऐसे ही प्रयास को वह खारिज कर चुके थे!

यद्यपि बात इतने पर खत्म नहीं होती। इसमें एक अहम कड़ी और है। बताते हैं कि दिसम्बर-2021 में एक बड़े पत्रकार ने जस्टिस गोगोई से उच्च सदन में उनकी कम उपस्थिति के बारे में प्रश्न पूछ लिया था। तब जानते हैं उन्होंने क्या जवाब दिया था, “मैं किसी पार्टी के आदेश-निर्देश से बँधा नहीं हूँ। मेरी जब मर्जी होती है, तब जाता हूँ, जब नहीं होती तो नहीं जाता।” सच है, दुनियाभर में ‘बड़े लोग’ ऐसा ही करते हैं। अपनी मर्जी से चलते हैं, अपनी इच्छा से सबको चलाते हैं। और गोगोई साहब भी कोई साधारण पृष्ठभूमि वाले थोड़े ही हैं। वह देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश हैं ही, असम के पूर्व मुख्यमंत्री केशब चंद्र गोगोई के पुत्र भी हैं। यही नहीं, वह दशकों तक असम पर राज करने वाले ‘अहोम राजवंश’ के सदस्य भी हैं।  

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Neelesh Dwivedi

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