खुद को पहचानिए, ताकि आप खुद ही खुद से महरूम न रह जाएँ

ज़ीनत ज़ैदी, शाहदरा, दिल्ली से

हमारा जीवन दिन-ब-दिन और ज़्यादा तनवभरा होता जा रहा है। इसके पीछे बहुत से कारण हैं। जैसे हमारा भोजन, दिनचर्या और सबसे महत्त्वपूर्ण हमारा वातावरण। और वे लोग, जिनसे हम दिन भर घिरे रहते हैं। हम चाहें या ना चाहें लेकिन हमें ऐसे बहुत से लोगों के साथ रहना पड़ता है, जिनकी सोच हमसे बिल्कुल नहीं मिलती। यही नहीं, एक-दूसरे से उलट भी होती है। इसी की वजह से होते हैं घर में लड़ाई-झगड़े।

कोई भी अपने ही घर का उदाहरण ले ले। खुद से पूछे कि क्या “घर के सभी सदस्यों से मेरी बनती है?” इसे मैं अल्फाज़ बदलकर कहूँ, तो “क्या हर एक के घर में एक-दूसरे की बात को न समझने की वजह से तू-तू, मैं-मैं नहीं होती?” अधिकांश लोगों के पास इसका जवाब यही होगा कि “हाँ होती तो है।” तो फिर इसका हल क्या है?

मेरा मानना है कि हमें इतनी बारीकी से कोई नहीं समझ सकता, जितना हम खुद को समझ सकते हैं। हर व्यक्ति के सोचने का तरीका, रहन-सहन, पसन्द ,शौक, सब अलग होते हैं। लेकिन असली सवाल है कि क्या हम खुद को पहचानते हैं? हर रोज़ सूरज अपनी चमकदार किरणों से इस जगत को रोशन करता है। रात को दोबारा समुन्दर की गहराई में कहीं गुम हो जाता है। ऐसे ही रोज हमेशा की तरह घड़ी के काँटों को देखते-देखते हमारा दिन गुजर जाता है। कभी थोड़ा-बहुत आबाद, तो कभी पूरा बरबाद। क्यों? क्योंकि हम अपने को ही नजरंदाज़ करते रहते हैं।

हम लोग लगे रहते हैं अपनों को खुश करने में। किसी को परिवार के लिए कामना है, तो किसी को परिवार की खुशी के लिए कुछ करना है। इन सबके बीच में ही खो जाता है हमारा अपना अस्तित्त्व। जीवन की रेस में हम आगे तो निकल आते हैं, लेकिन हमारी खुशियाँ, हमारी आत्मा कहीं पीछे रह जाती है।

अपनी आँखों में कुछ खूबसूरत सपनों को संजोए हमारी मर्जी इस रेस से बाहर हो जाती है। अपनों की इच्छाएँ पूरी करते रहते हैं हम। और हमारी खुद की इच्छाएँ दम तोड़ देती हैं। इस तरह इंसान बस एक जीती-जागती मूरत बन जाता है। ऐसा कि जिसका रिमोट हमारी कमजोरी, यानी हमारे परिवार के हाथ में होता है।

अब सोचिए क्या ऐसी जिन्दगी की कामना की थी हमने? नहीं। बल्कि एक आज़ाद परिन्दे की सी उड़ान का मन था हमारा। तो फिर क्यों हमने खुद की इच्छाओं का गला खुद ही दबाया? सोचिएगा।

जो लोग आज ये लेख पढ़ रहे हैं, मैं कामना करती हूँ कि वह इस चक्रव्यूह से आजाद होकर जिएँ। अपनी जिन्दगी, अपने हिसाब से। ख्याल रखिएगा, हमें जीवन एक ही बार मिलता है। इसे बरबाद न करें, बल्कि वह करें, जिससे हमें खुशी मिले। दुनिया की सभी टेंशन से मुक्ति पाकर एक दिन खुद के साथ बिताइए। खुद को पहचानिए। ताकि आप खुद ही खुद से महरूम न रह जाएँ।
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(ज़ीनत #अपनीडिजिटलडायरी के सजग पाठक और नियमित लेखकों में से एक हैं। दिल्ली के आरपीवीवी, सूरजमलविहार स्कूल में 10वीं कक्षा में पढ़ती हैं। लेकिन इतनी कम उम्र में भी अपने लेखों के जरिए गम्भीर मसले उठाती हैं। उन्होंने यह आर्टिकल सीधे #अपनीडिजिटलडायरी के ‘अपनी डायरी लिखिए’ सेक्शन पर पोस्ट किया है।)
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