अभी कई और ‘ठोस’ काम करने होंगे आरएसएस को…, कर सकेगा क्या?

अभिलाष खांडेकर, भोपाल मध्य प्रदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपने शानदार 100 साल पूरे कर लिए हैं। इस उपलब्धि को ध्यान में रखते हुए इस राष्ट्रवादी संगठन के बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। तो, अब स्वाभाविक रूप से इसके अगले पड़ाव के बारे में कुछ सवाल हैं। मसलन- निकट भविष्य में संघ कैसा होगा? या कहें कि अगले 50 सालों में? क्या यह सच में, भारत को ‘विश्व गुरु’ बना पाएगा? वह भी चारों ओर से सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक समस्याओं से घिरे होने के बावजूद?

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने एक स्वप्न देखा था- किसी भी जातीय भेद के बिना हिन्दू एकता का। इसी लक्ष्य के साथ संघ की स्थापना हुई 1925 मेंं और उसके बाद उसकी अनेक गतिविधियाँ शुरू हुईं। आज जब संघ भारतीय समाज में लगभग हर जगह मौजूद है- मजदूर संघों से लेकर छात्रों तक, आदिवासियों से लेकर महिलाओं तक; कलाकारों से लेकर किसानों तक और सार्वजनिक स्वास्थ्य से लेकर राजनीति (भारतीय जनता पार्टी) तक, तब तो अपेक्षाएँ अधिक ही है। अमेरिकी लेखक वॉल्टर के. एंडरसन ने संघ के 35 सहयोगी संगठनों (अनुषांगिक संगठन) की सूची बनाई है, जो लाखों-लाख स्वयंसेवकों के माध्यम से समाज को नि:स्वार्थ भाव से अलग-अलग सेवाएँ प्रदान करते हैं।

इतने सबके बावजूद, वामपंथियों और कांग्रेस की ओर से संघ की लगातार और तीखी आलोचना की जाती रही। तो फिर ‘उभरते राष्ट्रीय संगठन’ के भीतर उभरने वाले गम्भीर मतभेदों की बात ही क्या! आपातकाल के बाद जब बालासाहेब देवरस जेल से रिहा हुए तो उन्होंने मुसलमानों को संघ में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। तब उन्हें तीखी आलोचना झेलनी पड़ी थी। उस समय कई वरिष्ठ संघ के नेताओं ने संगठन को उसके संस्थापक द्वारा तय किए रास्ते से भटकाने के लिए उनकी आलोचना की थी। उस समय देवरस ने अपने दो प्रसिद्ध पूर्ववर्तियों की तरह ही संघ की दैनिक शाखाओं के माध्यम से ‘राष्ट्र निर्माण को मुख्य लक्ष्य’ बताया था।

आरएसएस की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था- अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल- अपनी वार्षिक बैठकों में कई सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करती रही है। अभी 30 अक्टूबर को ही मध्य प्रदेश के जबलपुर में ऐसी ही एक महत्त्वपूर्ण बैठक होने वाली है। मेरे पास अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में प्रस्तुत आरएसएस की वार्षिक रिपोर्टों के कई पुराने अंक हैं। उनमें भी संघ के भीतर चर्चा में आए कईं समकालीन मुद्दों का वर्णन है।

ऐसे में आज जब आरएसएस तमाम कार्यक्रमों के साथ शताब्दी मना रहा है, तो आगे उसकी रणनीति क्या होगी? क्या उसने कभी भारतीय समाज के सामने आने वाली वास्तविक और जटिल समस्याओं को हल करने के बारे में सोचा है? या यह अब भी अपने ही बनाए काँच के घर में रह रहा है? यहाँ हम कुछ मुद्दों के बारे में चर्चा करते हैं, ताकि संघ इन पर ध्यान दे। खास तौर पर उस स्थिति में जरूर ध्यान दे, जब पूर्व में गम्भीरता और वृहद् पैमाने पर इष्टतम सफलताओं के साथ उन पर काम नहीं किया गया हो…

महिलाओं की सुरक्षा : लोग सोचते हैं और पूछते भी हैं कि संघ ने महिलाओं के लिए आखिर किया क्या है? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो नियमित रूप से आँकड़े जारी करता है, जो लड़कियों और महिलाओं से बलात्कार तथा छेड़छाड़ में वृद्धि दिखाते हैं। मुझे याद नहीं कि संघ प्रमुख ने किसी भी भाजपाशासित राज्य के मुख्यमंत्री की कोई बैठक कभी बुलाई हो कि इन जघन्य अपराधों को प्रभावी ढंग से रोकने पर बात हो सके या इस पर गम्भीर चर्चा ही की हो। यह मेरी समझ से बाहर है कि संघ की महिला शाखा ‘राष्ट्र सेविका समिति’, जो 1936 में शुरू हुई, अपनी बहनों के साथ हो रहे लगातार अपराधों के खिलाफ विरोध रैलियाँ (जैसे पथ संचलन, आदि) क्यों नहीं निकालती?

भ्रष्टाचार : जीवन के सभी क्षेत्रों में हर रूप और पैमाने पर भ्रष्टाचार ने बड़ा तथा डरावना रूप ले लिया है। क्या भ्रष्टाचार के साथ-साथ ‘राष्ट्र निर्माण’ सम्भव होगा? इसने आम आदमी की जिन्दगी नर्क बना दी है। सरकार द्वारा दी जाने वाली सभी सेवाओं की गुणवत्ता लगातार खराब हुई है। आरएसएस नेतृत्त्व ने कभी इस पर खुलकर बात क्यों नहीं की? आरएसएस की देखरेख में ‘अलग सोच वाली पार्टी’ (भाजपा) के शासन में कोई फर्क क्यों नहीं दिखता? भाजपा में तो कम से कम ईमानदारी से काम अपेक्षित है।

गौ-हत्या : आरएसएस ने 1952 में गौ हत्या पर प्रतिबन्ध के लिए 1.70 करोड़ हस्ताक्षर जमा किए थे। तब नेहरू सत्ता में थे। उस कार्रवाई के 70 साल बाद भी किसी भी राष्ट्रीय कानून के अभाव में अब तक गायों की आबादी असुरक्षित ही है। राज्यों ने कानून बनाए हैं, लेकिन वे कमजोर हैं। गायों को सड़कों पर मारा जा रहा है और कचरे के ढेर पर खाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। आरएसएस ने इसके बारे में ठोस क्या किया है?

पूँजीपतियों के साथ सत्ता की साठगाँठ (क्रोनी कैपिटलिज्म) : पिछले 11 सालों में ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ ने बहुत तेजी से अपने पैर पसारे हैं। क्या संघ ने कभी दूसरों की कीमत पर भारत में मुट्ठीभर उद्योगपतियों को बहुत अमीर बनाने के फायदे और नुकसान पर चर्चा की है? सरकार के खुले समर्थन से आज कुछ चुनिन्दा समूहों ने प्रमुख व्यावसायिक क्षेत्रों पर लगभग एकाधिकार कर लिया है। इसने अन्य व्यापारिक घरानों में घबराहट पैदा कर दी है। क्या आरएसएस को इसकी कोई जानकारी नहीं है?

शिक्षा : शिक्षा और संस्कृति हमेशा से संघ के पसंदीदा विषय रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में भारत संघ से जुड़ा हुआ कौन सा एक बड़ा बदलाव बता सकता है? मैं आरएसएस द्वारा नियुक्त शिक्षा संस्थानों के कई प्रमुखों से मिला हूँ और मैं यह पक्के तौर पर कह सकता हूँ कि उन्होंने ज्यादातर मामलों में संस्थानों को बर्बाद कर दिया है। सिर्फ हिन्दुत्त्व के एजेण्डे को शैक्षिक संगठनों पर थोपना ही मकसद नहीं होना चाहिए। उनके कुलगुरुओं को नागरिकों के रूप में उच्च श्रेणी के छात्र तैयार करने चाहिए, संस्थाओं मे अनुशासन लाना चाहिए।

पर्यावरण संरक्षण : आधारभूत ढाँचा विकास के नाम पर भारत की नदियाँ, झीलें, पेड़, राष्ट्रीय उद्यान, पहाड़, शहरी जैव विविधता लगातार तबाह हो रही है। शहरी पेड़ों को बेरहमी से काटा जा रहा है। जबकि हवा, मिट्टी और जल प्रदूषण में कोई कमी नहीं आई है। क्या बढते वैश्विक तापमान के खतरों के समय अपनी ही सरकारों को आगाह करना संघ का फर्ज नहीं है?

उम्मीद है कि 100 साल पुराना संघ अब लाखों भारतीयों के सामने आने वाले रोजाना के और अधिक जरूरी मुद्दों पर ध्यान देगा। 

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(नोट : अभिलाष जी मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। दैनिक भास्कर जैसे देश के शीर्ष अखबारों में सम्पादक रह चुके हैं। उनका यह लेख मेल के जरिए #अपनीडिजिटलडायरी तक पहुँचा है और उनकी सहमति से ही प्रकाशित किया गया है।) 

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