जाल में जेलेंस्की, मगर ज़िम्मेदार कौन? और अब अगला कौन?

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

विश्व के सबसे शक्तिशाली और समृद्ध देश अमेरिका के राष्ट्रपति भवन से इसी 28 फरवरी, शुक्रवार को पूरी दुनिया ने एक विचित्र नज़ारा देखा। वहाँ यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की बैठे थे। इस तरह जैसे किसी ‘जाल में घिरे हुए’ हों। उनके बगल में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और सामने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स थे। तीन ओर से मीडिया के लोगों ने उन्हें घेर रखा था। ज़ेलेंस्की पर लगातार आरोपों के हमले हो रहे थे। कभी वेन्स, कभी ट्रम्प, तो कभी मीडिया के प्रतिनिधि तक। उन सबका सामना ज़ेलेंस्की ने अपने अन्दाज़ में किया।

मीडिया के एक प्रतिनिधि ने उनसे सवाल किया, “आपने कोट-पैन्ट क्यूँ नहीं पहना है?” तो ज़ेलेंस्की बोले, “जब तक मेरे देश में युद्ध ख़त्म नहीं होता, मैंने ऐसे ही रहने का निश्चय किया है।” जेडी वेन्स ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रम्प कूटनीति के ज़रिए यूक्रेन में शान्ति स्थापित करना चाहते हैं?” ज़ेलेंस्की ने इस सवाल कर दिया, “कौन सी कूटनीति? जब रूस ने यूक्रेन पर लगातार, कई बार हमला किया, तब उसे किसी ने नहीं रोका। हमें अकेला छोड़ दिया गया।” इतना सुनते ही ट्रम्प और वेन्स भड़क गए। ट्रम्प ने ज़ेलेंस्की पर आरोप लगा दिया कि वे तीसरा विश्व युद्ध छेड़ने वाली भाषा बोल रहे हैं। वेन्स ने भी उन पर अमेरिका और अमेरिकियों का अपमान करने का आरोप जड़ा। ट्रम्प ने याद दिलाया कि अमेरिका ने यूक्रेन को 350 अरब अमेरिकी डॉलर दिए हैं। तब कहीं जाकर यूक्रेन अब तक रूस से मुक़ाबला कर पा रहा है। इसके बावज़ूद ज़ेलेंस्की बातों ही बातों में चेता गए कि अमेरिका ने अगर रूस के मौज़ूदा राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन किया, तो कभी न कभी वह अमेरिकी धरती पर भी हमला कर सकते हैं। 

इस तरह, ज़ेलेंस्की अमेरिका आए तो थे रूस-यूक्रेन युद्ध की समाप्ति के लिए भूमिका तैयार करने। उससे सम्बन्धित एक समझौते पर दस्तख़त करने। लेकिन ऐसा कुछ किए बिना ही वहाँ से लड़-झगड़कर वापस रवाना हो गए। ज़ेलेंस्की के अन्दाज़ को किसी ने ‘बहादुरी’ कहा, तो किसी ‘बदतमीज़ी’। हालाँकि, यूक्रेन के लोगों ने इसे ‘अपने देश के सम्मान के लिए संघर्ष करने का उनका जीवट’ माना। ख़बरें हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति भवन के ‘ओवल दफ़्तर’ में हुई शुक्रवार की घटना के बाद यूक्रेन में ज़ेलेंस्की की लोकप्रियता में फिर उछाल आया है। यहाँ तक कि अमेरिका में भी यूक्रेन समर्थकों ने उपराष्ट्रपति जेडी वेन्स को वरमोन्ट का एक रिसॉर्ट छोड़कर जाने पर मज़बूर कर दिया क्योंकि ज़ेलेंस्की पर आरोपों-हमलों की शुरुआत उन्होंने की थी। ज़ेलेंस्की को ब्रिटेन, फ्रांस, इटली जैसे देशों की सुहानुभूति मिली है। ब्रिटेन से यूक्रेन को कर्ज़ के रूप में 2.8 अरब अमेरिकी डॉलर की वित्तीय मदद भी मिल गई है। 

तो क्या इससे यह मान लिया जाए कि बीते तीन साल से रूस के साथ सीधे तौर पर युद्ध में भिड़ते रहने से ज़ेलेंस्की अपने ही बुने जिस जाल में उलझे थे, उससे वे बाहर निकल आए हैं?  तो नहीं, ज़वाब ‘नहीं’ में ही है क्योंकि ‘ज़ेलेंस्की के जाल’ की रचना जितनी उन्होंने ख़ुद की है, उससे कहीं ज़्यादा उनके देश से बाहर मौज़ूद क़िरदारों ने की हुई है। इन क़िरदारों में कौन-कौन? ख़ुद अमेरिका, यूक्रेन का पड़ोसी रूस और यूरोपीय संघ के देश। कैसे? इसके लिए पृष्ठभूमि समझनी होगी। दरअसल, यूक्रेन में प्राकृतिक गैस और भविष्य के लिहाज़ से अतिमहत्त्वपूर्ण धातुएँ-खनिज आदि का भंडार काफ़ी मात्रा में है। अतिमहत्त्वपूर्ण 34 धातुओं-खनिजों में से 22 का भंडार यूक्रेन में है। इसके अतिरिक्त 17 प्रकार के दुर्लभ धात्विक खनिज भी वहाँ हैं। टाइटैनियम जैसी अतिमहत्त्वपूर्ण धातु के वैश्विक उत्पादन में सात प्रतिशत हिस्सेदारी यूक्रेन की है। ‘ज़ेलेंस्की का जाल’ इन्हीं सब चीजों की पृष्ठभूमि से बुना गया है। 

ज़ेलेंस्की से पहले तक यूक्रेन में उसके पड़ोसी रूस के समर्थन वाली सरकार थी। उसके कार्यकाल में यूक्रेन के संसाधनों पर भी रूस का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दख़ल था। यहाँ तक कि रूस ने 2014 से 2019 के बीच यूक्रेन के चार क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर के उन्हें अपना हिस्सा तक बना लिया। तब ज़ेलेंस्की अपने देश के एक लोकप्रिय हास्य कलाकार भर हुआ करते थे। लेकिन तभी उन पर और उनकी लोकप्रियता पर अमेरिका और पश्चिमी देशों के रणनीतिकारों की नज़र पड़ गई। उनके उक़सावे और समर्थन से ज़ेलेंस्की चुनाव में उतरे और जीत गए। तब उन्होंने देश की जनता से वादा किया कि वे “यूक्रेन के लोगों का सिर नहीं झुकने देंगे।” ज़ेलेंस्की का जीतना रूस को रास नहीं आया क्योंकि वे अमेरिका और यूरोपीय देशों के ‘मोहरे’ थे और यूक्रेन को अमेरिकी नेतृत्त्व वाले सैन्य समूह- उत्तर अटलांटिक सन्धि संगठन (नाटो) में शामिल कराने की क़ोशिश भी करने लगे थे। ज़ेलेंस्की की क़ोशिशें रूस को ख़तरा लगीं। 

इसी कारण रूस ने फरवरी-2022 में यूक्रेन पर हमला कर दिया। इस हमले के पीछे रूस का मक़सद यूक्रेन पर क़ब्ज़े के बजाय ज़ेलेंस्की को हटाना अधिक था। उसे लगा कि हफ़्ते-15 दिन में यह काम हो जाएगा। लेकिन उसका अनुमान ग़लत निकला। अमेरिका और यूरोपीय देशों से मिली वित्तीय और सैन्य मदद तथा यूक्रेन के सैनिकों/नागरिकों के हौसले के दम पर ज़ेलेंस्की आज तीन साल बाद भी रूस के सामने युद्ध में टिके हैं।

अलबत्ता, ज़ेलेंस्की पर युद्ध ख़त्म करने का दबाव ज़रूर चौतरफ़ा है क्योंकि अगर रूस ने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया, तो उसे ज़वाब देने के लिए तीसरा विश्व युद्ध छिड़ सकता है। वह न भी हो तो जान-माल का नुक़सान तो ही रहा है। अमेरिका सहित यूक्रेन के मददग़ार अन्य देशों को भी अब आर्थिक रूप से अपने ऊपर दबाव महसूस होने लगा है। लिहाज़ा, ‘छोटे देश’ यूक्रेन पर ख़ासकर दबाव बनाया जा रहा है कि वे युद्ध विराम के लिए तैयार हो जाएँ। समझौते लिए रास्ता तैयार हो रहा है। इसके लिए अमेरिका ने यूक्रेन को एक प्रस्ताव दिया है कि वह उसे अपने खनिज संसाधनों का अधिकार दे। बदले में वह उसे आपात स्थिति में वित्तीय और सैन्य मदद देगा। 

मोटे तौर पर ज़ेलेंस्की इसके लिए तैयार भी हैं। उसी समझौता-प्रस्ताव पर दस्तख़त करने वे अमेरिका आए भी थे। लेकिन उसी वक़्त उनके दिमाग़ में एक पेंच भी फँसा हुआ था। वह था उनके देश में अगले राष्ट्रपति चुनाव का। राष्ट्रपति के तौर पर ज़ेलेंस्की का कार्यकाल मई 2024 में ख़त्म हो चुका है। वहाँ की संसद ने युद्धकाल में चुनाव नहीं कराने का प्रस्ताव पारित किया है। अलबत्ता, जैसे ही युद्धविराम होगा, शान्ति बहाली होगी, चुनाव तो होगा। तब उसमें ‘ज़ेलेंस्की फिर जाल में’ नजर आएँगे। उन पर आरोप लगेंगे कि उन्होंने ग़लत फ़ैसले लेकर तीन साल तक देश को युद्ध में झोंका। फिर शान्ति बहाली के नाम पर देश के बेशक़ीमती संसाधन अमेरिका को बेच दिए। 

सो, अब ऐसे आरोपों के साथ फिर राष्ट्रपति बनना ज़ेलेंस्की के लिए मुश्क़िल होगा। लिहाज़ा उन्होंने ‘युद्ध विराम से पहले अपने देश की सुरक्षा की लिखित गारंटी या आत्मसम्मान के साथ लड़ते हुए नेस्तनाबूद हो जाने’ को मसला बना दिया है। इसके लिए चतुर राजनेता की तरह ‘ट्रम्प से टकराव’ मोल लेने की रणनीति अपनाई है। उसका उन्हें अभी ‘ऊपरी तौर पर’ लाभ मिलते हुए दिखने लगा है। लेकिन यह तय है कि ‘ज़ेलेंस्की के जाल’ का यह अन्त नहीं है। बल्कि उनके लिए ही क्यों? खनिज संसाधनों से भरे उनके जैसे किसी भी देश और वहाँ के राजनेताओं के लिए यह ‘जालबाज़ी’ अन्तिम नहीं है। अमेरिका, यूरोपीय संघ, रूस, चीन जैसे ताक़तवर देश जहाँ भी अपने लाभ की सम्भावनाएँ देखेंगे, उन सभी देशों को वे इसी तरह मकड़जाल में उलझाएँगे। ऐसे ही वहाँ कोई ज़ेलेंस्की खड़ा करेंगे। ऐसे ही, ‘जेलेंस्कियों को जाल’ में फाँसेंगे। फिर उस देश का शिकार करेंगे। इराक, अफ़ग़ानिस्तान, यूक्रेन, इनका शिकार हो चुका है। कुछ हद तक पाकिस्तान भी। अगला कोई भी देश हो सकता है। सीरिया, तुर्की, मिस्र या अन्य?

यह धनी और ताक़तवर देशाें का नए क़िस्म का उपनिवेशवाद है। इससे सिर्फ़ वही देश बचेंगे, जिनके नेता ख़ुद के हितों को किनारे रखकर अपने देश के हितों के प्रति सचेत और सजग होंगे!

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