अपनीडिजिटलडायरी की पाँचवीं वर्षगांठ।
अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 1/9/2022
दूसरा वर्ष। #अपनीडिजिटलडायरी की दूसरी वर्षगाँठ। साल 2020 में हिन्दी महीने की यही तिथि थी, ऋषि पंचमी की, जब #अपनीडिजिटलडायरी को एक व्यवस्थित रूप दिया गया। वेब-पोर्टल के तौर पर उसे सूरत दी गई। तब से यह सफ़र लगातार जारी है। इस बीच, #अपनीडिजिटलडायरी न अपना रास्ता भूली है और न उद्देश्य से भटकी है। उद्देश्य स्पष्ट है कि पढ़ने-लिखने के शौक़ीनों के बीच सिर्फ़ स्वस्थ्य, पठनीय सामग्री का प्रसार करना है। इस उद्देश्य में जो-जो लोग भी भागीदारी करने की इच्छा रखेंगे, उन्हें साथ जोड़ते जाना है। सफलता के लिए कोई छोटा रास्ता नहीं लेना है। अनुचित संसाधनों की मदद नहीं लेनी है। चाहे मानवीय संसाधन हों या वित्तीय।
सहज ही समझा जा सकता है कि जिस दौर में हम हैं, उसमें ऐसा उद्देश्य लेकर, इस तरह की राह पर चलना मुश्क़िल है। इसमें चढ़ाव का सुख कम और उतार के अवसर ज़्यादा महसूस किए जाते हैं। #अपनीडिजिटलडायरी को भी इस सब से दो-चार होना ही है। इसके बावजूद चलते जाना है। आसमान पर मौज़ूद सप्तऋषि हमारी प्रेरणा हैं, जिन्हें ऋषि पंचमी की यह तिथि समर्पित है। सप्त ऋषि अपने सफ़र के दौरान यह नहीं देखते आगे कितनी आकाशगंगाओं का उन्हें रास्ते में सामना करना होगा। कितने धूम्रकेतुओं से बचते-बचाते आगे बढ़ना होगा। वे तो बस चलते जाते हैं। क्येांकि उनके चलने, चलते रहने में जनहित का, जन-कल्याण का भाव है।
इसी तरह की सोच लेकर, #अपनीडिजिटलडायरी चल रही है। अपने उतार, अपने चढ़ावों के साथ। मीमांसा दर्शन कहता है कि मनुष्य तीन ऋणों के साथ जन्म लेता है। ये ऋण हैं- माता-पिता, देव और ऋषि के। इन ऋणों से मुक्त होने का प्रयास भर किया का सकता है। उपाय है, यज्ञ द्वारा देव ऋण से, जनहित, जनकल्याण के भाव से यज्ञादि द्वारा ऋषि ऋण से और प्रजा (सन्तान) द्वारा पितृ ऋण से मुक्त हुआ का सकता है।
“जायमानो ह वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणवान् जायते,
यज्ञेन देवेभ्यः ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यः प्रजया पितृभ्य इति।
स वै तर्हि अनृणो भवति यदा यज्वा, ब्रह्मचारी, प्रजावानिति।।” (मीमांसा सूत्र, ६/२/३१ पर शाबर भाष्य))
मनुस्मृति भी कहती है…
“ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्।
अनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः॥” (मनुस्मृति, ६/३५)
अर्थात् : तीन ऋणों से मुक्त हो कर ही मन को मोक्ष मार्ग पर लगाना चाहिए।
हमारे लिए #अपनीडिजिटलडायरी यज्ञादि कर्म का ही स्वरूप है। इसमें हमारी ओर से स्वस्थ पठनीय सामग्री की आहुतियाँ देने का क्रम जारी है। हालाँकि बीच-बीच में यह क्रम कभी रुकता भी है। उसके अपने कारण होते हैं। लेकिन ‘उद्देश्य’, हमें नहीं रुकने देता। अपने साथ जुड़े और नए जुड़ते जाने वाले सह्रदय लोगों की अपेक्षाएँ, उनकी भावनाएँ, उनका सहयोग हमें नहीं रुकने देता। और हम फिर आहुति-कर्म में लग जाते हैं। इसी को देखते हुए, ज़्यादा तो नहीं, पर इतना वादा है कि यह आहुति-कर्म चलता रहेगा, जब तक हमारे साथ जुड़े और आगे जुड़ने वालों का सहयोग, उनका स्नेह मिलता रहेगा। ज़्यादा स्नेह मिलेगा, ज़्यादा सहयोग होगा, तो इसमें वृद्धि ही होगी।
यह स्नेह, यह सहयोग ही हमारी प्रेरणा है। यही हमारा धन है। यही हमारे प्रयासों की सार्थकता है। और हमें विश्वास है कि इस स्नेह, इस प्रेरणा, इस सार्थकता की सम्पत्ति के साथ सबके सहयोग से हम #अपनीडिजिटलडायरी को आगे एक बेहतर मक़ाम पर ले जा सकेंगे। ऋषि ऋण से उऋण होने का प्रयास कर सकेंगे।
शुभकामनाओं के साथ…
——
(अनुज राज पाठक संस्कृत शिक्षक हैं। उत्तर प्रदेश के बरेली से ताल्लुक रखते हैं। दिल्ली में पढ़ाते हैं। वहीं रहते हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापक सदस्यों में एक हैं।)
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Aap ka prays sarahnia hai
आभार श्रीमान