शिखा पांडे, अहमदाबाद, गुजरात से, 5/2/2021
कई बार कहा सुना गया है कि ‘हीरे की कीमत, जौहरी ही जानता है’। लेकिन क्या हमने इसी कहावत के दूसरे पहलुओं को भी जाना-समझा है? मसलन, इसका एक दूसरा पहलू कि ‘कोई पत्थर दरअसल हीरा होता ही तब है, जब वह सही हाथों में पहुँचता है।’ और तीसरा ये कि ‘जब तक पहचाना न जाए, तराशा न जाए, पत्थर हीरा नहीं होता।’ बहुत थोड़े से फर्क के साथ कही गई ये तीनों बातें अहमियत बड़ी रखती हैं। अपनी-अपनी, अलहदा।
ये बातें, कहावतें हमारे जीवन से भी जुड़ती हैं। हमारे अपने व्यक्तित्व को गढ़ने में काम आती हैं। हमारे साथ जुड़े लोगों को जानने, पहचानने, समझने में मदद करती हैं। यूँ कि हम में से हर किसी में कोई न कोई ख़ासियत होती है। जरूरत रहती है, तो बस उसे तराशने की। चमकाने की। पहचानने की और फिर अहमियत देने की। जब ये सब चीजें एक साथ आ मिलती हैं, तो किसी का पत्थर, किसी के लिए हीरा हो जाता है।
…ये जो कहानी है न, इसका मर्म यही है। इसीलिए सुनने लायक है।
———-
(शिखा पांडे, गृहिणी हैं। उन्होंने यह कहानी व्हाट्स एप सन्देश के जरिए #अपनीडिजिटलडायरी को भेजी है।)
अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More
कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More
शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More
भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More
जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More