‘गूगल भगवान’ की अन्धभक्ति बन्द कीजिए, इन्हें ‘भक्तों’ की जान की भी परवा नहीं!

टीम डायरी

दुनियाभर में ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनी ‘गूगल’ को ‘भगवान’ का दर्ज़ा देते हैं। उसकी तकनीकी सेवाओं पर आँख बन्द कर के भरोसा करते हैं। या दूसरे शब्दों में कहें तो ये लोग आधुनिक युग के इस नए ‘भगवान’ गूगल के ‘अन्धभक्त’ हैं। लेकिन वास्तव में इस अन्धभक्ति से हो क्या रहा है? क्या गूगल अपने ‘भक्तों’ की परवा करती है? इन सवालों के ज़वाब हाल ही में भारत में हुईं दो घटनाओं के आईने में देखिए। 

एक घटना अभी चार दिसम्बर की है। बिहार के रहने वाले राजदास रंजीतदास अपनी कार से गोवा के लिए निकले थे। उन्हें वहाँ एक शादी समारोह में शामिल होना था। अलबत्ता, इनकी कहानी बताने से पहले एक जानकारी साझा कर दें कि मीडिया के मंचों में इन्हें बिहार के उज्जैन का बताया गया है। जबकि बिहार में उज्जैन नाम की कोई जगह ही नहीं है। उज्जैन या प्राचीन अवन्तिका नगरी मध्य प्रदेश में है।

इस बारे में #अपनीडिजिटलडायरी ने जब थोड़ी खोजबीन की तो पता चला कि वर्षों पहले उज्जैन के परमार राजपूतों की एक शाखा ने बिहार में अपना ठिकाना बनाया था। उन्हीं राजपूतों को आजकल ‘उज्जैनिया’ कहा जाता है। इनके बारे में ‘तवारीख़-ए-उज्जैनिया’ नाम की पुस्तक में पर्याप्त जानकारियाँ मिलती है। राजदास रंजीतदास सम्भवत: उन्हीं उज्जैनिया राजपूतों से ताल्लुक़ रखते हैं, जिन्हें उज्जैन का बता दिया गया। 

ख़ैर आगे की कहानी सुनिए। राजदास रंजीतदास भी शायद उन्हीं लोगों में शुमार होते हैं जो ‘गूगल भगवान’ पर आँख बन्द कर के भरोसा करते हैं। लिहाज़ा, उन्होंने गूगल मैप का सहारा लेकर गोवा के पोरवोरिम तक का रास्ता तय करने का फ़ैसला किया। लेकिन वे पहुँचे कहाँ? उन्हें उनके ‘गूगल भगवान’ ने पश्चिमी घाट के खानापुर (कर्नाटक में) के घने जंगलों में ले जाकर छोड़ दिया। वह भी रात को 10 बजे।

दरअस्ल, उन्हें गूगल मैप ने गोवा तक पहुँचने का एक छोटा रास्ता बताया, जो कि जंगलों से होकर गुजरता थी। राजदास रंजीतदास ने भरोसा किया लेकिन ‘भगवान ने बीच रास्ते में भरोसा तोड़ दिया’। रात के समय घने जंगलों में मैप से रास्ता ग़ायब हो गया। बचे सिर्फ़ राजदास रंजीतदास, उनकी कार- जिसे वे ख़ुद चला रहे थे और उनके पत्नी-बच्चे। यही नहीं, इस घने जंगल में मोबाइल का नेटवर्क भी साथ छोड़ गया। 

बेचारे करते भी तो क्या? उन्हें जंगली जानवरों के ख़तरे के बीच पूरी रात वहीं जंगल में बितानी पड़ी। सुबह होते ही वह चार-पाँच किलोमीटर पैदल चलकर ऐसी जगह पर आए, जहाँ मोबाइल नेटवर्क मिल सके। वहाँ से उन्होंने पुलिस की आपातकालीन सेवा को सूचना दी। तब जाकर उन्हें मदद मिली। 

हालाँकि हरियाणा के गुरुग्राम से उत्तर प्रदेश के बरेली जा रहे तीन युवक इतने क़िस्मत वाले नहीं थे कि उन्हें मदद मिल जाती। नतीज़ा ये हुआ कि ‘गूगल भगवान ने उन्हें सीधे यमलोक पहुँचा दिया’। यह घटना अभी नवम्बर महीने की ही 23 तारीख़ को हुई। इन युवकों ने भी गूगल मैप के सहारे कार से गुरुग्राम से बरेली तक की यात्रा की थी। तीनों किसी शादी समारोह में बरेली आ रहे थे। लेकिन गूगल मैप ने उन्हें ऐसे पुल पर चढ़ा दिया जो अधूरा ही था। रामगंगा नदी पर बन रहे इस अधबने पुल का न उन्हें पता था, न ‘उनके गूगल भगवान’ को। 

नतीज़ा? इन युवकों की कार पुल की लगभग 50 फीट की ऊँचाई से सीधे नदी में जा गिरी। नदी में पानी कम था तो कार तलहटी में गिरते ही टूट-फूट गई। तीनों युवकों की मौत हो गई। इनमें दो युवकों की पहचान विवेक और अमित के रूप में हुई। हादसे के बाद गूगल की ओर से सांत्वना जताई गई, सहानुभूति दिखाई गई। पर इससे क्या ही होना है? होना तो इससे है कि हम गूगल की अन्धभक्ति के बजाय अपने विवेक पर भरोसा करें

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Neelesh Dwivedi

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