सांकेतिक तस्वीर
अनुज राज पाठक, दिल्ली
वर्ष 2018 में उच्चतम न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म के दौरान भी महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी। अत्यधिक विरोध के बाद विषय को नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ को प्रेषित कर दिया। वहाँ अभी तक विषय लंबित है। जबकि हाल ही में माहवारी के दौरान महिलाओं को सवैतनिक अनिवार्य अवकाश देने की माँग उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दी। न्यायाधीशों ने कहा कि ऐसे में “कम्पनियाँ महिलाओं नौकरी देने से बचने लगेंगी”।
न्यायालय का कथन सही भी है। नौकरी देने वाले लाभ कमाने के लिए ही व्यक्ति को नियुक्त करते हैं। जब व्यक्ति बिना काम के वेतन लेना चाहेगा तो वह उसके नुकसान का कारण बनेगा। ऐसा जोखिम कोई भी क्यों लेगा? हालाँकि सरकारी संस्थाओं में भी महिलाओं को बेहद अहम मौकों पर आसानी से छुट्टी नहीं मिलती। वहाँ जो महिला कर्मचारी नियमित हैं, उनके लिए मातृत्त्व अवकाश, बच्चे की देखभाल, आदि के लिए सवैतनिक अवकाश मिलता है, किंतु सरलता से नहीं मिलता। उसमें भी अगर महिला ही बॉस हो तो अवकाश मिलना और अधिक कठिन हो जाता है। जबकि बॉस को कोई आर्थिक या अन्य हानि की कोई संभावना नहीं होती, फिर भी। जबकि अस्थाई नियुक्ति वाली महिलाओं को तो छह माह के मातृत्त्व अवकाश के अतिरिक्त अन्य छुटि्टयों का लाभ तक नहीं मिलता।
तो सोचिए, निजी कम्पनियों में कैसे सवैतनिक अनिवार्य अवकाश की अपेक्षा की जा सकती है। वह भी माहवारी के लिए, हर माह! वहाँ यह संभव नहीं। इसीलिए न्यायालय ने एक व्यावहारिक निर्णय दिया, जो स्वागत योग्य है। लेकिन आश्चर्य इस बात का कि अदालत ने ऐसे ही स्थिति में महिलाओं को सबरीमला मंदिर में प्रवेश की अनुमति देते हुए व्यावहारिक पक्ष को नजंदाज कर दिया! क्यों? क्या अदालत को यह जानकारी नहीं कि सबरीमाला मंदिर में पूजा की विधि कठिन है। उस परम्परा को निभाने के लिए मानसिक और शारीरिक तौर पर स्वस्थ होना जरूरी है। जबकि माहवारी में महिलाएँ दोनों ही रूप से परेशान होती हैं। कष्ट झेल रही होती हैं। सबरीमला मामले में फैसला देते हुए न्यायाधीशों ने इस सामान्य समझ को ध्यान में क्यों नहीं रखा? और व्यावहारिक निर्णय क्यों नहीं दिया?
कहीं ऐसा तो नहीं कि केवल भारतीय परम्परा को क्षीण करने हेतु या भारतीय परम्परा को स्त्री विरोधी दिखाने के लिए सबरीमला का ‘नाटक’ रचा गया और न्यायालय ने इसमें अपनी भूमिका अदा की? अदालतती फैसलों से लगातार ऐसा संकेत क्यों जाने लगा है कि वह भारतीय परम्पराओं के विरोध में अति उत्साह से निर्णय देने को तत्पर रहता है? जबकि, सरकार या कारोबारियों के हित से जुड़े विषयों पर निर्णय सुनाते समय न्याय की अलग व्याख्याएँ प्रस्तुत करता है? इन प्रश्नों के उत्तर न्याय तंत्र से जुड़े लोगों को खोजने चाहिए। अगर कहीं इन प्रश्नों के उत्तरों से ऐसा संकेत स्पष्ट हो कि वास्तव में न्यायपालिका भारतीय परम्पराओं के विरुद्ध नजर आने लगी है, तो उसे तुरंत अपनी छवि में बदलाव के लिए जरूरी कदम उठाने चाहिए। सबरीमाला मंदिर के लंबित प्रकरण में ही उच्चतम न्यायालय अपने पिछले फैसले को सुधार कर, मंदिर की परम्परा के समर्थन में निर्णय देकर इसकी शुरुआत कर सकता है।
देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और राज्यसभा के सदस्य रंजन गोगोई का उच्च सदन में… Read More
अभी दो-तीन दिनों से एक घटना सुर्खियों में है। इसके मुताबिक, सड़क के गड्ढे की… Read More
देश की सर्वोच्च अदालत ने तो साफ मना कर दिया है। माहवारी के दिनों में… Read More
मशीनी बुद्धि (एआई वगैरा) खतरनाक है। इसकी शुरुआत से ही ऐसी चेतावनियाँ जारी हो रही… Read More
दुनिया के अधिकांश देशों में जब से लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था मजबूत हुई है, तभी से… Read More
भारत के पौराणिक साहित्य को मिथक या कपोल कल्पना बताकर खारिज करने वाले पश्चिम जगत… Read More