‘अमेरिकी भारतीय क्रिकेट टीम’ से सबक- सपने को जीना मत छोड़िए, पूरा ज़रूर होगा!

टीम डायरी

अगर क्रिकेट से किसी का ज़रा भी वास्ता है तो वह इस खेल के टी-20 विश्वकप में अमेरिकी क्रिकेट टीम के शानदार प्रदर्शन से ज़रूर परिचित होगा। यह भी जानता होगा कि अमेरिकी टीम अस्ल में इस वक़्त अमेरिकियों की कम, भारतीयों की ज़्यादा है। कारण कि इस टीम में लगभग 8-9 खिलाड़ी भारतीय मूल के हैं। अभी गुरुवार, 6 जून को हुए अमेरिका और पाकिस्तान के मैच दौरान यक़ीनन यह भी एक बड़ा कारक रहा होगा उस परिणाम के लिए, जिसमें अमेरिकी टीम ने पाकिस्तानी क्रिकेटरों को शिक़स्त दे दी। आख़िरकार भारत में क्रिकेट खेलने वाले बच्चों-युवाओं का एक सपना यह भी तो हाता है कि वह कभी भारतीय टीम में खेलें। पाकिस्तान के साथ उनका मुक़ाबला हो और वे उसे मात देने में अपनी भी भूमिका निभाएँ।

भारत-पाकिस्तान के बीच की प्रतिद्वंद्विता है ही ऐसी। क्या खेल और क्या ही कोई दूसरा क्षेत्र। यूँ तो दोनों देश कभी एक ज़िस्म-एक जान रहे हैं। लेकिन अंग्रेजों ने इनके बीच नफ़रत की ऐसी दीवार खड़ी की कि मुल्क़ के बँटवारे के बाद अब पड़ोसी होकर भी दोनों एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं देखते। हर क्षेत्र में इनकी प्रतिद्वंद्विता इतनी कड़वी हो जाती है कि मानो सरहद पर जंग हो रही हो। आज, 9 जून को भी ऐसी एक कड़ी जुड़ रही है, जब भारत-पाकिस्तान की क्रिकेट टीमें टी-20 विश्वकप में आमने-सामने होंगी। बताते हैं कि दुनिया में लगभग 45 करोड़ लोग इस मुक़ाबले को देखने वाले हैं। अमेरिका में कई जगह सार्वजनिक स्क्रीनों पर यह मैच दिखाया जाने वाला है। वहाँ यातायात ध्वस्त होने वाला है, ठहर जाने वाला है।

अलबत्ता यहाँ बड़ी बात है सपने की कि भारत में क्रिकेट खेलने वाले हर बच्चे-युवा का सपना होता है कि बड़ा क्रिकेटर बने। अपने देश के लिए खेले। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना और देश का नाम रोशन करे। और जब मौक़ा मिले, पाकिस्तान को शिक़स्त देने में भी भूमिका अदा करे। लेकिन सपने सभी के पूरे नहीं होते। ख़ास तौर पर उनके तो कभी भी नहीं, जो अपने सपने को जीना छोड़ देते हैं। लेकिन सौरभ नेत्रवलकर ऐसे नहीं हैं। मोनांक पटेल भी ऐसे नहीं है और नीतीश कुमार भी। बल्कि ये तीन क्यों? ‘अमेरिका की भारतीय टीम’ में खेल रहे भारत के सभी 8-9 खिलाड़ी या कि इन्हें देखकर प्रेरित, प्रोत्साहित होने वाले अन्य सब अमेरिकी-भारतीय खिलाड़ी भी ऐसे नहीं हैं, जिन्होंने अपने सपने को जीना छोड़ दिया हो।

इनमें से कुछ की कहानियाँ इन्हीं की ज़ुबानी सामने आईं हैं। मसलन- मुम्बई के सौरभ क्रिकेट का अंडर-19 विश्वकप खेलने वाली भारतीय टीम का हिस्सा रहे। यह बात है साल-2010 की। लेकिन इसके अगले 5 साल बीतने के बाद किन्हीं कारणों से उन्हें लगने लगा कि शायद आगे क्रिकेट में उनको बहुत सफलता नहीं मिलेगी। इसलिए उन्होंने रास्ता बदल दिया। पढ़ाई पूरी करने अमेरिका चले गए। सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गए और वहीं ओरेकल फर्म में नौकरी करने लगे, जहाँ से अभी उन्होंने विश्वकप खेलने के लिए छुट्‌टी ले रखी है। लेकिन क्रिकेटर बनने का सपना उन्होंने आँख से टूटने नहीं दिया। कॉरपोरेट और लीग के स्तरों पर खेलते रहे। उसी के जरिए अमेरिका की राष्ट्रीय टीम में चुन लिए गए। विश्वकप के लिए।

फिर वह दिन भी आ गया, जिसकी उम्मीद तो उन्हें शायद ही कभी रही हो। टी-20 विश्वकप में अमेरिका और पाकिस्तान मुक़ाबला। या दूसरे अर्थों में भारत-पाकिस्तान का ही मुक़ाबला। दोनों पारियाँ हो जाने के बाद मैच बराबरी पर आ ठहरा। सुपर ओवर से जीत-हार का फ़ैसला होना है। अमेरिका ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए एक ओवर में 18 रन बनाए हैं। अब उसे पाकिस्तान को इससे कम पर रोककर जीत अपने नाम करनी है। इसकी ज़िम्मेदारी 32 साल के ‘भारतीय’ गेंदबाज़ सौरभ नेत्रवलकर को दी जाती है। और वे पाकिस्तान को महज़ 12 रन पर रोक देते हैं, एक विकेट के नुकसान के साथ। बस, उसी पल से सौरभ भारत, अमेरिका, पाकिस्तान सहित दुनिया में मीडिया-सोशल मीडिया की सुर्ख़ियों में छा जाते हैँ।

हालाँकि सौरभ के लिए इस प्रदर्शन का मंच पहले ही तैयार किया जा चुका था। और यह काम उन्हीं के जैसी कहानी वाले दो भारतीयों ने किया था। इनमें एक मोनांक पटेल, अमेरिकी टीम के कप्तान। इन्होंने 38 गेंदों पर 50 रन की पारी खेलकर अपनी टीम को मुक़ाबले में लाकर खड़ा किया। फिर नीतीश कुमार, जिन्होंने रन तो 14 बनाए, लेकिन 20वें ओवर की आख़िरी गेंद पर जब जीत के लिए अमेरिका को पाँच रनों की ज़रूरत थी, तब चौका जड़ दिया। इस तरह मैच को बराबरी पर लाकर खड़ा किया और सुपर ओवर की भूमिका तैयार कर दी। उसमें सौरभ नेत्रवलकर ने जो किया, उसका ज़िक्र पहले ही हो चुका है। लेकिन जो ज़िक्र नहीं हुआ वह ये कि जिस अमेरिका में क्रिकेट का अभी शैशव काल ही है, वहाँ यह रोमांचक मुकाबला और भारतीयों का पराक्रम देखकर एक बार वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के पास यातायात भी रुक गया था।

तो अब बताइए, सपने पूरे होते हैं न? बिल्कुल होते हैं। बस, उनकी डोर हमें थामकर रखनी होती है। उन्हें जीते रहना होता है। उन्हें पलकों पर पकड़कर रखना होता है। धैर्य और संयम बनाए रखना होता है। क्योंकि हमें यह पता नहीं होता कि हमारे सपने कब, कैसे और कहाँ पूरे होने वाले हैं!

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Neelesh Dwivedi

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