संकीर्णता और पूर्वाग्रहों से ग्रसित होकर इतिहास लेखन की प्रवृत्ति रुकनी चाहिए अब!

शिवकुमार, लखनऊ उत्तर प्रदेश

इतिहास की प्रकृति पूर्णतया निर्मम और निर्मोही होती है। लेकिन यह हम मनुष्यों के अधिकार में तो होता ही है कि इतिहास का तथ्य, उसका घटित सच व उसके निष्कर्षों को अपनी सोच, अपने दृष्टिकोण, अपने पूर्वाग्रह और अपने मतानुरूप, हिताहित के मुताबिक आकार देकर जनमानस के सम्मुख प्रस्तुत कर सकें। भले वह तस्वीर विकृत हो, मगर ऐसा करके हम सबके भावजगत और परिवेश के बीच उसे स्थापित करने में समर्थ हो पाते हैं।

इतिहास के साथ ज्यादातर यह होता रहा है। अगर ऐसा न होता तो सोवियत रूस में लेनिन और स्टालिन तथा उनके अनुयायी वामपन्थी विचारक, चिन्तक और इतिहासकार रूस का इतिहास विकृत करके या तोड़-मरोड़ कर वहाँ की जनता को पूरे 70-80 वर्षों तक न पढ़ा पाते। इसी तरह स्वातंत्र्योत्तर भारत में नेहरू और इन्दिरा द्वारा इतिहास का विकृतिकरण करके उसका कांग्रेसीकरण करना सम्भव न हो पाता।

हालाँकि सोवियत रूस के पास झूठ को अस्वीकारने का अपार साहस था। साथ ही अपने राष्ट्र और उसकी संस्कृति के मूल सत्यों व तथ्यों को पुनर्वासित कर ले जाने की राजनीतिक दृढ़ता, योग्यता और सामर्थ्य भी। इसीलिए सोवियत रूस में अस्सी का दशक तक आते-आते वामपन्थियों का कपट संजाल तार-तार कर दिया गया। उसका रेशा रेशा नष्ट कर दिया गया। लेकिन भारत के परिवेश में यह सबसे दु:साध्य कार्य हो चला है। 

भारत दुनिया का एकमात्र राष्ट्र है, जिसका इतिहास आज सबसे ज्यादा विकृत स्वरूप में विद्यमान है। इसके इतिहास और जीवन अनुभव को जिस तरह विकृत और परिवर्तित किया गया, वह कल्पनातीत है। बेहद दु:खद और त्रासद भी। आज जब देश में राष्ट्रवादी सरकार पिछले 11 वर्षों से मौजूद है, तो सुधार की दिशा में बहुत थोड़ा ही कार्य हुआ है। और जो कार्य हुआ है, उसमें भी इतिहास को उसके सच के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया है। ऐसा फिलहाल की एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषद) की कक्षा सातवीं और आठवीं की इतिहास सम्बन्धी पाठ्य पुस्तकों के लेखन के मुद्दे पर उभरे विवाद को देख-पढ़कर समझा जा सकता है।

पहले नेहरूवियन इतिहासकारों, उदारपन्थी इतिहासकारों ने अपने मनमुताबिक सम्पूर्ण भारत के इतिहास में अपरिमित छेड़छाड़ करते हुए इसके मूल स्वरूप को लगभग पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर डाला। अपनी विचारधारा और राजनीतिक एजेंडे के मुताबिक इसे आकार देकर पिछले 80-90 वर्षों में सबको पढ़वाया। वहीं अब नव-राष्ट्रवादी दौर के इतिहास लेखन में कुछ विलक्षण प्रवृत्ति रेखांकित हुई है, थोड़ा भिन्न स्वरूप में।

नव-राष्ट्रवादी खेमे में एक समूह है, जिसका आरोप है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इतिहास लेखन के क्रम में मध्यकालीन भारतीय इतिहास में पेशवाओं और मराठों की उपलब्धियों को बढ़ा चढ़ाकर परोसने में लगा हुआ है। वहीं, मध्यकाल के राजपूत राज्यों और उनके महान शासकों को बहुत सीमित जगह इतिहास की इन पुस्तकों में दी गई है। परीक्षण करने पर यह बात काफी हद तक सच भी पाई गई है। यद्यपि अभी मुझे दोनों तरह की पुस्तकें पढ़ने-देखने को मिली नहीं हैं। लेकिन जिन लोगों ने पढ़ा-देखा है, उनका मत भी मेरे लिए बहुत मायने रखता है। खास तौर पर इसलिए कि उन्होंने प्रमाणस्वरूप इन पुस्तकों के कई सन्दर्भों को साक्ष्य के साथ उद्धृत किया है।

यह प्रवृत्ति नि:सन्देह घातक ही कही जाएगी। इतिहास लेखन के दौरान किसी भी ऐतिहासिक कालखण्ड के चित्रण में उसके सच को, तथ्य को हू-ब-हू अर्थात वस्तुनिष्ठ और निर्मम होकर न लिखना, इतिहास लेखन की मूल प्रकृति और मूल प्रतिज्ञा का मिथ्याकरण करना है। अपने यहाँ इस पूर्वाग्रह, दुराग्रह और मूढ़ता में इतिहास के साथ ऐसा भद्दा मजाक चल रहा है कि इसे जिक्र करते वक्त भी मन खट्टा हो जाता है।

यहाँ इतिहास को इतना संकीर्ण रूप दिया जा रहा है कि एक महान राष्ट्र, उसकी संस्कृति व उसके गौरवशाली पुरखों के अवदान तथा कृतित्त्व से ही हिन्दू समाज और उसके जन समूहों को वंचित किया जा रहा है। इस संकीर्ण मनोवृत्ति के भीतर जातिगत संकीर्णता या उसकी दुराग्रही चेतना का मनोविज्ञान कार्य कर रहा है। इससे प्रभावित एक समूह इतिहास का बाभनीकरण या पेशवाईकरण करने पर तुला हुआ है। तो प्रतिक्रिया के रूप में दूसरा समूह उसका राजपूतीकरण या ठाकुरीकरण करने में लगा हुआ है।

मेरे संसर्ग में चार-पाँच लोग तो ऐसे आए हैं, जिनमें वास्तव में ऐसी संकीर्ण जातिगत मनोवृत्ति ज्यादा दिखी है। वह उन तक रहती, तब भी घातक ही होती क्योंकि जिस भी सीमित सामाजिक दायरे में वे रह रहे होंगे, अपना दुराग्रही चश्मा बदल नहीं पाएँगे कभी। और जब वे व्यापक समस्याओं या राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य के तहत बौद्धिक वैचारिक या सभ्यतागत चिन्तन करते दिखते होंगे, तब सोचिए इस पूर्वाग्रही मनोवृत्ति के वशीभूत होकर वे कैसा निष्कर्ष और दृष्टिकोण लोगों के सामने प्रस्तुत करते होंगे?

इन नकारात्मक सन्दर्भों से यहाँ स्पष्ट हो चला है कि क्षात्र-धर्म और उसके सनातन स्वरूप से ऐसे लोगों को कोई लेना- देना नहीं है ! इन्हें सिर्फ अपनी मूढ़ता का प्रदर्शन करते जाना है बस, और कुछ नहीं। तो फिर इसका अंजाम बतलाने की जरूरत है क्या? इसीलिए कहना चाहूँगा कि यह निकृष्ट वृत्ति रुकनी चाहिए अब, क्योंकि यह जारी रही तो आने वाले वक्त में हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी…

(मुद्दा संवेदनशील है। इसलिए अपना निजी एक पक्ष और स्पष्ट कर दूँ। हिन्दू समाज का कोई भी व्यक्ति विभिन्न नायकों पर, चाहे वे किसी भी जाति के हों, उतनी ही श्रद्धा और आस्था रखेगा जितना वह अपने जातीय नायक के प्रति रखता होगा। दूसरी बात हिन्दू अगर अपने जाति और धर्म, जातीय जीवन, जातीय हित, जातीय अस्मिता और जातीय इतिहास पर गर्व और अभिमान नहीं रखेगा, तो किस पर करेगा फिर? यह जातीय पहलू तो उसके अस्तित्त्व बोध का अनिवार्य पक्ष है। मगर मुद्दा यहाँ दूसरा है। यहाँ तो बात यह है कि सिर्फ और सिर्फ संकीर्ण जातिगत चयन का तरीका अपनाकर सिर्फ अपनी जाति-बिरादरी के नायकों को आगे करके इतिहास के समग्र स्वरूप को निर्धारित करने, आकार देने की कुत्सित कोशिशें की जा रही हैं। यह सबसे ज्यादा घातक है।)

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(शिवकुमार जी देश में इतिहास के श्रेष्ठ अध्येताओं में गिने जाते हैं। उनका लेख #अपनीडिजिटलडायरी तक व्हाट्स एप के जरिए पहुँचा है।) 

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