मृच्छकटिकम्-8 : चोरी वीरता नहीं…

अनुज राज पाठक, दिल्ली से, 26/10/2022

‘वसंतसेना’ से ‘कर्णपूरक’ फिर कहता है, “आप इस दुपट्टे को ओढ़कर बहुत अच्छी लग रही हैं।” लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बगैर ‘वसंतसेना’ पूछती है, “इस समय आर्य चारुदत्त कहाँ गए होगें?”, ज़वाब में “अभी इसी रास्ते से घर की ओर जा रहे थे”, ऐसा कहकर ‘कर्णपूरक’ वहाँ से चला जाता है। जबकि ‘वसंतसेना’ अपनी सेविका ‘मदनिका’ के साथ ‘चारुदत्त’ को देखने के लिए अपने घर की छत पर चली जाती है।
(यहाँ दूसरा अंक समाप्त होता है)
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(तीसरे अंक की शुरुआत में मंच पर ‘विदूषक’ और ‘चारुदत्त’ परस्पर बातें करते हुए दिखाई देते हैं)

विदूषक : आर्य चारुदत्त, चलिए घर चलते हैं। देखिए, गली में कुत्ते भी सुखपूर्वक सो रहे हैं। भगवान चंद्रदेव भी अंधकार को स्थान देते हुए अपने आकाश रूपी महल से उतर रहे हैं।

चारूदत्त :  हाँ, आप ठीक कह रहे हैं, चलो चलते हैं।

दोनों घर पहुँच जाते हैं। घर पहुँचने पर सेवक ‘वर्द्धमानक’ उनके पैर धुलवाता है। ‘वर्द्धमानक’ इसके बाद विदूषक ‘मैत्रेय’ को स्वर्णाभूषण पात्र देकर कहता है, “इसे रात्रि में आप के पास रखना है। यह दिन में मेरे पास रहता है।” लेकिन ‘विदूषक’ उस पात्र को लेने से मना कर देता है। तब ‘चारुदत्त’ उसे आज्ञा देते हैं कि वह पात्र अपने पास रखे। साथ ही कहता है, “जब तक यह धरोहर हमारे पास है, तब तक इसे ऐसे ही क्रम से आप दोनों अपने पास सुरक्षित रखिए।”

इसके बाद सभी सो जाते हैं।

‘शर्विलक’ एक सुशिक्षित चोर है। वह ‘चारुदत्त’ के घर चोरी करने आया है।

मन में सोच रहा है, “चोंरी करने के लिए सीखी शिक्षा से, शारीरिक बल से अपने शरीर के नाप के अनुसार सेंध लगाकर साँप की तरह यहाँ घुसता हूँ। लोग चोरी को अधम कार्य अवश्य कहें क्योंकि यह लोगों के सो जाने पर की जाती है। विश्वास किए लोगों में यह कपट व्यवहार अनादरयुक्त है, इसलिए चोरी वीरता नहीं। किंतु यह कार्य मेरे आधीन है। अत: निन्दित होते हुए भी श्रेष्ठ है। क्योंकि किसी के आगे गिड़गिड़ाने से तो यह अच्छा है। चलता हूँ, सेंध लगता हूँ।”

ऐसे सोचते हुए सेंध लगाने के लिए स्थान का चयन करता हुआ विचार करता है, “दीवार का कौन सा स्थान पानी गिरने से कमजोर हुआ है? वहीं सेंध लगाना ठीक होगा ताकि आवाज न हो।”

दीवार छू कर..  यह स्थान ठीक लग रहा है, यहाँ सेंध लगाता हूँ। भगवान कनकशक्ति ने सेंध लगाने की चार विधियाँ बताई हैं। ये इस प्रकार हैं- पक्की ईंटों से बनी दीवार की ईंटों को खींच कर, कच्ची दीवार में गोंदों को काट कर, मिट्टी की दीवार को पानी से सींच कर,काष्ठ की दीवार को उखाड़कर सेंध लगानी चाहिए।”

“वैसे, सेंध कई प्रकार की होती हैं। जैसे- खिले कमल की तरह, सूर्य की तरह, द्वितीया के चंद्र की तरह, स्वास्तिक की तरह और पूर्ण कुंभ की तरह। यहाँ कौन से प्रकार की सेंध लगाऊँ? जिससे सुबह लोग देख कर मेरी प्रशंसा करें।”

“यह दीवार पक्की ईंटों की है। यहाँ कुंभ यानी घड़े के आकार की सेंध ठीक रहेगी। मनोकामना पूर्ण करने वाले भगवान कार्तिकेय की प्रार्थना करता हूँ। आचार्य कनकशक्ति को मेरा प्रणाम।”

इसके बाद अपने गुरु योगाचार्य को मन में स्मरण करता हुआ नमस्कार करता है। फिर दीवार काटकर, सेंध लगाकर पहले नकली पुरुष आकृति को अन्दर भेजता है। ताकि पता चल सके कि कोई जाग तो नहीं रहा है। यह सुनिश्चित कर लेने के बाद कि सभी सोए हैं, पूरी तरह आश्वस्त होकर भगवान कार्तिकेय को नमस्कार कर स्वयं अन्दर आता है।

(चारों तरफ देख कर) “अरे! यह क्या? मृदंग है, पखावज है, ढोलक है, पुस्तकें हैं। ओह यह किसी संगीत शिक्षक का घर है। मैं घर की विशालता देख अन्दर आ गया। यह गृह स्वामी तो गरीब है? अथवा धन को जमीन में गाड़े हुए हैं? अच्छा बीज फेंकता हूँ… फेंके गए बीज कहीं फैल नहीं रहे। अरे! यह गृह स्वामी तो वास्तव में गरीब है। तो यहाँ से जाता हूँ।

विदूषक : (स्वप्न में बोलता हुआ) अरे मित्र ! मुझे सेंध दिखाई दे रही है, चोर को भी देखता हूँ। तो आप यह आभूषणों की पेटी रखो।

शर्विलक : अरे! फटी पुरानी स्नान करने के समय पहनी जाने वाली धोती में बँधी हुई पेटी ही है। अच्छा ले लेता हूँ। अथवा मेरे जैसी अवस्था वाले और उच्चकुल में उत्पन्न ब्राह्मण को सताना उचित नहीं। तो जाता हूँ।

विदूषक : हे मित्र! तुम्हें गाय की कसम यदि तुम इस आभूषण की पेटी को न लो।

शर्विलक : अरे! भगवती गाय की कसम का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। तो पेटी ले लेता हूँ। अथवा मुझ श्रेष्ठ ब्राह्मण पुत्र के लिए यह उचित नहीं। जो ‘मदनिका’ नामक वेश्या के लिए चोरी रूपी कार्य कर रहा है।

इस प्रकार स्वर्णाभूषण की पेटी ले लेता है।और सोचता है कि मुझे दुःख केवल इस बात का है कि ‘मदनिका’ वेश्या के लिए मैंने इस ब्राह्मण को अन्धकार में धकेल दिया। अथवा अपने को ही नरक में धकेल लिया है?

जारी….
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(अनुज राज पाठक की ‘मृच्छकटिकम्’ श्रृंखला हर बुधवार को। अनुज संस्कृत शिक्षक हैं। उत्तर प्रदेश के बरेली से ताल्लुक रखते हैं। दिल्ली में पढ़ाते हैं। वहीं रहते हैं। #अपनीडिजिटलडायरी के संस्थापक सदस्यों में एक हैं। इससे पहले ‘भारतीय-दर्शन’ के नाम से डायरी पर 51 से अधिक कड़ियों की लोकप्रिय श्रृंखला चला चुके हैं।)

पिछली कड़ियाँ
मृच्छकटिकम्-7 : दूसरों का उपकार करना ही सज्जनों का धन है
मृच्छकटिकम्-6 : जो मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार बोझ उठाता है, वह कहीं नहीं गिरता
मृच्छकटिकम्-5 : जुआरी पाशों की तरफ खिंचा चला ही आता है
मृच्छकटिकम्-4 : धरोहर व्यक्ति के हाथों में रखी जाती है न कि घर में

मृच्छकटिकम्-3 : स्त्री के हृदय में प्रेम नहीं तो उसे नहीं पाया जा सकता
मृच्छकटिकम्-2 : व्यक्ति के गुण अनुराग के कारण होते हैं, बलात् आप किसी का प्रेम नहीं पा सकते
मृच्छकटिकम्-1 : बताओ मित्र, मरण और निर्धनता में तुम्हें क्या अच्छा लगेगा?
परिचय : डायरी पर नई श्रृंखला- ‘मृच्छकटिकम्’… हर मंगलवार

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