प्रतीकात्मक तस्वीर
ऋषु मिश्रा, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश
कभी आदेश होता है, “बच्चों को हीट-स्ट्रोक से बचने के उपाय बताएँ। उन्हें जागरूक करें। उनका ख्याल रखें।”
हालाँकि मैं ऐसे आदेश के बिना भी दिन में 25-30 बार यही कहती रहती हूँ….“धूप में नहीं जाना।”
इसी बीच, एक और आदेश आता है…“मतदाता जागरुकता रैली निकालें, बच्चों के साथ।”
मेरा दिल यह करने की गवाही नहीं देता। लोग सलाह देते हैं, “अरे इसमें क्या है, दरवाज़े के सामने एक फोटो खींचकर भेज दो।” पर इससे क्या हो जाएगा? जागरुक करना ही है, तो सीधे अभिभावकों से सम्पर्क करना चाहिए। हर काम में बच्चों को क्यों घसीटना? कल्पना कीजिए, इतनी धूप में आपका बच्चा रैली में निकल रहा हो तो?
फिर, तभी आदेश आता है, “शैक्षणिक कार्यो को प्राथमिकता पर रखें।”
कैसे रखें?
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(ऋषु मिश्रा जी उत्तर प्रदेश में प्रयागराज के एक शासकीय विद्यालय में शिक्षिका हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की सबसे पुरानी और सुधी पाठकों में से एक। वे निरन्तर डायरी के साथ हैं, उसका सम्बल बनकर। वे लगातार फेसबुक पर अपने स्कूल के अनुभवों के बारे में ऐसी पोस्ट लिखती रहती हैं। उनकी सहमति लेकर वहीं से #डायरी के लिए उनका यह लेख लिया गया है। ताकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने-पढ़ाने वालों के विविध पहलू भी सामने आ सकें।)
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ऋषु जी के पिछले लेख
10- आपका रंग जैसा भी हो, काम का रंग पक्का होना चाहिए
9- मदद का हाथ बढ़ाना ही होगा, जीवन की गाड़ी ऐसे ही चलती रहनी चाहिए
8- यात्रा, मित्रता और ज्ञानवर्धन : कुछ मामलों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट वाकई अच्छा है
7- जब भी कोई अच्छा कार्य करोगे, 90% लोग तुम्हारे खिलाफ़ होंगे
6- देशराज वर्मा जी से मिलिए, शायद ऐसे लोगों को ही ‘कर्मयोगी’ कहा जाता है
5- हो सके तो इस साल सरकारी प्राथमिक स्कूल के बच्चों संग वेलेंटाइन-डे मना लें, अच्छा लगेगा
4- सबसे ज़्यादा परेशान भावनाएँ करतीं हैं, उनके साथ सहज रहो, खुश रहो
3- ऐसे बहुत से बच्चों की टीचर उन्हें ढूँढ रहीं होगीं
2- अनुभवी व्यक्ति अपने आप में एक सम्पूर्ण पुस्तक होता है
1- “मैडम, हम तो इसे गिराकर यह समझा रहे थे कि देखो स्ट्रेट एंगल ऐसे बनता है”।
मैं बेंगलुरू में जहाँ रहता हूँ, वहाँ अपने घर के सामने रोज इस तरह का… Read More
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