शुभमन से सुनिए- ‘ज़िम्मेदारियाँ कितनी भी हों, एक समय में एक पर ध्यान देंगे तभी सफल होंगे’

टीम डायरी

भारत की टैस्ट क्रिकेट टीम का कप्तान बनने के बाद शुभमन गिल ने पहली बार अपने मन की बात साझा की है। भारतीय क्रिकेट कन्ट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की ओर से ज़ारी एक वीडियो में उन्होंने कहा, “मुझे इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि मेरे ऊपर कितनी ज़िम्मेदारियाँ हैं। मैं जानता हूँ कि उन्हें कब कैसे निभाना है। मसलन- जब मैं बल्लेबाज़ के तौर पर मैदान में होता हूँ, तो कप्तान की तरह नहीं सोचता। कप्तानी से जुड़ी किसी रणनीति, वगैरा पर ध्यान नहीं देता। दूसरे खिलाड़ी को भी बेवजह सिर्फ़ इसलिए ही सलाह नहीं देने लगता कि मैं कप्तान हूँ। उस वक़्त सिर्फ़ मैं अपनी बल्लेबाज़ी पर ध्यान देता हूँ। वही मेरी प्राथमिकता होती है क्योंकि मेरा मानना है कि ज़िम्मेदारियाँ कितनी भी हों, एक समय में एक पर ही ध्यान देंगे, तभी सफल सकेंगे।” 

शुभमन ने कहा, “मैं अगर बल्लेबाज़ी करते समय दूसरी चीज़ों पर ध्यान देने लगूँगा, तो निश्चित रूप से मेरे ऊपर दबाव बढ़ेगा। जबकि उसकी उस समय कोई ज़रूरत भी नहीं होगी, फिर भी। इस दबाव से मेरी बल्लेबाज़ी ख़राब हो सकती है। लेकिन अगर मैं सिर्फ़ बल्लेबाज़ी के वक़्त उसी पर ध्यान लगाता हूँ, तो मुझे अधिक आज़ादी मिलती है कि उसे और बेहतर कैसे करना है। टीम के लिए बल्लेबाज़ के तौर पर अपना ज़्यादा से ज़्यादा योगदान कैसे देना है। अब तक अपने अनुभव से मैंने यह पहली ज़रूरी चीज़ सीखीा है।”

शुभमन के मुताबिक, “मैंने रोहित (शर्माा) भाई, विराट (कोहली) भाई और अश्विन (रविचन्द्रन अश्विन) भाई से भी बहुत कुछ सीखा है। उनसे मैंने सीखा है कि देश और विदेश की अलग-अलग परिस्थितियों में टीम को जीत की राह पर आगे कैसे ले जाना है। उदाहरण के लिए विराट भाई मैदान पर बहुत आक्रामक होते हैं। हमेशा सामने नेतृत्त्व करते हैं। उनमें जीतने की भूख है। रन बनाने की भूख है। वह साफ़ नज़र आती है। रोहित भाई ऐसे हैं, जो मैदान पर हमेशा चौकन्ने रहते हैं। हर खिलाड़ी, हर गतिविधि पर उनकी नज़र होती है। वे हर खिलाड़ी से बात करते हैं। हर खिलाड़ी को बताकर रखते हैं कि उन्हें टीम के लिए उससे क्या योगदान चाहिए।” 

उनके मुताबिक, “रोहित भाई और विराट भाई की नेतृत्त्व की शैलियाँ अलग-अलग ज़रूर हैं, लेकिन उनका मक़सद एक ही है- टीम की जीत। मैंने उनसे यही सीखा है कि हर परिस्थिति में टीम को आगे लेकर जाना है। मैं मिसाल पेश करते हुए टीम का नेतृत्त्व करने में यक़ीन रखता हूँ। कप्तान के तौर पर मेरा मानना है कि अगुवाई करने वाले को पता होना चाहिए कि उसे कब दख़ल देना है और कब अपने साथियों को उनका निर्णय लेने की आज़ादी देनी है। मैं मानता हूँ कि हर खिलाड़ी की अपनी शैली होती है। सब अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं। सबका पालन-पोषण अलग तरीक़े से हुआ होता है। सबके सोचने-समझने का तरीक़ा अलग होता है। सबका व्यक्तित्त्व अलग-अलग होता है। ऐसे में नेतृत्त्व करने वाले को पता होना चाहिए कि कहाँ उसकी ज़रूरत है और कहाँ नहीं। तभी अच्छे नतीज़े हासिल किए जा सकते हैं और मैं कप्तान के तौर पर अपनी भूमिका में यही करने वाला हूँ।” 

है न रोचक-सोचक और प्रेरक बातें? इसीलिए शीर्षक में सबसे पहले लिखा, ‘शुभमन’ यानि अच्छे मन से सुनिए!

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Neelesh Dwivedi

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