देखिएगा, ज़िन्दगी कहीं ‘चेरापूँजी’ तो नहीं हो गई है!

टीम डायरी

ये जो शीर्षक है, मज़ाकिया नहीं है। गम्भीरता से पूछा गया सवाल है। दरअस्ल, आज 28 अप्रैल को एक अहम ख़बर पढ़ी। मेघालय के चेरापूँजी से सम्बन्धित। उत्तर-पूर्व के ख़ूबसूरत प्रदेश मेघालय में स्थित इस जगह को सोहरा भी कहा जाता है। कुछ समय तक पहले तक यह दुनिया में सबसे ज़्यादा बारिश वाली जगह के तौर पर जाना जाता था। अब हालाँकि यह हैसियत मेघालय की ही एक दूसरी जगह मॉसिनराम को मिल गई है। वहाँ दुनिया में सबसे अधिक बारिश दर्ज की जाती है, पिछले कुछ सालों से। पर उसे छोड़िए। क्योंकि यहाँ बारिश के मसले की बात नहीं है। बल्कि चेरापूँजी से जुड़ी ख़बर में ज़िन्दगी का जो फलसफ़ा छिपा है, उस पर बात करनी है। 

असल में ख़बर में जो बताया गया उसके मुताबिक, चेरापूँजी पहले नम्बर पर भले न हो, पर वह अब भी दुनिया में सर्वाधिक बारिश वाले शीर्ष क्षेत्रों में एक है। इसके बावजूद वहाँ बरसों से पीने के पानी की कमी है। महिलाओं को रोज की ज़रूरत का पानी पाँच-10 किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है। यहाँ तक पीने के पानी की 20 लीटर की बाल्टी 50 रुपए में मिलती है। क्षेत्र आबादी 20 हजार के क़रीब है। उसकी सुविधा के लिए सरकारी स्तर पर नलों के जरिए पीने के पानी की आपूर्ति का बन्दोबस्त है। लेकिन पानी हफ्ते में एक बार ही मिल पाता है। 

अब सवाल हो सकता है कि जहाँ प्रकृति की इतनी मेहरबानी है कि सालभर पानी ही पानी है, वहीं के लोग पानी की कमी से क्यों जूझ रहे हैं? कैसे जूझ सकते हैं? तो इसका जवाब ये है कि यहाँ पानी गिरता तो ख़ूब है, पर ठहरता बिल्कुल नहीं। पठारी क्षेत्र की बनावट ऐसी है कि अब तक कोई ऐसा तरीक़ा विकसित नहीं हो पाया है जिससे बारिश के पानी को रोका जा सके। इसलिए पूरा बह जाता है। और यहाँ के लोग इफ़रात पानी होने के बावज़ूद पानी के लिए मोहताज रह जाते हैं। दुखी रहते हैं। और ज़नाब, यही इस इलाक़े से निकला ज़िन्दगी का फलसफ़ा है। 

दुनिया में ऐसे तमाम लोगों की चर्चा आए दिन ही सामने आती रहती है, जिनके पास भगवान का दिया सब कुछ होता है। फिर भी वे किसी न किसी बात पर दुखी रहते हैं। वे अपनी तक़लीफ़ का कारण नहीं जानते। ऐसे लोगों को चेरापूँजी की इस मिसाल पर विचार करना चाहिए। सोचना चाहिए कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वे ईश्वर की दी हुई और आस-पास ही बिखरी नेमत को सहेज नहीं पा रहे हैं? या उसे सहेजने के लिए किसी और का मुँह देख रहे हैं? अगर लोग इन सवालों का ज़वाब खोज पाएँ तो शायद उन्हें उनकी ख़ुशियों का रास्ता भी मिल जाए। अपने नज़दीक ही।

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Neelesh Dwivedi

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