इस दशहरे पर रावण संग ‘शूर्पणखा’ भी जलेगी…इन्दौर में, जो एक सीख दे जाएगी!

जीनत जैदी, दिल्ली

दशहरा हमारे देश का अहम त्योहार है। इसे हम हर वर्ष नवरात्रि के नौ दिन पूरे होने के बाद विजयदशमी के रूप में मनाते हैं। इसका नाम ‘विजयदशमी’ प्रतीक है कि यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के लिए मनाया जाता है। और इसी सिलसिले में अब इन्दौर से विजयदशमी में नया आयाम जुड़ रहा  है। 

खबर है कि इन्दौर के महालक्ष्मी नगर में इस बार दशहरा मैदान पर सिर्फ रावण का पुतलाभर नहीं जलाया जाएगा। वहाँ 11मुखी आधुनिक कलयुगी ‘शूर्पणखा’ का पुतला भी धूमधाम से जलाया जाएगा। ‘पौरुष’ नाम की एक स्थानीय संस्था की यह पहल है। जिले की एक विधायक ऊषा ठाकुर ने भी बताया है कि 11मुखी ‘शूर्पणखा’ उन महिलाओं के होंगे, जिन्होंने अपने पतियों या बच्चों को अपने-अपने स्वार्थ के कारण मार डाला।

ये महिलाएँ कौन हैं?  इनमें मेरठ की मुस्कान है, जिसने अपने पति को 35 टुकड़ों में काटकर ड्रम में भरकर दबा दिया। इन्दौर की ही सोनम रघुवंशी है, जिसने नवविवाहित पति को हनीमून के दौरान पहाड़ से धक्का देकर मरवाया। निकिता सिंहानिया है, जिसने पति को आत्महत्या के लिए मजबूर किया। रवीता भी है, जिसने पति को जहरीले साँप से डसवाकर मार डाला। सूचना सेठ है, जिसने चार साल के मासूम बेटे तक को मार दिया, ताकि उसका पति बच्चे से नहीं मिल सके। ऐसे ही, कुछ और औरतें हैं, जो प्रतीकात्मक रूप से जलाई जाएँगीं।  

इस बारे में हम थोड़ा गौर करें तो पाएँगे कि महिलाओं में ऐसी आपराधिक प्रवृत्तिरूपी बुराइयाँ आज समाज में तेजी से बढ़ रही हैं। ये वाकई दिल दहला देने वाली हैं। तो सवाल है कि जब पुरुषों के आपराधिक प्रवृत्ति को आज तक दशहरे के दिन रावण के पुतले के रूप में जलाया जा रहा है, तो महिलाओं के ऐसे आचरण को मुआफ क्यों किया जाना चाहिए? नहीं किया जा सकता। क्योंकि अपराध की कोई जाति नहीं होती। उसका कोई धर्म नहीं होता। ऐसे ही, अपराधी को भी लैंगिक आधार पर बाँटा नहीं जा सकता। वह चाहे पुरुष हो या महिला, बस अपराधी है। कानून भी अपराधियों के साथ महिला-पुरुष के आधार पर भेद नहीं करता, तो समाज क्यों करे?

लिहाजा, इन्दौर से ‘शूर्पणखा’ को जलाने की जो पहल की जा रही है, वह निश्चित रूप से एक मिसाल बनने वाली है। एक सीख बनने वाली है कि हँसते-खेलते परिवारों को उजाड़ने वाले अपराध, भले किसी ने भी किए हों, माफी के काबिल नहीं हैं। इस तरह की आपराधिक सोच का ध्वंस करना, उसका दहन करना जरूरी है। वक्त बदल चुका है। इसलिए अब सिर्फ पुरुषवादी आपराधिक प्रवृत्ति को प्रतीक रूप में जलानेभर से काम नहीं चलेगा। महिलावादी आपराधिक प्रवृत्ति को भी फूँकना जरूरी है, जो सिलसिला शुरू हो रहा है।  

जय हिन्द। 

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(ज़ीनत #अपनीडिजिटलडायरी के सजग पाठक और नियमित लेखकों में से है। दिल्ली से ही 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब उच्च शिक्षा के लिए बढ़ा रही हैं। इस उम्र में ही अपने लेखों के जरिए बड़े मसले उठाती है। अच्छी कविताएँ भी लिखती है। लेखन में स्वाभाविक रुचि है और इसी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं) 

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32 – इंसान इतना कमज़ोर कैसे हो रहा है कि इस आसानी से अपनी ज़िन्दगी ख़त्म कर ले?
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