क्या वाल्मीकि रामायण के साथ छेड़-छाड़ करने वालों ने श्रीराम की छवि को भी खंडित किया?

कमलाकांत त्रिपाठी, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से

राम और वाल्मीकि की समकालीनता (प्रक्षिप्त) उत्तरकाण्ड में पुन: प्रतिष्ठित होती है। इस सन्दर्भ में उत्तरकाण्ड के सर्ग-45, 49, 65, 66, 71, 72, 93, 94, 96, 97 और 98 द्रष्टव्य हैं।

सर्ग-45–सीता-केन्द्रित लोकनिन्दा से अवगत होने पर, तीनों भाइयों के साथ परामर्श करने और उनकी एकराय का कठोर राजधर्म के आधार पर खण्डन करने के बाद, राम लक्ष्मण से सीता को वन में छोड़ने के लिए कहते हैं। उन्हें हिदायत भी दे देते हैं, “गंगा के उस पार, तमसा के तट पर वाल्मीकि का आश्रम है, उसी के निकट निर्जन वन में सीता को छोड़ देना (श्लोक-17,18)।”

सर्ग-49—निर्जन वन में सीता को अकेली विलाप करते देखकर कुछ ऋषिकुमारों ने वाल्मीकि को इसकी सूचना दी। तदुपरान्त ऋषिकुमारों के साथ वाल्मीकि गंगातटवर्ती उस स्थान पर गए। दिव्यदृष्टि से सीता को पहचान लिया और उन्हें निर्दोष भी जान लिया। तब वे सीता को आश्रम के पास रहने वाली कुछ तापसी स्त्रियों के पास ले आए। उन्हें सीता का परिचय दिया। उनके निष्पाप होने की बात बताई और देखभाल के लिए उन्हीं को सौंपकर आश्रम लौट आए (श्लोक–1-23)।

सर्ग-65—राम की आज्ञा से लवणासुर का वध करने निकले शत्रुघ्न ने वाल्मीकि आश्रम में एक रात बिताई (श्लोक–2-7)।

सर्ग-66—उसी रात सीता के जुड़वाँ पुत्र उत्पन्न हुए। मुनिकुमारों से समाचार पाकर वाल्मीकि तापसी स्त्रियों के आवास-खण्ड में स्थित सीता की पर्णकुटी तक गए। आवश्यक व्यवस्थाओं का निर्देश दिया और पुत्रों का नामकरण किया। ख़बर पाकर शत्रुघ्न भी रात में ही वहाँ पहुँच गए (किन्तु वाल्मीकि के साथ नहीं) और सीता का दर्शन किया।

सर्ग-71—लवणासुर के वध के बाद अयोध्या लौटते समय शत्रुघ्न पुन: वाल्मीकि-आश्रम पधारे। वहाँ भोजन किया, लव-कुश को बिना देखे रामायण का गायन सुना। सुनकर विस्मित भी हुए। किन्तु गायकों के बारे में बिना कुछ पूछे, अपने शिविर लौट गए।

सर्ग-72—प्रात:काल शिविर में नित्यकर्म से निवृत्त होकर शत्रुघ्न पुन: वाल्मीकि आश्रम आए। किन्तु इस बार भी सीता के पुत्रों—रामायण-गायकों–के बारे में कोई जिज्ञासा व्यक्त नहीं की। वाल्मीकि की आज्ञा लेकर वे अयोध्या के लिए प्रस्थान कर गए।

लवणासुर अभियान में 12 साल लग गए थे। वाल्मीकि-आश्रम में शत्रुघ्न के दोनों पड़ावों के बीच के अन्तराल में लव-कुश 12 वर्ष के हो गए थे। रामायण यादकर उसका गायन करने लगे थे। किन्तु शत्रुघ्न ने दूसरे पड़ाव में न तो उनके बारे में कुछ पता लगाया, न ही वहाँ से अयोध्या लौटकर सीता और लव-कुश के बारे में राम को कुछ बताया। सात दिन अयोध्या में रहने के बाद, राम के आदेश पर, शत्रुघ्न यमुनातटवर्ती मधु प्रदेश की राजधानी मधुपुरी चले गए। राम ने उन्हें लवणासुर के वध के बाद वहाँ उसके अत्याचारों से पीड़ित रही मधु प्रदेश की प्रजा राजा के रूप में अभिषिक्त कर दिया था (सर्ग-63)।

सर्ग-93—राम ने जब नैमिषारण्य में गोमती के तट पर अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया, वाल्मीकि अपने शिष्यों के साथ (उन्हें क्यों नहीं बुलाया गया?) उसमें पधार गए। ऋषियों के लिए बने कुटीरों के पास अपने और अपने शिष्यों के रहने के लिए पर्णकुटीर बनवाकर उन्हीं में रहने लगे। उन्होंने अपने दो हृष्ट-पुष्ट शिष्यों (लव-कुश) को आदेश दिया कि वे चारों ओर घूम-घूम कर रामायण का गायन करें। विशेषकर राम के निवास और यज्ञ के ऋत्विजों के सामने। उन्हें यह भी सिखा दिया कि यदि राम उनसे पूछें कि वे किसके पुत्र हैं तो उत्तर में अपने को केवल ‘महर्षि’ वाल्मीकि का शिष्य बताएँ। लव-कुश द्वारा तदनुरूप घूम-घूम कर वीणावादन के साथ संगीत की उत्कृष्ट और त्रुटिहीन पद्धति से किए जा रहे गायन को राम ने सुन लिया। भरत को उन्हें अठारह-अठारह हज़ार स्वर्णमुद्राएँ पुरस्कार में देने को कहा। भरत उन्हें स्वर्णमुद्राएँ देने लगे तो दोनों ने अस्वीकार करते हुए कहा, “हम वनवासी हैं। जंगली फल-फूल से निर्वाह करते हैं। सोना लेकर क्या करेंगे?” तब राम ने दोनों से पूछा, “जो महाकाव्य आप गा रहे हैं, उसकी श्लोक-संख्या कितनी है? उसके रचयिता कौन हैं? और वे कहाँ रहते हैं?” दोनों ने बताया, “इस महाकाव्य में 24 हज़ार श्लोक हैं। इसके रचयिता भगवान्‌ वाल्मीकि हैं। वे इस यज्ञ में पधारे हुए हैं।” तब यज्ञ के आयोजन में आए राजाओं और ऋषियों के साथ बैठकर राम ने रामायण का विधिवत्‌ गायन सुना। जो राम की अपनी ही कथा थी। किन्तु उसमें सीता की (प्रक्षिप्त) त्रासदी शामिल नहीं की गई थी

सर्ग-95—इस तरह कई दिनों तक राम ऋषियों, राजाओं और वानरों के साथ रामायण का गायन सुनते रहे। तब उन्होंने वाल्मीकि के पास शुद्ध आचार-विचारवाले दूतों के माध्यम से सन्देश भेजा, “यदि सीता का चरित्र शुद्ध है, उनमें किसी तरह का पाप नहीं है, तो आपकी अनुमति लेकर वे कल सुबह यहाँ भरी सभा में आएँ और जनसमुदाय के सामने अपनी शुद्धता प्रमाणित कर मेरा कलंक दूर करें।” [कैसी दुराग्रही क्रूरता! प्रजा की नहीं, स्वयं राम की, जिन्होंने युद्धकाण्ड में बेहद अप्रिय दृश्य उपस्थित कर सीता को अग्निपरीक्षा के लिए बाध्य किया था।] वाल्मीकि ने सन्देश सुनकर कहा, “ऐसा ही होगा [वहाँ सीता कहाँ थीं? वाल्मीकि आश्रम से नैमिषारण्य के यज्ञस्थल तक वाल्मीकि और उनके शिष्यों के साथ सीता के भी आने का उपरोक्त सर्ग-93 में कोई उल्लेख नहीं है।]

सर्ग-96—दूसरे दिन सुबह-सुबह राम यज्ञशाला पहुँचे। सभी ऋषियों को वहाँ बुलाया। कुछ बिना बुलाए, कौतूहलवश भी आ गए। महापराक्रमी राक्षस और महाबली वानर भी कौतूहलवश वहाँ इकट्ठे हो गए। नाना देशों से पधारे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हज़ारों की संख्या में आ जुटे। इस जमावड़े के बारे में सुनकर वाल्मीकि जी सीता को साथ लेकर शीघ्र वहाँ पहुँच गए। सीता तपस्विनी का गेरुआ वस्त्र पहने हुए थीं। वे वाल्मीकि के पीछे-पीछे, सिर झुकाए, दोनों हाथ जोड़े हुए चल रही थीं। उनकी आँखों से झर-झर आँसू गिर रहे थे। वे लगातार अपने हृदय में राम का ध्यान कर रही थीं। जनसमुदाय के बीच पहुँचकर वाल्मीकि राम से बोले, “सीता उत्तम व्रत का पालन करनेवाली, धर्मपरायणा हैं। आपने लोकापवाद से डरकर उन्हें मेरे आश्रम के निकट छोड़ दिया था। लोकापवाद से भयभीत आपको सीता अपनी शुद्धता का विश्वास दिलाना चाहती हैं। आप आज्ञा दें। ये दोनों कुमार कुश और लव सीता के गर्भ से जुड़वाँ उत्पन्न हुए हैं। ये आपके ही पुत्र हैं और आपके ही समान दुर्धर्ष वीर हैं। हे राम, मैं प्रचेता (वरुण) का दशम पुत्र हूँ। मेरे मुँह से कभी असत्य नहीं निकला है। मैं सत्य कहता हूँ, ये दोनों आपके ही पुत्र हैं। मैंने कई हज़ार वर्षों तक तपस्या की है। यदि सीता में कोई दोष हो तो मेरी तपस्या का फल नष्ट हो जाए…. (श्लोक 16-20)।” अपनी सत्यनिष्ठा पर वाल्मीकि का वक्तव्य सर्ग के अन्तिम श्लोक 24 तक जारी रहता है।

सर्ग-97—अपनी ज़िद पर अड़े राम ने वाल्मीकि को उत्तर दिया‌‌, “आपके निर्दोष वचनों से मुझे सीता की शुद्धता पर पूरा विश्वास हो गया है। एक बार पहले भी (युद्धकाण्ड में अग्निपरीक्षा से) सीता की शुद्धता का प्रमाण मुझे प्राप्त हो चुका है जिसके कारण मैंने इन्हें अपने घर में स्थान दिया था। किन्तु आगे चलकर घोर लोकापवाद उठा। इससे विवश होकर मुझे इनका त्याग करना पड़ा। यह जानते हुए भी कि सीता सर्वथा निष्पाप हैं, मैंने केवल समाज के भय से इनका परित्याग किया। मैं यह भी जानता हूँ कि ये जुड़वाँ पुत्र मेरे ही हैं। किन्तु अब तो जनसमुदाय के बीच सीता के शुद्ध प्रमाणित होने पर ही मेरा इनसे (पुत्रों से) प्रेम हो सकता है।” तब सीता ने कहा, “राम के सिवा किसी अन्य पुरुष की ओर मेरा कभी चित्त तक नहीं गया। यदि मैं मन, वाणी और कर्म से केवल राम की ही आराधना करती हूँ, उनके अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष को नहीं जानती तो भगवती पृथ्वी मुझे अपनी गोद में स्थान दें (श्लोक-15-16)।”

सीता के इस प्रकार पृथ्वी की शपथ लेते ही भूतल से एक दिव्य, सुन्दर सिंहासन प्रकट हुआ। दिव्य रत्नों से विभूषित, महापराक्रमी नागों ने उसे सिर पर धारण कर रखा था। सिंहासन के साथ ही पृथ्वी की अधिष्ठात्री देवी भी अपने दिव्य रूप में प्रकट हो गईं। दोनों भुजाओं से उन्होंने सीता को अपनी गोद में उठाया और सिंहासन पर आसीन करा दिया। सिंहासन पर विराजमान सीता जब रसातल में प्रवेश कर रही थीं, देवगण आकाश से पुष्पवर्षा कर रहे थे। सीता का भूतल में प्रवेश देखकर वहाँ उपस्थित कुछ लोग हर्ष (?) में तो कुछ विषाद में डूब गए। दो घड़ी तक सभी मोहाच्छन्न-से जड़वत्‌ बने रहे (श्लोक-17-26)। अगले सर्ग में राम के शोक का विस्तार से वर्णन है।

[उत्तरकाण्ड का उपरोक्त विवरण इतना ढीला-ढाला, असम्बद्ध और अयुक्तियों तथा अत्युक्तियों से भरा हुआ है कि संक्षेप में गम्य बनाने के लिए काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी है।]

ध्यान देने की बात है कि प्रक्षेपकों ने प्रबन्ध की अपनी अधकचरी क्षमता और असन्तुलित दृष्टि के चलते राम को कहीं तो ईश्वरत्त्व से महिमामंडित कर अतिमानव बना दिया है तो कहीं औसत मनुष्यता से भी नीचे गिरा दिया है। युद्धकाण्ड में राम के कटु, कठोर किन्तु प्रिय जीवनसाथी के प्रति मानवोचित असुरक्षा-भाव से उपजे सन्देह, ईर्षा और अविश्वास के भावों ने सीता को अग्निपरिक्षा की ओर ठेला। इसके बावजूद उत्तरकाण्ड के प्रक्षेपकों ने पहले तो राम की आत्यन्तिक रूप से लोकापवाद-भीरु, एक कमज़ोर राजा की छवि गढ़ते हुए उनसे गर्भवती सीता का परित्याग कराया। फिर तथ्य को भलीभाँति जानते हुए भी राम को अपने असंवेदनशील दुराग्रह पर अड़ा हुआ दिखाकर उन्हें निरपराध सीता की मृत्यु का भी कारण बना दिया।

उत्तरकाण्ड के शम्बूक प्रसंग में भी यही असंवेदनशीलता अपने अधिक क्रूर, अधिक अमानवीय संस्करण में दिखती है। यह वाल्मीकि की प्रबन्ध-शैली नहीं है। वाल्मीकि ने अतिप्राचीन काल से लोक में प्रचलित रामकथा के महत्वपूर्ण अंश राम की यात्रा को एक सुव्यवस्थित महाकाव्य का रूप प्रदान किया था। उनके लिए राम एक आदर्श पुरुष, आदर्श राजा हैं, लोकनायक हैं, जीवनमूल्यों की रक्षा के लिए सब कुछ न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं। किन्तु हैं मनुष्य ही, मनुष्य की संवेदना, उसके राग-विराग, उसकी मानवीय कमज़ोरियों से शासित होते हैं, उनसे त्रुटियाँ भी होती हैं। वे उनका परिमार्जन भी करते हैं। अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक उनका यह चरित्र सुसंगत एकरूपता में प्रतिबिम्बित होता है। किन्तु प्रक्षेपकों ने जहाँ बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड जोड़कर कथा के अभिप्रेत और उसकी अन्विति को नष्ट कर दिया, वहीं अन्य काण्डों में भी यत्र-तत्र छिटपुट श्लोक घुसाकर राम की वाल्मीकि-निर्मित आदर्श मनुष्य, उदात्त लोकनायक की छवि को भी ऊपर उठाकर या नीचे गिराकर खंडित कर दिया।  
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(उत्तर प्रदेश की गोरखपुर यूनिवर्सिटी के पूर्व व्याख्याता और भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी रहे कमलाकांत जी ने यह लेख मूल रूप से फेसबुक पर लिखा है। इसे उनकी अनुमति से मामूली संशोधन के साथ #अपनीडिजिटलडायरी पर लिया गया है। इस लेख में उन्होंने जो व्याख्या दी है, वह उनकी अपनी है।) 
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