मेरे प्यारे गाँव, शहर की सड़क के पिघलते डामर से चिपकी चली आई तुम्हारी याद

दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश

मेरे प्यारे गाँव 

मैने पहले भी तुम्हें लिखा था कि तुम रूह में धँसी हुई कील हो। मेरी आत्मा का हाहाकार हो। प्यारे, तुम्हारी याद किसी बिछड़ी हुई प्रेमिका के बिछोह वाली नहीं है, जो बिरह की पीड़ा की टीस से कलेजा छलनी कर जाए। तुम्हें याद करना तो हमेशा सुख से भर देता है। कितनी ही स्मृतियों का संसार घुमड़ने लगता है। तुम्हारी सुनहरी धूप की तरह तुम्हारी यादों का लेप भी आत्मा का हर ज़ख़्म भर देता है। तुमसे उपजा प्रेम रूहानी है। उसी प्रेम के धागे से बुनी सुनहरी स्मृतियों की पोटली से छिटक कर आज एक याद का फाहा मेरी आँख की पुतली में आकर ठहर गया है। गोया कि उसमें किसी और दृश्य की कोई झलक ही नहीं दिखाई देती है। मैं भी बस वहीं ठिठक के रह गया हूँ। उसी याद के फाहे से जैसे ध्यान के तार जुड़ गए हों और यूँ समाधिस्थ होकर परम शान्ति महसूस हो रही है। 

मेरे प्यारे

तुम्हें तो पता भी नहीं होगा कि इस देह को भेदती गर्मी में जब शहर की सड़कों का पिघलता डामर गाड़ी के पहियों से चिपकता है, तो उसके साथ इक ऊब भी चिपक जाती है। हाँ, वो तुम्हारी ऊब है। यक़ीनन तुम्हारी, ठीक उसी वक़्त गाड़ी का पहिया धीमा हो जाता है और पहिए से चिपकते डामर से गाँव की याद चिपक कर चली आती है। सड़क से होता हुआ दिल अक्सर गाँव की कच्ची गली में उतर जाता है, जो गर्मी में आम के बगीचे तक ले जाती है। बगीचे में झूमता मिलता है वो अल्हड़ मदमस्त बचपन। आम की डाली का झूला, नदी का बहता पानी, कुएँ में बना कबूतर का घोंसला, अमराई में ही बना आम का पाल, पेड़ के नीचे बनी झोपड़ी और पके आम के साथ घर की रोटी का स्वाद। ये सब एक साथ अन्दर तक घुल जाता है। लगता है कि जैसे आम की मिठास में ही जीवन का सारा सार समाया है। तुम्हारी अमराई से आम तोड़कर पान किए आमरस में तो मानो अमृत का स्वाद हो, क्योंकि मैने तो उसी आमरस से अमरत्व चखा है। मुझे असल में अमरत्व की चाह नहीं है। मेरे लिए उसमें उतना रस ही नहीं है, जो तुम्हारी मिट्ठी की ख़ुशबू और गलियों में घुला मिलता है।

मेरे प्यारे

जब अलसाई सुबहों से घुलती तपन शाम के साथ-साथ ढलती है, तो दूर शहर की सबसे ऊँची इमारत के नीचे सूरज छिपता है। लेकिन वहीं तुम्हारे पास गाँव में खेत से लगा मैदान अपने दूसरे छोर पर ही सूरज को निगल लेता है। लगता है कि जैसे ढलता सूरज मैदान के दूसरे छोर से जमीन में ही समा गया है। कितने ही अलग- अलग दृश्य हैं तुम्हारे पास, जिनमें सूरज डूबने की स्मृतियाँ मेरी आत्मा में कैद हैं। कभी तालाब किनारे खुद को बैठा हुआ पाता हूँ, तो लगता है कि ये आग उगलता हुआ जलता सूरज तो तालाब के दूसरे छोर पर पानी में ही बुझ जाता है। मुझे गाँव में बनी वो ऊँची सी पानी की टंकी अब भी याद आती है, जिसका पानी भले ही मैने न पिया हो लेकिन न जाने कितनी शामें उसकी छत की मुंडेर पर बैठकर सूरज को ढलते हुए देखकर गुजारी हैं। अहा! कितना सुखद एहसास था वह। ढलते सूरज के साथ भीषण गर्मी की शान्त होती तपिश और मन्द- मन्द चलती पुरवइया सुकून से भर देती है। इसीलिए तुम्हारी सुबह और शाम कितनी अलग सी महसूस होती है।

मेरे प्यारे

तुम कभी-कभी अन्दर तक धँस जाते हो। या यूँ कहूँ कि वहीं मेरे अन्तस में जो समाया है,वो बाहर भी झलक जाता है। इस ऊब भरे गर्मी के मौसम में जब शहर की चिल्ल-पों के बीच ये तपन देह को भेदती है तो गाँव के बाग की लू भी जैसे चेहरे को चूम जाती है। किसी नुक्कड़ पर कुछ ताश के पत्ते उछल रहे हैं तो अगले नुक्कड़ पर चौसर सजा दिखता है। घर के किसी कोने में चन्दा-गोटी कौड़ियों के साथ बिछा है और दोपहर अपनी रवानी में धीरे-धीरे खिसक रही है। शाम होते ही ढोर खेत से लौटते हैं, जिन्हें गर्मियों में फसल कटते ही ऐरा (आवारा) कर दिया गया है। यूँ तो वो अक्सर लौट आते हैं, मगर जेठ भर उन्हें मनमर्जी से खेत, मैदान, बगीचे और बावड़ी किनारे चरने की छूट है। भला फिर ऐसे में वो क्यों इस मौज से वंचित रहें, सो गर्मियों में जानवर अक्सर थोड़ी देर से लौटते हैं। उनके लौटते ही मोहल्ले भर के कुत्ते चौराहे में जमा होकर भौंकना शुरू कर देते हैं। तब जाकर पता चलता है कि ये गोधूलि का समय है। अब आँगन में बने तुलसी के चौरे पर दिया जलाने का वक़्त भी हो चला है। कुछ देर बाद ही गाँव के प्राचीन शिवालय के घन्टे सुनाई देने लगते हैं। इतने में ही तुम्हारे ध्यान में डूबे मेरे जैसे योगी की समाधि टूट जाती है। क्योंकि अनायास ही मेरा हाथ बाइक का एक्सिलेटर बढ़ा देता है और गाड़ी का पहिया तेज हो जाता है…शहर की सड़क का डामर उस पर चिपकना छोड़ देता है और गाँव, तेरी याद दूर छिटक जाती है….गाड़ी आगे निकल जाती है…..। आम का मौसम है या गाँव की ऊब का। ये गर्मी पसीना ही नहीं यादें भी निचोड़ती है जो अन्दर से पसीने के साथ बह निकलती हैं।

‘तुम्हें यादों में जीते हुए एक रोज आवारा। मैं तुम्हें फिर लिखूॅगा तब तक अपना ख़्याल रखना।’

कभी ये चन्द लाइन भी लिखी थीं तुम्हारे लिए सो ये भी तुम्हें समर्पित है।

‘ख्वाबों पे जब नींद का पहरा हो जाए
यादों का आसमान गहरा हो जाए।
वहीं ठिठके मिलेंगे बारिशों में भीगते ‘आवारा’
ढूँढ लेना इससे पहले के सावन में कोहरा हो जाए।।’

तुम्हारा, सिर्फ़ तुम्हारा

दीपक
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#आवाराकीडायरी #बेपतेकीचिट्ठियाँ #आवाराकीचिट्ठियाँ #गाँवकेनामपाती 

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पिछली चिटि्ठयाँ 

2 – अपने गाँव को गाँव के प्रेमी का जवाब : मेरे प्यारे गाँव तुम मेरी रूह में धंसी हुई कील हो…!!
1- गाँव की प्रेम पाती…,गाँव के प्रेमियों के नाम : चले भी आओ कि मैं तुम्हारी छुअन चाहता हूँ! 

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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर दिया करते हैं। उन उकेरी हुई अनुभूतियों काे #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक भी पहुँचें। यह श्रृंखला उन्हीं प्रयासों का हिस्सा है।)

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