नोबेल की लूट है, लूटत बने तो लूट…, और डोनाल्ड ट्रम्प नोबेल लूट ले गए!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

कबीर दास जी कह गए थे, “राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। पाछे फिर पछताएगा, प्राण जाहि जब छूट।।” लगता है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस दोहे को कुछ ज्यादा गम्भीरता से ले लिया। हालाँकि, भगवान के बजाय नोबेल शांति पुरस्कार के सन्दर्भ में। उन्हें ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ पाने की ऐसी सनक चढ़ी कि पहले तो वह 2025 में लगभग पूरे सालभर अपने आपको इस सम्मान का सच्चा हकदार बताते रहे। भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्ष और ऐसे ही कोई आठ युद्ध रुकवाने के बार-बार ‘झूठे दावे’ करते रहे। इतना ही नहीं, नोबेल पुरस्कार देने वाली समिति और उससे सम्बन्धित देश नॉर्वे पर तमाम हथकण्डों से दबाव बनाने रहे कि उन्हें ही यह सम्मान मिले। मगर उनकी नहीं सुनी गई। या यूँ कहें कि उनके हथकण्डों को अनदेखा कर दिया गया।

साल 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार वेनेजुएला की नेता मारिया कोरिना मचाडो को दिया गया। बताया गया कि मारिया ने ‘अपने देश में लोकतंत्र की बहाली और तानाशाह राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सत्ता से बेदखल करने के लिए लगातार संघर्ष किया है। इसलिए वह सम्मान की सच्ची हकदार हैं।’ यह बात दीगर है अलबत्ता कि तमाम संघर्ष के बाद भी मादुरो को वह सत्ता से बेदखल कर नहीं पाईं। लेकिन ठीक है, सम्मान तो मिला कम से कम। मगर अब ट्रम्प क्या करते? उनके हाथ तो खाली ही रह गए। हालाँकि पुरस्कार लेते वक्त मारिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति को भी इस बात का श्रेय दिया था कि उन्होंने वेनेजुएला में लोकतंत्र की बहाली के लिए पूरा समर्थन दिया। 

लेकिन इतने श्रेय मात्र से तो डोनाल्ड ट्रम्प का काम नहीं ही चलना था! उन्हें तो नोबेल चाहिए था। ऐसे नहीं तो वैसे, या कैसे भी। कबीर दास जी के दोहे की अगली लाइन उनके दिमाग में बैठ गई थी शायद, “पाछे फिर पछताएगा, प्राण जाहि जब छूट।” इतना बड़ा जोखिम वह नहीं ले सकते थे। उन्हें पीछे पछताना नहीं था। प्राण छूट जाने से पहले इसी जीवनकाल में नोबेल चाहिए था। लिहाजा, उन्होंने वेनेजुएला पर हमले के लिए अपनी सेना भेज दी। अमेरिकी सेना ने रातों-रात वेनेजुएला के सत्ता प्रतिष्ठानों पर कब्जा किया। राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी को उनके घर से खींचकर बाहर निकाला गया, मानो वे कोई ‘कुख्यात अपराधी’ हों। उन्हें बंधक बनाकर अमेरिका लाया गया, जहाँ वे अभी जेल में हैं। इस तरह, एक झटके में ‘वेनेजुएला में लोकतंत्र बहाल’ हो गया

सो, अब बारी मचाडो की थी। वह यही तो चाहती थीं। हालाँकि, कोई और इच्छा भी हो तो बड़ी बात नहीं, वेनेजुएला की राष्ट्रपति बनने की। आखिर, राजनीति आजकल सत्ता तक पहुँचने के लिए ही तो की जाती है। और मचाडो को वेनेजुएला की सत्ता डोनाल्ड ट्रम्प को खुश किए बिना मिल नहीं सकती। यह बात उन्हें अच्छी तरह पता है। लिहाजा, उन्होंने समय गँवाए बिना घोषणा कर दी कि वह अपना नोबेल शांति पुरस्कार ट्रम्प के साथ बाँटेंगी। वह भी इसमें बराबर के हकदार हैं। और अपनी घोषणा के मुताबिक, उन्होंने शुक्रवार, 16 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यालय में जाकर उन्हें यह पुरस्कार सौंप भी दिया। इस तरह, एक झटके में  डोनाल्ड ट्रम्प खुश! माँगकर न सही, लूटकर-छीनकर सही, उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार अपने हाथ में लेने का मौका मिल ही गया!! 

अब यह बात भी अलग है कि नोबेल शांति पुरस्कार देने वाली समिति ने स्पष्ट शब्दों में कहा है, “नोबेल पुरस्कार विजेता अपना सम्मान किसी के साथ बाँट नहीं सकते। यद्यपि वह अपना पदक, प्रमाण पत्र, पुरस्कार राशि जैसे भी चाहें, वैसे उपयोग कर सकते हैं। लेकिन सम्मान किसी के साथ साझा नहीं किया जा सकता। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सिर्फ व्यक्ति वही माना जाएगा, जिसे चयन समिति ने चुना है।” मतलब, आधिकारिक रूप से नोबेल शांति पुरस्कार की विजेता मारिया ही रहेंगी, ट्रम्प नहीं। मगर इससे ट्रम्प को फर्क नहीं पड़ने वाला शायद। उन्होंने आधिकारिक न सही, अधिकार से, फौज के बलबूते खुद को ‘नोबेल विजेता’ बना लिया। 

क्या जबर्दस्त प्रहसन (हास्य नाटक) है न? दरअसल, विश्व राजनीति में इन दोनों यही चल रहा है। क्योंकि जिस देश को दुनिया में सबसे ताकतवर, विकसित और समृद्ध कहा जाता है, उसकी सत्ता के शीर्ष पर एक ‘सनकी शासक’ बैठा हुआ है। इस किस्म के शासकों ने अक्सर अपने देश ही नहीं, दुनिया में भी अस्थिरता पैदा की है, इतिहास इस बात का गवाह है। डोनाल्ड ट्रम्प के तौर-तरीके भी उसी दिशा में आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। फिर चाहे वह आव्रजन (इमिग्रेशन) नीति के नाम पर अपने देश के लोगों पर अत्याचार करने का मामला हो या निजी व्यावसायिक लाभ के लिए पाकिस्तान के जिहादी फौजी शासक आसिम मुनीर से गठजोड़ करने का मुद्दा। भारत जैसे साफ छवि वाले देशों पर दबाव बनाने के लिए अनाप-शनाप सीमा शुल्क लगाने की बात हो या यूरोपीय संघ जैसे पुराने सहयोगियों को दरकिनार कर डेनमार्क के अधिकार वाले ग्रीनलैण्ड पर कब्जा करने की कोशिश का मसला हो। ट्रम्प का हर कदम यही संकेत दे रहा है कि वह आज नहीं तो कल दुनिया को किसी खतरनाक मोड़ पर लाकर छोड़ेंगे। 

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के भागीदार होने के नाते हम भारतीयों को अपने और देश के भविष्य के लिहाज से इससे सबक जरूर लेना चाहिए। अच्छी तरह समझना, याद रखना चाहिए कि सनकी और मसखरे किस्म के लोगों के हाथ में सत्ता की कमान सौंपने का नतीजा क्या होता है।  

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Neelesh Dwivedi

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