प्रतीकात्मक तस्वीर
नीलेश द्विवेदी, भोपाल, मध्य प्रदेश से
…. तुम तो नदी की धारा के साथ दौड़ रहे हो।
उस सुख को कैसे समझोगे,
जो हमें नदी को देखकर मिलता है।
और वह फूल तुम्हें कैसे दिखाई देगा,
जो हमारी झिलमिल अँधियारी में खिलता है।…
… तुम जी रहे हो,
हम जीने की इच्छा को तौल रहे हैं।
आयु तेजी से भागी जाती है,
और हम अँधेरे में जीवन का अर्थ टटोल रहे हैं।
—–
ये कुछ पंक्तियाँ हैं, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘शोक की सन्तान’ से। बहुत गहरे और सार्थक अर्थों वाली यह पूरी कविता ऑडियो में सुनिएगा। नीलेश द्विवेदी की आवाज़ में। जितना आनन्द आएगा, जितनी ‘रोचक’ यानी दिलचस्प लगेगी, उतनी ‘सोचक’ भी मतलब आप सोचने पर विवश भी होंगे। (कविता कोष से साभार)
अभी सोमवार, 20 जुलाई को संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ। इससे कुछ समय पहले… Read More
कलि युग में भक्ति मार्ग पाखण्ड से घिरा रहता है, इसलिए भगवान के भजन-पूजन, नाम… Read More
शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधार और केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग… Read More
भाषा को लेकर बेवजह की हाय-तौबा मची हुई इन दिनों। वजह वही, पीढ़ियों से भारतीय… Read More
जिन्दगी अपनी है, चुनाव भी अपने ही होते हैं। ऐसा अक्सर कहा जाता है। लेकिन… Read More