हम बच्चों को पढ़ाते हैं डॉक्टर-इंजीनियर बनने के लिए, और वे बन जाते हैं ‘भूत’!

नीलेश द्विवेदी, भोपाल मध्य प्रदेश

हाँ, यही सच है। कड़वी है, लेकिन सच्चाई है। हम अपने बच्चों को पढ़ाते-लिखाते हैं। ताकि वे डॉक्टर, इंजीनियर बनें। लेकिन वे बन क्या रहे हैं? ‘भूत’। हाँ, भूत, जिसके दो मतलब हैं। एक- अतीत मतलब बीता हुआ समय। और दूसरा- तक़लीफ़ में भटकती आत्माएँ। सनातन आध्यात्मिक पुस्तकों में लिखा है कि जो लोग आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उनका स्थूल शरीर (जो हमें आँखों से दिखता है) तो अन्तिम संस्कार से नष्ट हो जाता है। लेकिन ‘सूक्ष्म शरीर’ मन की पीड़ा लिए, अपनी मुक़्ति तलाशते हुए अन्तरिक्ष में भटकता रहता है। 

अब कोई आधुनिक सोच वाला इन पुस्तकों की बातें भले सिरे ख़ारिज़ कर दे, लेकिन वह इतना तो मानेगा ही कि आँखों में तमाम सपने लिए हुए कोई युवा अगर आत्महत्या करता है, तो उसका मन पीड़ा से मुक़्त नहीं हो सकता। भले उसका शरीर छूट गया हो। काम के लगातार बने हुए बोझ के कारण अगर मानसिक तनाव के नतीज़े में किसी युवा का दिल बैठ जाता है, दिल की धड़कनें थम जाती हैं या उसे मस्तिष्क आघात हो जाता है, तब भी देह छूट जाने के बावज़ूद उसका मन तक़लीफ़ से मुक़्त नहीं हो पाता होगा। भटकता ही रहता होगा। 

अलबत्ता, कुछ लोग इस तर्क को भी ख़ारिज़ कर सकते हैं। पर उन्हें भी यह मानना होगा कि जो बच्चे, जो युवा कुछ वक़्त पहले तक ‘वर्तमान’ थे, जिनकी आँखों में सुनहरे ‘भविष्य’ के सपने थे, वे चन्द पलों में ‘भूत’ हो जाते हैं। अतीत की बात हो जाते हैं। यानि, किसी भी तर्क से मानें, हमें यह मानना पड़ेगा कि अच्छे-ख़ासे बच्चों का, युवाओं का ‘वर्तमान’ से ‘भूत’ बन जाना आज की कड़वी सच्चाई बन है। इसके कुछ उदाहरण देखिए। 

अभी एक हफ़्ते पहले की बात है। साल 2017 में पूरे देश में मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में अव्वल आने वाले मुक्तसर, पंजाब के डॉक्टर नवदीप सिंह ने आत्महत्या की। वे 25 साल के थे। चिकित्सा विज्ञान में स्नातक (एमबीबीएस) कर लेने के बाद फिलहाल दिल्ली के एक संस्थान से स्थानकोत्तर (एमडी) की पढ़ाई कर रहे थे। इसी तरह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी में बिमलेश कुमार नाम के छात्र ने आत्महत्या की। वह 21 साल का था। वह वहाँ कंप्यूटर साइंस में स्नातक कर रहा था। आईआईटी गुवाहाटी में इसी साल इस तरह की यह तीसरी घटना थी। भोपाल, मध्य प्रदेश के नामी संस्थान मैनिट में रविवार, 22 सितम्बर को आदित्य नाम के छात्र ने आत्महत्या की। वहाँ कुछ समय पहले इसी तरह रेणुमााला नामक छात्रा ने भी आत्महत्या की थी। मध्य प्रदेश के ही इन्दौर में तो 11वीं के एक छात्र ने ख़ुदक़ुशी कर ली और पीछे लिखकर गया, “मौत सच्चाई है, हमें यह मानना होगा।” 

‘वर्तमान’ बच्चों, युवाओं के ‘भूत’ बन जाने के ये कोई गिने-चुने मामले नहीं हैं। इसी रविवार, 22 सितम्बर को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भोपाल के पूर्व निदेशक डॉक्टर सरमन सिंह ने अख़बारों में एक लेख लिखा है। इसमें बताया है कि देश में बीते पाँच साल के भीतर 119 डॉक्टरों ने आत्महत्या की है। जबकि आईआईटी में पढ़ने वाले या पढ़ चुके 39 युवाओं ने अपना जीवन समाप्त कर लिया है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) के 25 और राष्ट्रीय प्रबन्धन संस्थान (आईआईएम) से सम्बद्ध चार युवाओं ने इसी दौरान जान दी है। 

यही नहीं, उन्होंने लेख में बताया है कि चिकित्सा संस्थानों के कनिष्ठ चिकित्सक यानि जूनियर डॉक्टर सप्ताह में 80-80 घंटे तक काम कर रहे हैं। कभी-कभी इससे ज़्यादा भी। इस कारण 48% से अधिक चिकित्सक तनाव, अवसाद या ऐसी अन्य मानसिक समस्याओं से जूझते रहते हैं। मतलब, पहले पढ़ाई का दबाव, अच्छे नम्बर लाने का दबाव। फिर प्रतियोगी परीक्षाएँ पास करने का दबाव, उच्च शिक्षण के लिए बढ़िया संस्थानों में दाख़िला मिल जाए, इसका दबाव। और यह सब कर लेने के बाद जब नौकरी मिले, तो उसमें अधिक से अधिक काम का दबाव।

क्या हिन्दुस्तान में हमारे बच्चों के जीवन में सिर्फ़ इतना ही रह गया है? दबाव, तनाव, दबाव, तनाव, बस? अभी अन्ना सेबेस्टियन नामक केरल की  26 साल की लड़की का मामला दूरे देशभर में सुर्ख़ियों में है। वह सनदी लेखाकार (चार्टर्ड अकाउंटेंट) थी। ‘अर्न्स्ट एंड यंग’ नाम की बड़ी कम्पनी में चार महीने पहले ही उसकी नौकरी लगी थी। लेकिन जैसा कि उसकी माँ ने बताया, ‘अन्ना पर पहले ही दिन से काम का इतना बोझ डाल दिया गया कि उसे न ठीक से सोने मिलना, न खाने-पीने। आख़िर उसका दिल ज़वाब दे गया।” वह भी ‘वर्तमान’ से ‘भूत’ हो गई। 

अन्ना का मामला सामने आने के बाद केन्द्र सरकार ने इसकी जाँच का आदेश दे दिया है। केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तो एक अहम सुझाव भी दिया है। उन्होंने रविवार को ही एक कार्यक्रम के दौरान कहा, “विद्यालयों और महाविद्यालयों में अब यह भी विषय पढ़ाया जाना चाहिए कि तनाव और दबाव की स्थिति से कैसे निपटें।” आम बोलचाल की भाषा में इसे ‘स्ट्रेस मैनेजमेन्ट’ कहा जाता है। लेकिन यक़ीन मानिए, कोई विषय, कोई संस्थान बच्चों को उतना प्रभावी ‘स्ट्रेस मैनेजमेन्ट’ नहीं सिखा सकता, जितना उनके माता-पिता सिखा सकते हैं। 

अपने बच्चों को दबाव और तनाव से मुक्त करने के लिए हमें ही आगे आना होगा। भीड़तंत्र, भेड़चाल से अलग होकर उन्हें उनकी पसन्द का पेशा चुनने का हौसला सिर्फ़ और सिर्फ़ हम ही उनको दे सकते हैं। याद रखिए कि सबसे कारगर ‘स्ट्रेस मैनेजमेन्ट’ तभी होता है, जब काम करने वाले को उसके दिल की गइराई से काम करने में आनन्द आए। और यह आनन्द तभी आ सकता है, जब काम करने वाले की पसन्द का, शौक़ का काम हो।      

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Neelesh Dwivedi

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