आद्या दीक्षित, ग्वालियर, मध्य प्रदेश से, 21/6/2021
बीते छह सालों की तरह इस सातवें साल भी 21 जून को दुनियाभर में ‘अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस’ के आयोजन हुए। ख़ूब तस्वीरें दिखीं। तरह-तरह के आसन, प्राणायाम आदि करते हुए आम से ख़ास तक सब नज़र आए। बड़ा आयोजन-अवसर है तो ज़ाहिर तौर पर ऐसे अन्य मौकों की तरह बधाई, शुभकामना सन्देशों का भी खूब आदान-प्रदान हुआ। लेकिन योग जैसे इस अति-आवश्यक और अति-महत्त्वपूर्ण विषय पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ क्या? शायद नहीं। ज़रूरत ही नहीं समझी गई इसकी सम्भवत:। पर विचार-विनिमय होना चाहिए था। हम यहाँ वही कर रहे हैं।
इस विषय में एक तो यह बात याद रखने की है कि महर्षि पतंजलि से पूर्व भी योग विद्यमान था। हाँ, “योग दर्शन” का प्रतिपादन उन्होंने ही किया था। अपने अष्टांग योग के माध्यम से। लेकिन इसके बाद क्या हुआ? कालान्तर में हम योग से जुड़ी पाँच बातें पूर्णतः विस्मृत कर गए। याद रहीं बस तीन, जिनमें एक को भारी लोकप्रियता मिली यानि ‘आसन’। दूसरी के बहुत खंड-प्रखंड और विधियाँ बन गईं। यानि ‘प्राणायाम’, आदि। और तीसरी के तो विद्यालय खुल गए। बड़े विद्यालयों में इसे पढ़ना-सीखना ‘प्रतिष्ठा का प्रतीक’ बन गया। यह तीसरी चीज़, ‘ध्यान’।
इस विस्मृति या आधी-अधूरी स्मृति का असर क्या हुआ? ये कि आज हम आत्माविहीन देह के लिए भाँति-भाँति के ‘योगा’ (yoga) किया करते हैं। बहरहाल, अच्छा है ये भी। कम से कम देह के प्रति तो सजग हैं हम। उसे तो स्वस्थ्य रखने का जतन करते हैं।
परन्तु वास्तव में ये योग की संकल्पना का अणु आकार भाग मात्र है। पूरे वांग्मय को समझने में बहुत सी जटिलताओं से सामना होता है। कभी भाषा की, तो कभी भाव की। इसलिए मैं अक्सर गीता की सहायता ले लेती हूँ। वेदव्यास ने कितनी बार, कितने स्थानों पर, कितने प्रकार से समझाने का प्रयास किया। चेताया, संकेत दिए कि योग क्या है और क्यों आवश्यक है? पूरे 18 अध्यायों के नाम के साथ योग जुड़ा है। जैसे- विभूति योग, समत्व योग, कर्म योग, भक्ति योग, आदि। सबका अन्ततोगत्वा लक्ष्य यही कि कैसे, बाह्य प्रमादों और प्रलापों से स्वयं को असम्पृक्त रखा जाए। दूर रखा जाए। कैसे, निश्चित दिशा में सतत् सुनियोजित सक्रियता रखी जाए। ऊर्जा के क्षय को बचाया जाए। स्वयं के उत्थान हेतु सन्तुलन बनाए रखा जाए।
सन्तुलन, आत्मा-परमात्मा में। जीव-जगत में। भौतिक-अभौतिक में। मन-मस्तिष्क में। लौकिक-पारलौकिक में भी। सन्तुलन का ही तो चमत्कार है ये ब्रह्माण्ड। बस, उसी सन्तुलन को बनाए रखने की विभिन्न विधियाँ हैं। इनमें एक ये भी जो कहती है, ‘योगः चित्त-वृत्ति निरोधः’। यानि अपने चित्त और उसकी वृत्तियों का निरोध करो अर्थात् फ़िल्टर करो। मन के अनुसार और इच्छाओं के अधीन होकर मत चलो। उन्हें अपने अधीन कर चलाओ।
सांख्य के 24 तत्त्वों का मिश्रण उनका स्वामी बने तो ही वह सार्थक है। उठने वाली भावनाओं, इच्छाओं, कामनाओं, आवेगों, संवेगों, को नियंत्रित करना। उपयुक्त का चयन, अनुपयुक्त का क्षरण हमें ही करना है। मनुष्य जब ये सब कर सकने का सामर्थ्य रखता हो, अभ्यास करता हो और सफल होता हो तो यह निरोध, यह सन्तुलन यह आत्मावलोकन, आत्मविश्लेषण ही योग है।
सब कुछ तो समाहित हो गया इसमें…..न मनुष्य मोह के वशीभूत कोई ऐसा काम करेगा, जिससे उसके देह को कष्ट हो न आत्मा को, न किसी और को। समय पर निरपेक्ष भाव से अपने कर्मयोग का निर्वाह करेगा। उसमें माया को हावी नहीं होने देगा, तो क्यों कहीं कुछ बिगड़ेगा। यहाँ एक और बात ध्यान रखनी चाहिए कि ये इच्छाओं का बलात् दमन या शमन नहीं है और न स्वयं के प्रति हिंसा है। ये एक अभ्यास है। एक मानसिक स्तर है, जो हमें धरातल से थोड़ा सा ऊपर उठने को कहता है। एकांत की ओर अभिमुख करता है।
मेरा योग तो यही है। मैं इसी को साधने की कोशिश कर रही हूँ।
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(आद्या दीक्षित, छोटी उम्र से ही समाजसेवा जैसे बड़े कार्य में जुटी हैं। ऐसे कि उनके योगदान को अब राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर ख़ासी पहचान मिल चुकी है। मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें ‘बेटी बचाओ अभियान’ के लिए अपना प्रतिनिधि चेहरा (Brand Ambassador) बनाया है। जबकि भारत सरकार ने उन्हें 2015 में ‘बालश्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया है। )
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