हम अपने रत्नों का सही सम्मान करना कब सीखेंगे?

टीम डायरी, 2/7/2020

ये तस्वीर अपने आप में बहुत कुछ कहती है। वाराणसी की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र। शहनाई का दूसरा नाम कहे जाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ जैसे भारत-रत्नों की कर्मभूमि। जन्मभूमि। संगीत, कला, साहित्य, संस्कृति का धाम। बाबा विश्वनाथ की काशी। 

ऐसे और न जाने कितने तमगे हैं इस शहर कन्धों पर। इसीलिए कम से कम इस शहर से तो ऐसी तस्वीर की अपेक्षा नहीं ही की जानी चाहिए। लेकिन यह स्याह हक़ीक़त है। हर बारिश में उधड़कर ऐसे ही सामने आ जाया करती है।

बारिश का तो काम ही यही है। तमाम ऊपरी रंग-रोगन धो डालना। आवरण हटा देना। प्रकृति को उसके मूल स्वरूप में ले आना। भले वह वीभत्स ही क्यों न हो।

अभी जब पूरी दुनिया में कोरोना महामारी की ‘अन्धाधुन्ध बारिश’ हो रही है तो उसने भी ऐसे ही तमाम आवरण हटाए हैं। बहुत दूर जाने की जरूर नहीं। इसी बनारस से ताल्लुक रखने वाले ‘रत्न’ हैं पंडित छन्नूलाल मिश्र। हिन्दुस्तानी संगीत के बड़े शास्त्रीय गायक। इनकी हैसियत ऐसी कि जब नरेन्द्र मोदी पहली मर्तबा 2014 में चुनाव लड़ने बनारस आए तो उनके नामाँकन पत्र केे चुनिन्दा प्रस्तावकों में पंडित जी भी थे। लेकिन इसी अप्रैल-मई के महीने में कोरोना ने पहले उनकी पत्नी मनोरम मिश्र को उनसे छीन लिया। फिर बड़ी बेटी संगीता भी दुनिया छोड़ गई। पंडित जी आहत हुए। दुख से आहत होना स्वाभाविक था। लेकिन उनकी तक़लीफ़ बढ़ाई अस्पताल की (अ)व्यवस्थाओं ने। वे 20-25 दिन तक गुहार लगाते रहे कि अस्पताल में उनके परिजनों के इलाज़ में लापरवाही बरती जा रही है। पर उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। फिर जब सुनवाई हुई भी थी तो ऐसी कि जाँच समिति ने अस्पताल को पूरी तरह पाक-साफ करार दिया। पंडित जी के घर जाकर उन्हें जिला प्रशासन की ओर से यह जाँच रिपोर्ट भी सौंप दी गई। इसके बाद पंडित जी चुप साध गए। करते भी क्या!

बनारस से ही एक और ‘रत्न’ थे पंडित राजन मिश्र। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के आला दर्ज़े के गायक। छोटे भाई पंडित साजन मिश्र के साथ जोड़ी बनाकर गाया करते थे। इस मई के महीने में ही दिल्ली में पंडित राजन ने भी दम तोड़ दिया। कोरोना संक्रमण के इलाज़ के लिए उन्हें यहाँ लाया गया था। इस उम्मीद में कि ‘दिल्ली बड़े दल और दिल वालों की’ है। शायद पसीज जाए, अपने इस ‘रत्न’ को बचाने के लिए। लेकिन न। मज़ाल है जो ऐसा कुछ हो रहे। बताते हैं, आख़िरी वक़्त में पंडित जी के घरवाले दर-दर भटकते रहे कि कहीं वेंटिलेटर मिल जाए तो जीवन-रक्षा की आस बँधे। पर हुआ उलट कि उनके साथ जो कुछ भी बँधा था, सब बिखर गया। सुर, लय, ताल, आलाप, जोड़, जोड़ी, सब कुछ। इस पर बातें हुईं तो इसके बाद कुछ सरकारी लीपा-पोती शुरू हुई। बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय में सरकार ने जोर-शोर से पंडित राजन मिश्र के नाम से एक कोरोना केन्द्र बनाया। ख़ुद प्रधानमंत्री ने इसका शुभारम्भ किया। लेकिन अभी दो-चार दिन पहले ही ख़बर आई है कि यह केन्द्र बन्द कर दिया गया है। अस्थायी था। पंडित जी को श्रद्धांजलि देने की श्रद्धा बस इतनी ही थी। अस्थायी। 

कोरोना की बात चली है तो इस दौर में हमारी मानवता के लिए देश ही दुनियाभर में जो ‘असल रत्न’ आज साबित हो रहे हैं न, वे हैं चिकित्सक। डॉक्टर साहब। अभी एक जुलाई को ही चिकित्सकों को समर्पित दिवस (Doctor’s Day) मनाया गया। दुनियाभर में। ख़ूब बातें हुईं, उनके योगदान के बारे में। हमारी सरकार और उसके बड़े नुमाइन्दों ने भी कीं। लेकिन ये बातें भी आगे बताए जा रहे दो तथ्यों के बरअक़्स बस, शब्दांजलि ही थीं। इनमें एक तथ्य तो यह है कि कोरोना संक्रमण से हमारा इलाज़ करते हुए देश के 700 से अधिक चिकित्सक जान गवाँ चुके हैं। आँकड़ा इससे अधिक ही होगा, कम नहीं। दूसरा तथ्य ये है कि भारत सरकार ने देश की सबसे बड़ी अदालत में कहा है कि वह ‘कोरोना से मरने वालों को मुआवज़ा नहीं दे सकती। यानि डॉक्टरों के परिजनों को भी नहीं।

वैसे, ये तो चन्द ही उदाहरण हैं अलबत्ता। ऐसी बारिशों में कभी दिल-दिमाग खोलकर यूँ ही नज़रें घुमा लिया करें। हमें न जाने कितने ‘रत्नों की नाम पट्टिका’ के इर्द-गिर्द इसी तरह कचरे के ढेर पड़े दिख जाएँगे। ऐसे ही, हमारे बनावटी ऊपरी संस्कारी-रंगत की बख़िया उधेड़ते हुए।

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