‘महलों का शहर’ किस महानगर को कहा जाता है?

माइकल एडवर्ड्स की पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत’ से, 27/8/2021

भारत में ब्रिटिश समुदाय के कला और शिल्प को भी पेशेवर और शौक़िया, दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है। टिली कैटल (1796-1776) के मद्रास आने के बाद कई चित्रकार भारत आए्र। इनमें कैटल, जॉन ज़ॉफनी (1783-1789), आर्थर डेविस (1785-1795) ने तैल चित्र बनाए। लेकिन उनकी कृतियों को आबोहवा ने ख़राब कर दिया। वे आकार में भी इतनी बड़ी थीं कि उन्हें इंग्लैंड ले जाना मुश्किल था। ऐसे में छोटे आकार के चित्र बनाने वाले चित्रकारों को लाभ मिला। जॉन स्मार्ट (1785-1795) और ओज़ियस हंफ्री (1785-1787) के नाम इनमें प्रमुख हैं। उनके बाद के चित्रकार भी उतने ही सक्षम हुए। जैसे, 19वीं सदी के शुरू में जॉर्ज चिनरी (1802-1825) की भारत में काफ़ी प्रतिष्ठा थी। 

भारत के कई शासकों ने भी यूरोपियन चित्रकारों से चित्र बनवाए। जैसे- अवध के नवाब। उनके साथ यूरोप के कई चित्रकार जुड़े हुए थे। वे चाहे कैटल हों या हंफ्री सभी लखनऊ ज़रूर आए। वहाँ रुके भी। ग़ाज़ी-उद-दीन (1814-1827) के समय तो रॉबर्ट होम दरबारी चित्रकार जैसे थे। 

लगभग सभी ब्रिटिश चित्रकारों ने तैलीय रंगों का प्रयोग किया। लेकिन विशिष्ट माध्यम पानी के रंग थे। उस वक़्त ब्रिटेन में प्राकृतिक सुंदरता प्रदर्शित करने वाले चित्रों की ख़्याति इतनी थी कि वहाँ के कई कलाकार तो प्रकृति के नज़ारे देखने ही भारत आ जाते थे। ऐसे एक चित्रकार थे, विलियम हॉज़। उन्होंने 1780 में भारत भ्रमण शुरू किया। फिर इस यात्रा पर आधारित कृति ‘सिलेक्ट व्यूज़’ 1786 में लंदन में बनाई। इसी तरह, थॉमस डेनियल और उनके भतीजे विलियम 1786 से 1794 तक भारत में रहे। उन्होंने अपनी पहली कृति ‘व्यूज़ ऑफ कैलकटा’ कलकत्ता में 1786 से 1788 के बीच बनाई। इसके बाद लंदन में 1795 से 1808 के बीच चार खंडों में ‘ओरिएंटल सीनरी’ पेश की। इसके बाद भी कई चित्रकार भारत आए। सभी ने ब्रिटेन में रह रहे लोगों के सामने भारत की आदर्श और प्राकृतिक सुंदरता से भरे देश की छवि गढ़ने में मदद की। हालाँकि यह मिशनरियों द्वारा बनाई भारत की छवि के उलट थी।

चित्रों के ज़रिए सामने आई भारत की दृश्यावली ब्रिटेन के लोगों को विस्मित कर देने वाली थी। उन्होंने इन चित्रों को हाथों-हाथ लिया। नतीज़ा ये हुआ कि बड़ी संख्या में रेखाचित्र और पानी के रंगों वाले चित्र भारत से ब्रिटेन पहुँचे। इनमें कुछ तो बेहद उच्च गुणवत्ता वाले थे। जैसे- कैप्टन विलियम्सन की कृति ‘ओरिएंटल फील्ड स्पोर्ट्स’, जो 1807 में सामने आई। इसी तरह कैप्टन ग्रिंडले की कृति ‘सीनरी, कॉस्ट्यूम्स एंड आर्किटेक्चर’ 1826 में आई। किताबों की सचित्र व्याख्या करने करने के लिए ब्रिटिश यात्री रेखाचित्र भी बनाते थे। इस श्रेणी में सबसे महत्वपूर्ण शौक़िया चित्रकार सर चार्ल्स डी ओइली थे। पटना में उनका छापाखाना था। इसके ज़रिए उन्होंने रेखाचित्रों की कई किताबें मुद्रित, प्रकाशित कीं। 

कंपनी शासन के आख़िरी 20 सालों के दौरान भारत में रहने वाले अंग्रेजों के मनोभाव में परिवर्तन होने लगा। यह परिवर्तन कलाओं में भी परिलक्षित हुआ। भारतीय जीवन में उनकी दिलचस्पी कुछ कम हुई। इसके बावज़ूद भारतीय दृश्यावली में ब्रिटिश कलाकारों की दिलचस्पी बनी रही।

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भारत का शासन ब्रिटेन की राजशाही के हाथ में आते ही अंग्रेज यहाँ ब्रिटिश शासक वर्ग के दिखावटी तौर-तरीकों की नकल करने लगे थे। यहाँ उनके घर भले एक मंजिल के रहे लेकिन उनमें भी अतिउत्कृष्ट बरामदे आदि हुआ करते थे। कलकत्ता तो वैसे भी ‘महलों का शहर’ कहा जाता है। यहाँ बड़ी संख्या में उत्कृष्ट पारंपरिक शैली की सार्वजनिक इमारतें पहले से थीं। अंग्रेजों ने आगे चलकर यहाँ अपने पारंपरिक शास्त्रीय शिल्प को प्रतिरोपित किया। हालाँकि जलवायु के हिसाब से कुछ बदलाव भी किए। जैसे- पहले अधिकांश इमारतों में ऊँचे स्तंभ होते थे। फिर उन पर श्रेष्ठ बनावटें। इस अभिकल्प के कारण दोपहर की तेज धूप आसानी से इमारतों के भीतर आती थी। लिहाज़ा अंग्रेजों ने ख़ास वेनेशियन परदों का इस्तेमाल कर उनमें आड़ दी। अलबत्ता, ब्रिटिश सैन्य अभियंताओं ने गिरिजाघरों की बनावट ख़ासकर, पूरी अंग्रेजी शिल्प के अनुरूप रखी। फिर 19वीं सदी की शुरू में नील के बाग़ान मालिकों ने भी बाग़ानों में ख़ुद के लिए आलीशान हवेलियाँ बनवाईं। हालाँकि अंग्रेजों का यह वास्तुशिल्प राष्ट्रीय गौरव के प्रदर्शन के लिए नहीं था। अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, समृद्धि और सामर्थ्य के दिखावे के लिए था। 

मोटे तौर पर ब्रिटिश शासन के शुरुआती 50 सालों में सार्वजनिक इमारतों का वास्तुशिल्प पूरी तरह पारंपरिक शैली से प्रेरित रहा। हालाँकि कलकत्ता से बाहर अंग्रेजों के अन्य ठिकानों पर उनके भवन साधारण ही रहे। एक मंज़िला, चारों तरफ़ बरामदा और छप्पर वाली छत। जब मैदानों में भवननिर्माण की यह शैली लोकप्रिय हुई, तो अंग्रेज इसे पहाड़ों पर भी ले गए। अलबत्ता, इस बारे में रिचर्ड बरटन 1857 में प्रकाशित अपनी किताब में लिखते हैं, “अपरिष्कृत और ख़राब ईंटों की बनी दीवारों पर खप्पर की छत का कुछ या कभी-कभी पूरा हिस्सा गिर जाता है। वास्तुशिल्प की बात करें तो बंगले जैसी बनावट वाला यह ढाँचा किसी गौशाला का परिष्कृत रूप ज़्यादा लगता है। ऐसे कुछ ही बंगले हैं, जिनमें ऊपर रहने के लिए जगह है। वरना, तो लगभग सभी बंगले बड़े और कम ऊँचाई के बरामदों से घिरे हैं। अंदरूनी साज-सज्जा भी उतनी ही फीकी और सूनी है, जितनी सोची जा सकती है।”

(जारी…..)

अनुवाद : नीलेश द्विवेदी 
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(नोट : ‘ब्रिटिश भारत’ पुस्तक प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से जल्द ही प्रकाशित हो रही है। इसके कॉपीराइट पूरी तरह प्रभात प्रकाशन के पास सुरक्षित हैं। ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ श्रृंखला के अन्तर्गत प्रभात प्रकाशन की लिखित अनुमति से #अपनीडिजिटलडायरी पर इस पुस्तक के प्रसंग प्रकाशित किए जा रहे हैं। देश, समाज, साहित्य, संस्कृति, के प्रति डायरी के सरोकार की वज़ह से। बिना अनुमति इन किस्सों/प्रसंगों का किसी भी तरह से इस्तेमाल सम्बन्धित पक्ष पर कानूनी कार्यवाही का आधार बन सकता है।)
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पिछली कड़ियाँ : 
12. भारत में रहे अंग्रेज साहित्यकारों की रचनाएँ शुरू में किस भावना से प्रेरित थीं?
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8.अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान को किसकी मदद से मारा?
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