टीम डायरी
भारत में किसान खास तौर पर अपनी फलों और सब्जियों की फसल को कीटों से बचाने के लिए एक खास कीटनाशक का उपयोग कर रहे हैं। इसमा नाम है- ‘डायमेथोएट’। यह जड़ों और पत्तियों के माध्यम से पौधों की रगों में जाता है। पूरे पौधे में फैल जाता है। फिर जब रस चूसने वाले कीट- माहू, सफेद मक्खी, मकड़ी के कण, आदि पौधों को खाते हैं, तो यह उनके तंत्रिका तंत्र पर सीधा वार करता है, उन्हें मार देता है। ऐसा जानकार बताते हैं। इसका उपयोग फलों और सब्जियों के अलावा कपास, गेहूँ, धान, मिर्च, सोयाबीन, की फसलों में भी होता है। देश के बाजारों में यह कीटनाशक विभिन्न नामों से उपलब्ध है। अलबत्ता, इस कीटनाशक की छवि पूरी दुनिया में अच्छी नहीं मानी जाती है। क्यों? क्योंकि यह जितना और जिस तरह का नुकसान कीड़े-मकोड़ों का पहुँचाता है, उसी तरह का या उससे कहीं अधिक भी हानि इंसानों के स्वास्थ्य को करता है। इससे कैंसर तक होता है।
इस कीटनाशक के ऐसे ही हानिकारक प्रभावों के कारण दुनिया के 31 देशों में इसके उपयोग प्रतिबंध लगा है। इन 31 देशों में जर्मनी भी शामिल है, जहाँ इस रसायन का आविष्कार किया गया था। बताया जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान दुश्मन के सैनिकों के तंत्रिका तंत्र को निष्प्रभावी और निष्क्रिय करने के उद्देश्य से जर्मन वैज्ञानिकों ने यह खतरनाक रसायन बनाया। उस वक्त जर्मनी की फौज ने दुश्मन देशों के खिलाफ इसका इस्तेमाल भी खूब किया। बाद 1951 में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इसी रसायन से पहली कीटनाशक बना लिया और अगले पाँच साल बाद इसका व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो गया। दिलचस्प है कि जिन 31 देशों ने इस खतरनाक कीटनाशक के इस्तेमाल पर पूरी तरह या आंशिक प्रतिबंध लगा रखे हैं, उनमें अमेरिका भी शामिल है। इस पर प्रतिबंध लगाने की शुरुआत फ्रांस ने की, फिर यूरोपीय संघ के देशों, चीन, आदि ने भी रोक लगा दी।
लेकिन भारत में इस कीटनाशक का उपयोग धड़ल्ले से जारी है। क्यों? इसका जवाब किसी के पास नहीं है। यह स्थिति भी तब है, जब देश के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता हैं, जो खुद को सबसे पहले किसान कहते हैं। उनके गृहनगर- बुधनी, विदिशा, आदि में उनकी खेती भी है। निश्चित तौर पर उन्हें इस कीटनाशक से मानव स्वास्थ्य पर होने वाले नुकसानों का पता है, ऐसा मान सकते हैं। यही नहीं, देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से भी उनकी तथा केन्द्र सरकार की छवि चमकाने के लिए जो अभियान चलाए जाते हैं, उनमें एक पहलू यह भी रहता ही है कि मोदी-सरकार किसान-हितैषी है। किसानों के हितों के मद्देनजर ही अमेरिका से होने वाला भारत का ‘मुक्त व्यापार समझौता’ भी अब तक अटका है, ऐसा कहा जा रहा है। इसीलिए सवाल उठता है कि फिर ऐसे हानिकारक कीटनाशकों, रसायनों के उपयोग की अनुमति कौन सी हितैषी-नीति के तहत दी गई?
