भोजशाला : अपराध के बदले पुरस्कार पाने की ‘मानसिकता’ को समझना क्यों जरूरी है?

अनुज राज पाठक, दिल्ली

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के बागपत के बरनावा स्थित लाक्षागृह पर न्यायालय ने हिन्दू पक्ष के दावे को स्वीकृति दी है। उसके तुरंत बाद मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने भी धार के ‘वाग्देवी मंदिर’, जो भोजशाला के नाम से विख्यात है, को हिन्दू धर्मस्थल के तौर पर स्वीकार किया है। साथ ही हिन्दुओं को रोज वहाँ पूजा, अर्चना, प्रार्थना करने की अनुमति दी है। इस फैसले पर हालाँकि, कांग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद कहते हैं, “ऐसा कोई सबूत नहीं जो साबित करे कि भोजशाला मंदिर था।” प्रश्न है कि इन लोगों में इतनी कुटिलता कहाँ से आती है और कैसे? मेरे ख्याल से यह केवल तभी संभव है, जब व्यक्ति के मन में ‘मजहब पहले’ हो, भारत के प्रति राष्ट्रीयता के भाव का अभाव हो।

बहरहाल दोनों निर्णयों को सुनकर मेरे जैसे करोड़ों आस्थावन लोगों का मन प्रसन्नता से आह्लादित है। ऐसा लग रहा है कि हमारे पूर्वजों ने जो बलिदान दिए, उसका प्रतिफल अब मिल रहा है। उनके पुण्य आशीष के रूप में यह अवसर हमें देखने को मिला है। यद्यपि इसके साथ ही, हृदय में असीम पीड़ा भी है। यह सोचकर कि सदियों पूर्व हमारे अपने घर पर किसी ने बलात् अधिकार कर लिया और कई पीढ़ियों के बाद ही नहीं, अपितु स्वतंत्रता के लम्बे काल के उपरांत भी आज जैसे-तैसे हम अपने उन घरों को हासिल कर पा रहे हैं। इतना ही नहीं, न्यायालयों में लम्बी प्रक्रिया के बाद अपने घर को पाने के बदले अपनी मातृभूमि का टुकड़ा उन बलात् अधिकार करने वालों को देना पड़ रहा है। उदाहरण के तौर पर श्रीराम जन्मभूमि के बदले हमें बलात् कब्जाधारियों को उनके धर्मस्थल के लिए जमीन देनी पड़ी थी। अभी भोजशाला के मामले में भी इसी तरह का आदेश न्यायालय की ओर से दिया गया है। आखिर क्या कारण है इसका? 

ईस्वी सन् 1305 में मुस्लिम आक्रांता खिलजी के आदेश से भोजशाला को नष्ट किया गया। यद्यपि वह नष्ट हुई नहीं और उसके भग्नावशेष चीख-चीख कर स्वयं के मंदिर होने के प्रमाण देते रहे। कोई भी जाकर भोजशाला के अवशेषों की उन चीखों को सुन सकता है। नग्न आँखों से वहाँ स्वयं देख सकता है। भोजशाला का कण-कण उसके मंदिर होने की गवाही देगा। इसके बावजूद सदियों के पराभव से भारतीय चेतना इतनी मंद हो चुकी है कि वह अपने पूर्वजों के बलिदानों की चीखों से भी स्पंदित नहीं हो पा रही। भारतीय संस्कृति के गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए करोड़ों भारतीयों के मन में कोई उत्साह नहीं दिखाई देता। अन्यथा काशी में ज्ञानवापी और मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के लिए आज भी न्यायालय में वाद नहीं चल रहे होते। और यह तब है, जब भारत को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष से अधिक हो चुके हैं!

पूरे विश्व में शायद ही कोई सभ्यता हो जो अपने पूर्वजों के प्रतीकों को प्राप्त करने में ऐसी अपमानजनक विधिक प्रकिया से गुजरती हो। इसे हम सनातन का साहिष्णु पक्ष मानकर आत्मसंतुष्ट हो सकते हैं, लेकिन यह बात सम्मानजनक कतई नहीं हैं। इस क्रम में हमें मुस्लिम समाज की ‘अपराध कर के बदले में पुरस्कार पाने की मानसिकता’ पर विचार करने की भी आवश्यकता है। इसका उदाहरण भोजशाला मामले से ही लेते हैं। ऐसा बताते हैं कि देश की स्वतंत्रता से पहले 1937 से 1942 के बीच भी हिन्दू-मुस्लिम तनाव की आड़ में धार के ‘वाग्देवी मंदिर’ को लेकर विवाद पैदा करने की कोशिश की गई थी। तब मामला शांत करने के लिए धार रियासत के तात्कालीन राजा ने मुस्लिमों को नमाज के लिए बख्तावर मार्ग पर मस्जिद के लिए एक अलग स्थान दिया था। वहाँ आज भी ‘रहमत मस्जिद’ मौजूद है। धार के राजा की रहमत (कृपा) के कारण मिली इस जगह पर बनी मस्जिद इसी आधार पर ‘रहमत मस्जिद’ कहलाई।

मतलब एक बार उन्होंने अपने अपराध के एवज में दंगा-फसाद जैसी स्थिति पैदा कर शांत रहने की कीमत वसूल ली। उन्हें उनके अपराध का इनाम मिल गया। लेकिन इससे उनका मन नहीं भरा। शायद इसीलिए उन्होंने फिर से भोजशाला पर दावा शुरू कर दिया और हिन्दुओं को अपना मंदिर पाने के लिए अदालत जाना पड़ा। और अब अदालत ने भी मंदिर पर हिन्दुओं का अधिकार मानने के बदले में मुस्लिम पक्ष को उनकी मस्जिद के लिए अलग से जमीन आवंटित करने की बात कही है। राज्य सरकार से इस बाबत अनुशंसा की है। आखिर क्यों? अव्वल तो अपराध के बदले मुआवजे का कोई तर्क ही समझ नहीं आता। इसके बावजूद अगर इसे किसी तरह मान लिया जाए तब भी एक ही अपराध के बदले दो बार मुआवजा क्यों? हिन्दू पक्ष और राज्य सरकार को अदालत के ध्यान में यह बात लानी चाहिए।

इस तरह का मुआवजा एक मानक सा बनता जा रहा है। और अगर कहीं यह मानक स्थापित हो गया ताे फिर हर बार ऐसे अपराधों के बाद बदले मुआवजे मांगे जाने लगेंगे। भोजशाला पर हिन्दुओं के पक्ष में फैसला आना खुशी की बात है। परंतु इस मामले और ऐसे अन्य मामलों में अपराध के बदले पुरस्कार पाने की ‘मुस्लिम मानसिकता’ को भी समझना भी जरूरी है। ज्ञात आँकड़े बताते हैं कि देश के लगभग 30,000 मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाई गई हैं। मात्र दिल्ली में ही लगभग 100 ऐसी मस्जिदें हैं, जो मंदिर की नींव पर बनी हैं। तो क्या ऐसे मामलों में जब-जब निर्णय आएगा, तब तब बदले में भूमि दी जाएगी? क्या यह उचित होगा? और अभी मंदिरों की नींव पर बने गिरिजाघरों की तो बात ही नहीं हुई है! सिर्फ सन्दर्भ के तौर पर ही बता रहा हूँ कि ईस्वी सन् 1540 से 1650 तक पूरे गोवा में एक भी मंदिर नहीं बचा, जिसे पुर्तगाली शासन ने नष्ट न किया हो! देशभर के ऐसे तमाम स्थलों का क्या? कभी सोचा है?  

आज सनातन धर्म के प्रति आस्था रखने वाले करोड़ों लोगों का कर्तव्य है कि हम अपने धर्मस्थलों को वापस लाने के लिए आवाज उठाएँ। वह आवाज भी दबी हुई, बिखरी हुई न हो, बल्कि राष्ट्रव्यापी आन्दोलन की शक्ल में हो। सिर्फ यही नहीं, जो साहसी सनातनी भक्त इस दिशा में लगातार प्रयास कर रहे हैं, उनके प्रयासों में पूरा साथ देने की भी आवश्यकता है।यह समझने की आवश्यकता है कि उनके प्रयास वंदनीय हैं, निंदनीय नहीं। हमारा सनातन धर्म सहिष्णु है, यह सच है। पर सहिष्णुता की आड़ में हम कायरता का लबादा ओढ़कर न बैठें, यह भी समझना होगा।

—— 

(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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