राज्यसभा टीवी : सूचना, मनोरंजन और ज्ञान का गुलदस्ता ; क्यों हमें इसके बन्द होने पर चिन्ता होनी चाहिए?

विकास, दिल्ली से, 2/3/2021

सवेरे-सवेरे दफ्तर के लिए घर से निकला। रास्ते में फेसबुक खोला तो इरफ़ान सर की पोस्ट देखी। वहीं से पता चला कि राज्यसभा टीवी बन्द हो गया। लोकसभा टीवी में इसका विलय कर दिया गया है। पढ़कर मैं मायूस हो गया। वैसे तो यह सूचनाभर है। लेकिन कुछ सूचनाएँ होती हैं, जिनके मिलने पर हमारे भीतर एक निश्चित वेग से कुछ दौड़ने लगता है। यही वजह है कि सूचना पाकर हमें कष्ट, दुःख, ख़ुशी जैसे मनोभावों का भान होता है। जो घट चुका है, वह तो समय से मायनस हो चुका है। वैसे घटना का एक अर्थ ‘मायनस होना’ भी है।
 

राज्यसभा टीवी 2021 के मार्च महीने की पहली तारीख से ही हमारी ज़िन्दगी से मायनस हो चुका है। यह मैं इसलिए भी लिख रहा हूँ कि हम अपनी डायरी में अपने जीवन की प्रिय-अप्रिय घटनाओं को स्वाभाविक रूप से दर्ज कर लेते हैं। यह घटना अब मन के पन्नों पर अंकित रहेगी। एक अफ़सोस के रूप में।
 

इरफ़ान ने अपनी पोस्ट में राज्यसभा टीवी को एक पंक्ति में परिभाषित कर दिया। उन्होंने लिखा, “सूचना, मनोरंजन और ज्ञान का ऐसा गुलदस्ता, जिसे हर वर्ग और आयु के दर्शकों का प्यार और विश्वास मिला।” वाकई राज्यसभा टीवी ऐसा ही गुलदस्ता था। मुझे याद है, क्रिकेट मैच के अलावा यही एकमात्र चैनल था, जिसे हम बाप-बेटे साथ-साथ बैठकर देख लेते थे। साल 2011 में जब राज्यसभा टीवी शुरू हुआ, तब हम इसमें काम करने का सपना देखा करते थे। ऐसे समय में, जब ख़बरिया टीवी चैनलों का कर्कश शोर था, राज्यसभा टीवी अपने शान्त स्वभाव में मतवाली चाल चल रहा था। गजवत्। लेकिन आज ‘गजबन’ का शोर है। और ऐसे समय में, जब यह शोर बढ़ गया है, राज्यसभा टीवी का बन्द होना हमारे समय का बड़ा नुकसान है।
 

‘गुफ्तगू’ में इरफ़ान से परिचय कराने वाला राज्यसभा टीवी ही था। तब किसे मालूम था कि जिस इरफ़ान को हम इस शिद्दत से सुनते हैं, वही एक दिन यह ख़बर देंगे कि कल से ‘गुफ़्तगू’ का प्रसारण नहीं होगा। और फिर कुछ ही दिनों बाद यह ख़बर उन्हीं से मिलेगी कि राज्यसभा टीवी का प्रसारण भी अब नहीं होगा। हालाँकि हमारे अख़बारों, चैनलों और वेबसाइटों के लिए तो यह ख़बर ही नहीं है। अलबत्ता, हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए इरफ़ान और ‘रेख़्ता’ का, जिनके साझा प्रयासों से हम आज ‘गुफ़्तगू’ को दोबारा देख पा रहे हैं। लेकिन राज्यसभा टीवी को दोबारा जीवन नहीं मिल पाएगा। ये एक टीस है, कई सीनों में।  
 

इसकी अर्थव्यवस्था पर बात की जा सकती है। कहा जा सकता है कि किसी चैनल को बिना विज्ञापन आख़िर कैसे चलाया जा सकता है। चैनल के अपने खर्चे होते हैं। सही है, लेकिन राज्यसभा टीवी के सन्दर्भ में यह बात सही नहीं है। हम समझ सकते हैं कि इसे जारी रखा जा सकता था। इरफ़ान की पोस्ट में भी एक टीस ही है। वे कहते हैं, “यदि ये आठ महीने और चल जाता तो 10 साल पूरे कर लेता।” ये टीस मेरे मन में भी गहरे पैठ रही है।
 

कहने वाले कह सकते हैं कि कितने ही लोग देखते थे, राज्यसभा टीवी? सवाल उठा सकते हैं कि क्या ही व्यूअरशिप (दर्शक संख्या) थी इसकी? कह सकते हैं कि जहाँ इतने मनोरंजन चैनल हैं, इतने ओटीटी (Over The Top) प्लैटफॉर्म हैं, यूट्यूब है, वहाँ राज्यसभा टीवी जैसे चैनलों के बन्द होने से क्या ही फ़र्क पड़ता है?
 

पर फ़र्क पड़ता है। कितनी ही क्लासिक सीरीज़ मैंने राज्यसभा टीवी पर देखी थीं। तिग्मांशु धूलिया की ‘राग देस’, श्याम बेनेगल की ‘संविधान’ जैसी सीरीज़ राज्यसभा टीवी की ही देन हैं। संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी करने वाले छात्र इसका ‘विशेष’ कार्यक्रम कैसे भूल सकते हैं। इसका सन्दर्भ तमाम कोचिंग संस्थान तक देते आए हैं। मैं इसके हर कार्यक्रम पर लम्बी टीप लिख सकता हूँ। तेज रफ्तार घर से दफ़्तर की तरफ़ भागती मेट्रो में बैठे-बैठे ही कुछ लिखने की ये एक कोशिश भी की है। क्योंकि ख़ुद को रोक नहीं पा रहा हूँ। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि टीप लिखने भर से कुछ नहीं होगा, जब तक कि मैं इसका विकल्प न दे पाऊँ।
 

दरअसल, हमारी स्क्रीन से अच्छे चैनलों का जाना, अच्छे कंटेंट का जाना, हमारे समय की हानि है। और हम निरन्तर सामाजिक घाटे की ओर अग्रसर हो रहे हैं। यह अभी हमें समझ नहीं आ रहा है, किन्तु धीरे-धीरे आएगा। मुझे भरोसा है। क्योंकि शोर में बहुत ज़्यादा दिनों तक जीवन नहीं है। यह हमारे दैनिक जीवन में बढ़ते शोर का ही नतीजा है कि हम पहाड़ों और जंगलों में शान्ति की तलाश में भटकने लगे हैं। हमने अपने घरों में, अपनों में, अपने आप में मिलने वाली शान्ति को, इसी शोर में कहीं खो दिया है।
 

किसी कार्यक्रम का बन्द होना, राज्यसभा टीवी जैसे के किसी चैनल का बन्द होना और एजेंडा प्रधान चैनलों का उग आना, ये छोटी घटनाएँ नहीं है। ये हमारे मन-मस्तिष्क की ज़मीन को बंजर बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इससे हमें बचना है, इसे हरा रखना है तो इसकी विपरीत प्रक्रिया को खाद-पानी हमें ख़ुद देते रहना होगा। वरना, आज ये गुलदस्ता (राज्यसभा टीवी) मुरझाया है। कल अगली बारी हमारी, किसी की होगी।

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