‘शब्दों में बड़ी ताकत होती है, इसीलिए शब्दों पर टिके रहने में ताकत लगती है’!

टीम डायरी

शब्दों की जलेबी बनाना नेताओं को बखूबी आता है। जब उनको किसी से कोई काम निकलवाना होता है, तो वे चासनी में डूबे शब्दों का खूब प्रयोग करते हैं। फिर काम निकल जाता है, तो सब भूल जाते हैं। जैसे- आम मतदाताओं से उनका वोट लेना और फिर भूल जाना। अलबत्ता, इसी समय वे यह भी भूल बैठते हैं कि शब्दों में कितनी ताकत होती है! यद्यपि कभी-कभार जब उनके अपने सामने ऐसी कोई स्थिति बनती है कि किसी ने उन्हें शब्दों की चासनी में लपेटकर डुबाने की कोशिश की हो, तो फिर जरूर उन्हें शब्दों की ताकत का एहसास हो जाता है। 

कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री हैं डीके शिवकुमार। उनके साथ इस वक्त ऐसी ही कुछ स्थिति बनी हुई है। उनकी पार्टी के शीर्ष नेतृत्त्व ने उन्हें शब्दों की चासनी में डुबोने की कोशिश की है, ऐसा लगता है। इससे वह बेचैन हो रहे हैं। इसीलिए लगातार वह अपने बयानों और कामों से सुर्खियों में बने हुए हैं। उन्हीं बयानों में एक हालिया बयान यह है, “शब्दों में बहुत ताकत होती है। इसीलिए दुनिया में सबसे अधिक ताकत शब्दों पर टिके रहने में लगती है। वह कोई हो, कोई निर्णायक, कोई अध्यक्ष या मैं खुद, उसे अपने शब्दों पर टिके रहना होगा।”

जाहिर तौर पर अब यह सवाल भी मन में आएगा ही कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो शिवकुमार को शब्दों की ताकत का एहसास हो गया। तो, उसके पीछे कहानी सिर्फ इतनी है कि कर्नाटक में करीब ढाई साल पहले जब विधानसभा चुनाव हुए तो शिवकुमार अपनी पार्टी की प्रदेश इकाई का नेतृत्त्व कर रहे थे। पार्टी जीती तो स्वाभाविक तौर पर उसका श्रेय उन्हें मिला। उनको मुख्यमंत्री बनाए जाने की माँग भी उठने लगी। उनके मन में मुख्यमंत्री बनने की इच्छा थी। मगर पार्टी के ‘निर्णायक नेता’ ने उनकी इच्छा पर पानी फेर दिया। जातीय समीकरण, आदि देखकर सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बना दिया। बताते हैं कि उसी समय उन ‘निर्णायक नेता’ ने यह भी वादा किया था कि राज्य सरकार के ढाई साल पूरे होने के बाद सिद्धारमैया की जगह शिवकुमार को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया जाएगा। 

शिवकुमार ने तब उन ‘निर्णायक नेता’ के शब्दों का मान रखा और उपमुख्यमंत्री पद पर संतोष कर लिया। और अब चूँकि राज्य सरकार को ढाई साल से अधिक का समय हो चुका है, तो वह उन ‘निर्णायक नेता’ को बार-बार शब्दों की और शब्दों पर टिके रहने की ताकत याद दिला रहे हैं। हालाँकि अभी न तो उन ‘निर्णायक नेता’ की ओर से कोई ऐसा संंकेत मिला है कि वह अपने शब्दों पर टिके रहने वाले हैं और न पार्टी के अध्यक्ष की तरफ से, जो कि खुद कर्नाटक के ही हैं। जाहिर तौर पर ऐसे में शिवकुमार की बेचैनी बढ़ रही है। सो, अब देखना ‘रोचक-सोचक’ होगा कि वह अपनी बेचैनी में कितनों का चैन छीनते हैं। अलबत्ता अपन को इस प्रसंग से काम की बात मिली ही है, “शब्दों में बड़ी ताकत होती है। इसीलिए दुनिया में सबसे अधिक ताकत शब्दों पर टिके रहने में लगती है।

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Neelesh Dwivedi

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