भारत की समृद्ध गुरु-शिष्य परम्परा अगर कहीं अब भी अपने श्रेष्ठ स्वरूप (कुछ अगर-मगर छोड़ दें, तो बहुतायत) में है तो वह या तो आध्यात्म…
View More गुरु पूर्णिमा पर स्वरांजलि की ‘पियाली’Author: Apni Digital Diary
मैं उन्हीं लाखों लाशों की तरफ़ से आप से माफ़ी माँगता हूँ
बीते दो-तीन दिनों राज्यसभा के सदस्य प्रोफेसर मनोज झा का सदन में दिया यह भाषण ख़बरिया ( Media) और सामाजिक माध्यमों (Social Media) पर चल…
View More मैं उन्हीं लाखों लाशों की तरफ़ से आप से माफ़ी माँगता हूँसम्यक वचन : वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के स्तर का पता चलता है
“ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए, औरन को शीतल करे आपहुँ शीतल होए।” यह दोहा हम बचपन से सुनते-पढ़ते आ रहे हैं। लेकिन इसे अपनाते-अपनाते…
View More सम्यक वचन : वाणी के व्यवहार से हर व्यक्ति के स्तर का पता चलता हैसहज भरोसा न हो शायद, पर ये केन्द्रीय मंत्री के माता-पिता हैं!
इस देश में नेताओं और उनके परिवारों ने छवि इस तरह की बना ली है कि एक बार इस तस्वीर (लेख के साथ दी गई)…
View More सहज भरोसा न हो शायद, पर ये केन्द्रीय मंत्री के माता-पिता हैं!दो शहर, दो बरस, दो पुस्तक पंक्तियाँ, एक कवि और एक ही तारीख
आज फेसबुक की याद गली से गुज़रा तो यादें मिलीं। उसने कमाल की चीज़ याद दिलाई। दो साल के अंतराल की। एक 2018 और दूसरी 2020 की।…
View More दो शहर, दो बरस, दो पुस्तक पंक्तियाँ, एक कवि और एक ही तारीखप्रकृति अपनी लय में जो चाहती है, हमें बनाकर ही छोड़ती है, हम चाहे जो कर लें!
अभी किसी से फोन पर बहुत लम्बी बात हुई। आवाज़ों के शोर के पीछे जो आँसुओं का दर्द था, वो मैं महसूस कर पा रहा था। हम…
View More प्रकृति अपनी लय में जो चाहती है, हमें बनाकर ही छोड़ती है, हम चाहे जो कर लें!जगन्नाथ की मूर्तियों का सन्देश, अधीरता का हासिल अधूरापन होता है
उस ज़माने में ओडिशा या उत्कल प्रदेश के राजा हुआ करते थे इन्द्रद्युम्न। भगवान नीलमाधव, यानि श्रीहरि, श्रीकृष्ण के भक्त थे। कहते हैं, उन्हें एक रोज…
View More जगन्नाथ की मूर्तियों का सन्देश, अधीरता का हासिल अधूरापन होता हैओ मानसून के मन, सुन…
प्रिय मानसून, कहाँ हो तुम? तुम्हें मालूम भी है, कब से यहाँ सब तुम्हारी राह देख रहे हैं? अब और देर मत करो आ जाओ। मैंने अख़बारों…
View More ओ मानसून के मन, सुन…सम्यक ज्ञान, हम जब समाज का हित सोचते हैं, स्वयं का हित स्वत: होने लगता है
हम अपने जीवन में लोगों के बारे में धारणाएँ अक्सर बाहरी आवरण देखकर बना लेते हैं। रूप, रंग, वस्त्र के आधार पर व्यक्ति की छवि बना…
View More सम्यक ज्ञान, हम जब समाज का हित सोचते हैं, स्वयं का हित स्वत: होने लगता हैजो सहज और सरल है वही यह जंग भी जीत पाएगा
जब 1982 में तिरुपति बालाजी चढ़े थे, तो पैदल ही चढ़ना होता था। वहाँ बहुत लोगों को कबीट ( कैथा ) के माफिक सर मुँडवाते देखा।…
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