mrachkatikam-16

मृच्छकटिकम्-16 : प्रेम में प्रतीक्षा दुष्कर है…

वसंतसेना बदली हुई गाड़ी से उद्यान की तरफ जा रही होती है। वसंतसेना की प्रतीक्षा में अधीर चारुदत्त बार-बार विदूषक से मार्ग देखने का अनुरोध…

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mrachkatikam-15

मृच्छकटिकम्-15 : जो शरणागत का परित्याग करता है, उसका विजयलक्ष्मी परित्याग कर देती है

चारुदत्त के साथ स्नेहिल मिलन से वसंतसेना अत्यधिक प्रसन्न है। दोनों रात्रि में साथ विश्राम करते हैं। सुबह जब वसंतसेना जगती है, तब तक चारुदत्त…

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mrachkatikam-14

मृच्छकटिकम्-14 : इस संसार में धनरहित मनुष्य का जीवन व्यर्थ है

वसंतसेना अपने सेवक के साथ चारुदत्त के घर जाने के लिए निकलती है। बादल आकाशीय बिजली की चमक और तेज बारिश के साथ बरस रहे…

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mrachkatikam-13

मृच्छकटिकम्-13 : काम सदा प्रतिकूल होता है!

वसंतसेना अपनी सेविका के साथ चारुदत्त से मिलने निकल जाती है। चारुदत्त अपने भवन में बैठे दुःखी मन से अपने दुर्दिनों को याद कर रहा…

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mrachkatikam-12

मृच्छकटिकम्-12 : संसार में पुरुष को मित्र और स्त्री ये दो ही सबसे प्रिय होते हैं

वसंतसेना से मुक्त होने के बाद मदनिका अब शर्विलक से साथ गाड़ी में बैठकर चलने को तैयार है। तभी घोषणा सुनाई देती है कि किसी…

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mrachkatikam-11

मृच्छकटिकम्-11 : गुणवान निर्धन गुणहीन अमीर से ज्यादा बेहतर होता है

ये आभूषण चारुदत्त के घर से चुराए गए हैं, ऐसा पता चलते ही वसंतसेना और मदनिका बेहोश हो जाती हैं। शर्विलक मदनिका को सचेत करने…

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mrachkatikam-10

मृच्छकटिकम्-10 : मनुष्य अपने दोषों के कारण ही शंकित है

‘वसंतसेना’ की माता वसंतसेना को बुलाने का सन्देश भिजवाती हैं। वसंतसेना इधर ‘चारुदत्त’ द्वारा बनाई पेंटिंग की सराहना करती हुई ‘मदनिका’ से पूछती पूछती है…

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mrachkatikam-8

मृच्छकटिकम्-9 : पति की धन से सहायता करने वाली स्त्री, पुरुष-तुल्य हो जाती है

सोए हुए ‘मैत्रेय’ द्वारा कसम देने से ‘शर्विलक’ आभूषणों की पेटी ले लेता है। तभी वहाँ ‘रदनिका’ के आने की आहट सुनाई देती है। इससे…

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mrachkatikam-8

मृच्छकटिकम्-8 : चोरी वीरता नहीं…

‘वसंतसेना’ से ‘कर्णपूरक’ फिर कहता है, “आप इस दुपट्टे को ओढ़कर बहुत अच्छी लग रही हैं।” लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बगैर ‘वसंतसेना’ पूछती…

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mrachkatikam-7

मृच्छकटिकम्-7 : दूसरों का उपकार करना ही सज्जनों का धन है

“आर्य चारुदत्त का नाम लेने से मेरी इतनी सेवा हो रही है। धन्य हो आर्य चारुदत्त, धरती पर मात्र आप जीवित हैं। बाकी तो बस…

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