फिर स्कूल खुलवाने की कोशिशों के बीच क्या ये ख़बर बच्चों के लिहाज़ से चिन्ता बढ़ाने वाली नहीं है?

टीम डायरी ; 1/7/2020

कुछ दिनों पहले एक ख़बर पढ़ी थी। विशेष तौर पर मध्य प्रदेश के सन्दर्भ में थी। हालाँकि कमोबेश वैसी स्थिति दूसरे राज्यों में भी हो सकती हैं। सम्भवत: होगी ही। उस ख़बर में बताया गया था कि निजी स्कूलों के असरदार संचालक सरकार में अपने सम्पर्कों के जरिए राज्य शिक्षा विभाग के आला अफ़सरों पर दबाव डाल रहे हैं। उनके द्वारा कोशिश ये की जा रही है कि किसी तरह स्कूलों को फिर खोलने की अनुमति मिल जाए। भले सप्ताह में तीन दिन ही सही। उनकी दलील है कि चूँकि कोरोना महामारी के संक्रमण की वज़ह से की गई देशव्यापी तालाबन्दी अब ख़त्म हो चुकी है। धीरे-धीरे सभी गतिविधियाँ खुल रही हैं। सामान्य हो रही हैं। इसलिए स्कूलों को भी विशेष सावधानियों के साथ अब खोलने की इजाज़त दी जानी चाहिए। उसी ख़बर की मानें तो राज्य सरकार के स्तर पर भी स्कूल संचालकों की दलीलों से सहमति जताई गई। इसके बाद सम्भवत: उन तौर-तरीकों पर विचार भी शुरू किया गया है, जिनके तहत स्कूलों को फिर खोला जा सकता है।

हालाँकि अभी इस सम्बन्ध में आधिकारिक तौर पर कुछ कहा नहीं गया है। लेकिन इस तरह के प्रयासों से एक बात स्पष्ट है कि निजी स्कूल संचालकों को स्कूलों के बन्द रहने से होने वाले घाटे की चिन्ता, बच्चों के स्वास्थ्य से कहीं ज़्यादा है। इसमें काेई बड़ी बात भी नहीं है। क्योंकि ये जाना-माना तथ्य है कि निजी स्कूल किसी कारोबारी उपकम की तरह ही संचालित किए जाते हैं। लोककल्याण का भाव उनमें गौण ही होता है। इस तथ्य की पुष्टि उन ख़बरों/वीडियो आदि से भी होती है, जो तालाबन्दी के दौर में मीडिया और सोशल मीडिया में सामने आए। इनसे पता चला कि किस तरह निजी स्कूलों द्वारा तालाबन्दी के दौर में भी अभिभावकों पर बच्चों की पूरी फीस जमा करने का दबाव बनाया जा रहा है। मध्य प्रदेश में ही निजी स्कूलों के संचालकों का समूह उच्च न्यायालय तक पहुँच गया है। वहाँ राज्य सरकार के उस आदेश के विरुद्ध मुकदमा लड़ा जा रहा है, जिसमें निजी स्कूलों को तालाबन्दी के दौर में सिर्फ़ बच्चों की ट्यूशन फीस लेने को कहा गया था। 

इस जद्दोजहद के बीच बच्चों के स्वास्थ्य, उन्हें कोरोना महामारी के संक्रमण का ख़तरा, उनकी सुरक्षा, आदि विचार-विमर्श के विषय ही नहीं दिखते। ऐसे में अभिभावक होने के नाते बच्चों से जुड़े इन मसलों की चिन्ता करना हमारे लिए बेहद ज़रूरी हो जाता है। और इसी क्रम में अमेरिका से आई एक ख़बर नई रोशनी डालती है। ‘दैनिक भास्कर’ अख़बार ने एक अगस्त को ये ख़बर दी है। इसमें अमेरिका में हुए शोध अध्ययन के हवाले से बताया गया है कि बच्चे और किशोर (पाँच से 17 साल तक के) बड़े पैमाने पर कोरोना विषाणु के वाहक हो सकते हैं। यानि अगर विषाणु ने बच्चों को चपेट में लिया तो उनके जरिए कोरोना का संक्रमण तुलनात्मक रूप से अधिक लोगों तक और ज़्यादा तेजी से फैलने की आशंका बनती है। तिस पर बच्चों के जीवन के लिए जो ख़तरा पैदा होगा, वह अलग। अथ्ययन के इन निष्कर्षों की अमेरिका के कई शिशु रोग विशेषज्ञों ने पुष्टि भी की है। 

इस ख़बर के साथ सोचनीय जानकारी ये कि अमेरिका में भी स्कूलों को फिर खोलने- न खाेलने के मसले पर बहस छिड़ी हुई है। बावज़ूद इसके कि पूरी दुनिया में कोरोना महामारी का सबसे गम्भीर संक्रमण अमेरिका में ही है। वहाँ 46 लाख से ज़्यादा लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं। जबकि 1.5 लाख से अधिक लोग इससे लड़ते हुए जान गँवा चुके हैं। भारत में भी 36,500 से ज़्यादा लाेग कोरोना से ज़िन्दगी की जंग हार चुके हैं। वहीं करीब 17 लाख के लगभग लोग संक्रमित हो चुके हैं। दुनिया के सबसे विकसित (अमेरिका) और सबसे बड़े विकासशील देश (भारत) के ये आँकड़े हमारे सामने एक ही निष्कर्ष रखते हैं। ये कि सरकार अमेरिकी हो या भारतीय। उसके लिए जीवित या मृत आम नागरिकों की तादाद, अमूमन एक ‘आँकड़ा’ होती है। अलबत्ता हमारे लिए हमारी सन्तानें कोई ‘संख्या’ नहीं हैं। इसलिए उनकी फ़िक्र हमें ख़ुद करनी है। हमें ही उनके लिए आगे आना होगा।

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