देखिए, सही हाथों से सही पतों तक पहुँच रही हैं चिट्ठियाँ!

टीम डायरी

“आपकी चिट्ठी पढ़कर मुझे वे गाँव-क़स्बे याद आ गए, जिनमें मेरा बचपन बीता”

प्रिय दीपक 

“आपके गाँव की चिट्ठी पर आपका ज़वाब पढ़ा। इस ज़वाब में आपके अपने गाँव से अगाध प्रेम के अक़्श उभरे हैं। हालाँकि तेजी से विस्तारित होते तकनीकी युग में गाँव अब वैसे नहीं रहे, जैसे हमारी स्मृतियों में बसे हैं। फिर भी वे हमारा ऐसा सुन्दर अतीत हैं, जिसे हमेशा याद रखना ज़रूरी है। आपने श्रद्धा के साथ अपने गाँव को याद किया है। कहा जाता है कि भारत गाँवों में बसता है। यह पूरी तरह सही भी है, लेकिन गाँव रह कहाँ गए? अब तो हर गाँव शहर बनने की होड़ लगा रहा है। आपकी चिट्ठी पढ़कर मुझे वे गाँव-क़स्बे याद आ गए, जिनमें मेरा बचपन बीता। तब सूचना क्रान्ति नहीं थी। इसलिए गाँवों के कुछ चुनिन्दा घरों में इक़लौता गैजेट रेडियो हुआ करता था। अख़बार या पत्रिकाएँ भी कुछ ही घरों तक पहुंचती थीं। तब गाँव बाकी दुनिया से दूर थे और शायद इसीलिए सुखी थे। तब हमेशा जीवन्त रहने वाला सामाजिक सम्बन्धों का ताना-बाना किसी भी परिवार के सुख को कई गुना बढ़ाता था। दुख में मजबूत सम्बल बन जाता था। तथाकथित आधुनिक भारतीय समाज वह सब खोता जा रहा है। अब हर व्यक्ति एकाकी है। कुछ उपकरणों में तैरने वाली उसकी अपनी (आभासी) दुनिया है। इस दुनिया में उसकी कल्पनाओं के पंख विस्तारित हो रहे हैं। मोहल्ला और आस-पड़ोस ख़त्म हो रहे हैं। क्या हम इसे ही ‘आधुनिकता’ कहेंगे? आपने गाँव और गाँव को दिल की गहराई से याद करते हुए उसकी बनावट, उसकी अपनी नैसर्गिकता, उसके सौन्दर्य का ज़िक्र किया है। इसके लिए आपको साधुवाद। आप गाँव की अव्यक्त वेदना को भी अपने लेखन का विषय बनाएँ। गाँव, जो कुछ कह नहीं सकता, उसको आपने अभिव्यक्ति दी बहुत शुभकामनाएँ।”

– सूर्यकान्त पाठक, वरिष्ठ पत्रकार, नई दिल्ली 

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“प्रभु से कामना करता हूँ कि आपकी विनती सुन ले, रुख़सत हुए दादा को एक बार मिला दे”

“एक सांस में पूरी पाती पढ़ डाली। रुला दिए आप तो। इतना ग़मज़दा जीवन भगवान किसी को न दे। प्रभु से कामना करता हूँ कि आपकी विनती सुन ले। रुख़सत हुए दादा को एक बार मिला दे, प्रभु जी। इतना संवेदनशील होना हमें आन्तरिक रूप से कमजोर नहीं बनाता, बल्कि भाव, संवेदनशीलता और विचारों का समन्वय ही हमें मनुष्य बनाता है। जब हम अपनी भावनाएँ अभिव्यक्त नहीं कर पाते, तो मन विचलित होता रहता हैं। असल में संवेदना से ही मनुष्यता बची है। इससे बड़ी बात ब्रह्माण्ड में कुछ भी नहीं है।

– संजीव कुमार, दैनिक जागरण, जमशेदपुर

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“आख़िर कहाँ गए होंगे दादा, पता नहीं” 

“दादा की कोई याद तो नहीं मुझे पर ये सब पढ़कर जीवन्त सा हो जाता है। आख़िर कहाँ गए होंगे दादा पता नहीं, लेकिन कई बार दादी से सुना है। रिश्तेदारी में बहुत बार दादा के बारे में बातचीत होती है। वो जहाँ भी हों, अच्छे से हों। उम्मीद है कि ये चिट्ठी भी उन तक पहुँचे। 

– कामद पांडे, मध्यप्रदेश पुलिस बल, रीवा

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“अलग ही अन्दाज़ में ऋषि कपूर और इरफान को याद किया, बिना फिल्मों पर बात किए सारी बात कह दी”

“आपने एक अलग ही अन्दाज़ में ऋषि कपूर और इरफान को पाँचवीं पुण्यतिथि पर याद किया है। बिना उनकी फिल्मों पर बात किए उनके अभिनय को लेकर सारी बात कह दी। ऋषि कपूर और इरफान खान की मौत कैंसर के चलते हुई थी। ऋषि कपूर जहाँ अपने सरल अभिनय के लिए जाने जाते थे, वहीं इरफान को लोग गम्भीर अभिनय के लिए याद करते हैं। कलाकार चले जाते हैं, लेकिन वह अपनी कला के माध्यम से हमारे आस-पास बने रहते हैं। ऋषि कपूर और इरफान भी अपनी फिल्मों के माध्यम से हमारे आसपास बने रहेंगे।”

-सईद अहमद, लोकमत समाचार, औरंगाबाद 

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“तीनों चिट्ठियाँ पढ़ीं, इन पत्रों को पढ़कर मन प्रसन्न हो गया”

“मैंने आपकी हालिया प्रकाशित तीनों चिट्ठियाँ पढ़ीं। इरफान और ऋषि कपूर साहब पर लिखा। गाँव के प्रेमी की चिठ्ठी और गाँव की चिठ्ठी उसके प्रेमी के नाम। आपने बड़े करीने से चिट्ठी की शैली में गाँव का चित्रण करते हुए अपने मन की सारी बात पिरो दी है। ये कुछ ऐसा लिखा गया है कि पढ़ते हुए गाँव को जिया जा सकता है। इन पत्रों को पढ़कर मन प्रसन्न हो गया है। आपकी लेखनी को नमन है और आशा करता हूँ कि आप लिखते रहेंगे। मेरे दोनों चहेते कलाकारों पर आपने जिस ढंग से लिखा है, वैसा अब तक पढ़ने को नहीं मिला। हम कलाकारों से आख़िर जुड़ाव महसूस क्यों करते हैं, उस पर आपने बड़ी बारीक़ी से लिखा है। ये सबसे ख़ास बात है। शेष आपकी बिटिया के नाम पत्र भी मुझे भाते हैं, उन्हें उसी कड़ी में लिखते रहें। ईश्वर से यही कामना है।

– सत्यभूषण सिंह, पीआरओ, एकेयस यूनिवर्सिटी, सतना 

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“बेटियाँ तो वो ‘तारा हैं, जो आसमान में सदा चमकती रहती हैं”

“बढ़िया लिखा है, प्यार ❤️। बस, आख़िरी के हिस्से में सामन्ती शब्दावली है। बेटी के साथ जो ईश्वरीय और जेंडर इनइक्वालिटी वाली सोच सामने आ रही है। बेटियाँ तो वो ‘तारा हैं, जो आसमान में सदा चमकती रहती हैं।’ वो तो जन्म-जन्मान्तर की ‘ तपस्या का फल’ हैं, जो हर एक के लिए फलीभूत नहीं होती। मैं बस इतना कह सकता हूँ कि जिसने अपनी माँ से प्रेम किया हो, उसकी छाती से चिपटकर दूध पिया हो, उसे ही अपनी बेटी में माँ की छवि नज़र आ सकती है। वास्तव में वही तो अपने पुत्र को तारने चली आती हैं, क्योंकि वो तो मातृशक्ति का स्वरूप हैं, सृजन का वरदान हैं और संहार का प्रतिबिम्ब भी हैं। बेटियाँ तो सौभाग्य की वर्षा हैं, जो बूँद-बूँद जीवन भर बरसती रहती हैं और अमरत्व की ओर ले जाती हैं। इन शब्दों की जड़ें टटोलो।”

– सचिन श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, भोपाल 

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