आरसीबी के जश्न में 10 लोगों की मौत- ये कैसा उत्साह कि लोगों के मरने की भी परवा न रहे?

टीम डायरी

क्रिकेट की इण्डियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के फाइनल मुक़ाबले में मंगलवार, 3 जून को रॉयल चैलेन्जर्स बेंगलुरू की टीम ने अहमदाबाद में पंजाब किंग्स को हराकर ख़िताब जीत लिया। बेंगलुरू ने पहली बार ख़िताबी जीत हासिल की है। आईपीएल 2008 में शुरू हुआ। इसके बाद से अब 18वें संस्करण में आरसीबी को चैम्पियन का तमगा मिला। इससे पूर्व यह टीम तीन बार-  2009, 2011 और 2016 में फाइनल में पहुँची। लेकिन हर बार ख़िताब के इतने क़रीब पहुँचकर भी हार गई। हालाँकि इस मर्तबा चौथी बार उसने सिलसिला तोड़ दिया। 

स्वाभाविक तौर पर इस टीम और इसके प्रशंसकों के लिए यह बड़ी उपलब्धि है। उनकी बरसों की आस पूरी हुई है। ऐसे में उनका जोश और उत्साह चरम पर होना लाजिमी था। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू सहित वहाँ के अन्य शहरों में भी टीम के प्रशंसक मंगलवार रात से ही जश्न मना रहे थे। इसके बाद बुधवार को टीम जब अहमदाबाद से बेंगलुरू पहुँची तो वहाँ के चिन्नास्वामी स्टेडियम में जश्न मनाया गया। हालाँकि इस जोश, जश्न के बीच एक दुखद घटना भी हो गई। बेंगलुरू में स्टेडियम के बाहर भगदड़ मचने से 10 लोगों की मौत की ख़बर है। 

मरने वालों में एक छह साल की बच्ची भी बताई जाती है। मृतकों का आँकड़ा बढ़ सकता है, ऐसी आशंका जताई जा रही है क्योंकि 24-25 घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अलबत्ता, इससे ज़्यादा आश्चर्यजनक बात यह कि इतनी दुखद घटना के बावज़ूद स्टेडियम के भीतर आरसीबी के खिलाड़ियों का जीत का जश्न जारी रहा। उस दौरान दुर्घटना पर किसी ने संवेदना जताई हो, ऐसी भी कोई सूचना अब तक सामने नहीं है। वहीं, प्रदेश के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार भी इस दुर्घटना के लिए अनियंत्रित क्रिकेट प्रशंसकों को ही दोष दे रहे हैं। 

ऐसे में सवाल स्वाभाविक है कि लोगों का उत्साह का स्तर तो मंगलवार रात से ही स्पष्ट नज़र आ रहा था। बुधवार को स्टेडियम में कार्यक्रम होना है, यह भी सभी जानते थे। इस कार्यक्रम के दौरान टीम के प्रशंसकों की अथाह भीड़ उमड़ेगी इसका अन्दाज़ा भी सबको रहा ही होगा। तो फिर ज़रूरी इंतिज़ामात क्यों नहीं किए गए? इतना ही यही नहीं, सवाल यह भी सामने है कि दुर्घटना होने के बाद भी जश्न क्यों जारी रहा? क्या किसी में ज़रा भी संवेदना नहीं बची? भगदड़ में लोगों के मारे जाने की सूचना मिलते ही कार्यक्रम रोका जा सकता था? कुछ समय के लिए टाला जा सकता था? और नहीं तो कम से कम मरने वालों के प्रति संवेदना ही जताई जा सकती थी?

लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, आश्चर्य है!! कैसा उत्साह है यह कि लोगों के मरने की भी परवा न रहे?

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Neelesh Dwivedi

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