आरएसएस के 100 वर्ष : संघ अपनी पद्धति पर डटा रहा, उसकी गतिविधियाँ भी चलती रहीं

अनुज राज पाठक, दिल्ली

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के गठन मात्र से राजनैतिक क्षेत्र में हलचल शुरू हो गई थी। कांग्रेस, हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग जैसे दल संघ को सन्देह या प्रतिद्वन्द्वी के तौर कर देखने लगे थे। सम्भवतः भारतीय दलों के इसी रवैये का असर था कि औपनिवेशक सरकार भी संघ को शक की नजर से देखने लगी। पुलिस प्रशासन ने संघ की गतिविधियों पर निगाह रखनी शुरू कर दी। इसी दौरान 1929 में गुप्तचर विभाग ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा, “संघ का तात्कालिक लक्ष्य तो हिन्दुओं को सुरक्षा के लिए संगठित करना है, परन्तु अन्तिम लक्ष्य स्वराज्य प्राप्ति है।”

साल 1932 तक इस तरह की कई रिपोर्टें आईं। इनके नतीजे में अन्ततः मध्य प्रान्त की सरकार ने दिसम्बर 1932 में एक आदेश जारी कर सरकारी कर्मचारियों के संघ से प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष जुड़ाव पर प्रतिबन्ध लगा दिया। संघ पर यह पहला प्रतिबन्ध था। इसमें खास बात यह रही कि सरकारी आदेश में संघ को “साम्प्रदायिक और राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेने वाला” कहा गया था। जबकि संघ से पहले मुस्लिम लीग जैसे तमाम साम्प्रदायिक संगठन मौजूद थे, जो इसी तहर की गतिविधियाँ चला रहे थे। स्वयं में उनका स्वरूप भी साम्प्रदायिक ही था, लेकिन सरकार को उनसे कोई समस्या नहीं थी, न ही उन पर किसी तरह कोई प्रतिबन्ध था।

यद्यपि प्रतिबन्ध के विरुद्ध संघ ने समझदारी भरी प्रतिक्रिया दी। उसने कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दी। इससे लाभ यह हुआ कि प्रतिबन्ध के बाद संघ के विस्तार को गति मिल गई। साल 1933 तक संघ की शाखाओं की संख्या 125 हो गई और स्वयंसेवकों की संख्या 12 हजार तक पहुँच गई। इसी दौरान, 1933 की विजयादशमी के मौके पर नागपुर में 1,000 स्वयंसेवकों ने पथ-संचलन कर अपनी एकता का परिचय दिया। इसी वर्ष बाबाराव सावरकर ने भी अपने संगठन “तरुण हिन्दू सभा” का संघ में विलय कर दिया। यह विस्तार सरकार के लिए समस्या बनने लगा। 

ब्रिटिश भारत की सरकार के सचिव एम जी हालैट ने मध्य प्रान्त की सरकार से इस बात पर असन्तोष व्यक्त किया कि संघ को रोकने सम्बन्धी उसके कदम सख्त नहीं हैं, कमजोर हैं। उन्होंने लिखा, “प्रान्तीय सरकार आखिर इस प्रकार के अर्द्धसैनिक संगठन की गतिविधियाँ जारी रखने की अनुमति कैसे दे रही है?” आखिर मध्य प्रान्त की सरकार के स्थानीय प्रशासन विभाग ने 20 दिसम्बर 1933 को नया आदेश जारी कर दिया। इसमें संघ को ‘साम्प्रदायिक’ ही कह दिया। साथ ही, शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों पर संघ का सदस्य बनने या उसके कार्यक्रमों में भाग लेने की मनाही भी कर दी। हालाँकि, इस बार संघ की प्रतिक्रिया शान्त नहीं रही।

संघ ने इस आदेश के विरोध के लिए जिला परिषदों एवं नगर पालिकाओं से प्रस्ताव पारित कराने के प्रयास किए। इसमें उसे सफलता मिली। अकोला जिला परिषद ने सरकारी प्रयास की भर्त्सना की और हेडगेवार के प्रयासों की प्रशंसा की। वहीं, नागपुर नगरपालिका ने संघ के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। ऐसी बहुत सी नगरपालिकाओं ने संघ के पक्ष में प्रस्ताव पारित कर प्रान्तीय सरकार को भेजे। इस तरह एक बार फिर संघ मजबूत होता दिखाई दिया। संघ के प्रति समर्थन को समझने के लिए यहाँ यह जानना भी आवश्यक है कि मध्यप्रान्त की विधान परिषद के बजट सत्र के दौरान 7 और 8 मार्च 1934 को संघ पर बहस चली थी। इसमें ‘कम्युनल’ अर्थात् ‘साम्प्रदायिक’ शब्द पर भी चर्चा हुई, क्योंकि सरकारी आदेश में संघ के विरुद्ध यह शब्द इस्तेमाल किया गया था।

इसी आधार पर प्रतिबन्ध का दायरा बढ़ाया गया था। लेकिन सदन में सरकार बहस के दौरान संघ के विरुद्ध कोई भी ठोस सबूत नहीं दे पाई और सरकार को अपने पूर्व के दोनों आदेश वापस लेने पड़े। बहस के दौरान भाषण में यूएन ठाकुर ने कहा था, “जिस ‘शरीफ’ व्यक्ति ने मंत्री बनते ही 1932 के परिपत्र का विस्तार कर उसे 1933 में नए सिरे से लागू किया, वह खुद घोर साम्प्रदायिक तंजीम से जुड़े हैं।” ऐसे कटाक्ष के बाद मंत्री ने बस इतना कहा कि सरकार के परिपत्र सिर्फ सलाह के रूप में थे। वे संघ सहित दूसरे संगठनों पर भी लागू थे। खैर, प्रान्तीय सरकार के इस तरह झुकने के बाद 18 मार्च 1934 के गुरु पूर्णिमा उत्सव को संघ ने ‘विजय दिवस’ के रूप में मनाया। संघ के सैकड़ों स्वयंसेवकों ने नागौर में रैली निकाली। इस दौरान, बाबा साहब खापर्डे ने कहा, “सरकार ने परिपत्र जारी कर संघ को अपरिमित लाभ पहुँचाया। संघ की वृद्धि में सहयोग ही किया।”

हालाँकि, संघ की राह में रोड़ेबाजी का सिलसिला यहाँ रुका नहीं। नासिक के जिलाधिकारी ने 1938 में फिर अपने स्तर पर एक आदेश जारी किया। इसमें स्थानीय कर्मचारियों को संघ के कार्यक्रमों में जाने से प्रतिबन्धित कर दिया। प्रान्तों से विचार के बाद केन्द्र की अंग्रेज सरकार ने भी संघ की गतिविधियाें को ध्यान में रखते हुए 5 अगस्त 1940 को स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा शारीरिक प्रशिक्षण आदि पर प्रतिबन्ध लगाया। लेकिन इस बार मध्य प्रान्त की सरकार ने इस प्रतिबन्ध को लागू करने में टालमटोल किया। तब केन्द्र को आदेश सख्ती से लागू करने का फरमान जारी करना पड़ा । इस सबके बावजूद संघ अपनी पद्धति पर डटा रहा। उसकी गतिविधियाँ पूर्ववत जारी रहीं। 

दरअसल, डॉक्टर हेडगेवार जी के स्वर्गवासी हो जाने के बाद भी संघ का स्वरूप जिस तरह से विस्तार पा रहा था और गतिविधियाँ चल रहीं थीं, उससे ‘सरकार’ अपने कारणों से चिन्तित थी। उसकी चिन्ता सही भी सिद्ध हुई। क्योंकि डॉक्टर हेडगेवार ने सामाजिक संगठन और आन्दोलन की आड़ में एक क्रान्तिकारी तौर-तरीकों वाले संगठन के तौर पर ही संघ को विकसित किया था। इस बारे में संघ के सुनील आम्बेकर का कथन गौर करने लायक है। वे कहते हें, “संघ का सामान्य सिद्धान्त है कि आरएसएस शाखा चलाने के सिवाय कुछ नहीं करेगा लेकिन उसका स्वयंसेवक कोई कार्यक्षेत्र नहीं छोड़ेगा। इसी कारण संघ के स्वयंसेवक समाज के सभी क्षेत्रों में काम करते हैं।” संघ का यही स्वरूप उसे समय के साथ-साथ लगातार मजबूत बनाता गया, जिसकी आधारशिला आरएसएस के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार ने शुरुआत में ही रख दी थी। 

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(नोट : अनुज राज पाठक दिल्ली में संस्कृत विषय के सरकारी शिक्षक हैं। #अपनीडिजिटलडायरी की स्थापना से ही साथ जुड़े सदस्यों में शामिल हैं। अच्छे लेख और कविताएँ लिखते हैं। कभी-कभी श्रृंखलाबद्ध लेखन भी करते हैं।) 

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श्रृंखला की पिछली कड़ियाँ

3 – आरएसएस के 100 वर्ष : मात्र चार के अन्तराल में ही कांग्रेस संघ को प्रतिद्वन्द्वी मानने लगी थी!
2 – आरएसएस के 100 वर्ष : देखिए, हेडगेवार का कथन अक्षरशः: सत्य भी सिद्ध हुआ!
1- आरएसएस के 100 वर्ष : यह नहीं कह सकते कि जो कांग्रेस में नहीं था, वह देशभक्त नहीं था!

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