सांकेतिक तस्वीर
दीपक गौतम, सतना मध्य प्रदेश
मैंने कब कहा कि तुम प्रतीक्षारत रहो।
मैं अकिंचन की तरह समय की देहरी पर
जब तुमसे विदा ले रहा था।
वहीं ढलते रिश्ते की साँझ में बिंधा रह गया था।
स्मृतियों के द्वार से तुम कभी निकले ही नहीं बाहर।
ठिठककर अठखेलियां करतीं तुम्हारी यादें
अब भी सिमटी हैं मन के किसी कोने में।
थरथराते अल्फाजों से, काँपते हुए हाथों से,
मेरी निढाल खड़ी देह से शायद विदा ली हो तुमने।
मगर मेरी आत्मा में घर कर चुके प्रेम से विदा लेना,
भला कहाँ सम्भव था?
तुमने विदा ले भी ली हो तो क्या,
मैं तो कभी रीत ही नहीं पाया प्रेमपाश से,
मुक्त ही नहीं हुआ उस अभेद बाण से।
बिछोह की पीड़ा भी जब आनंद बन जाए,
तो समझना प्रेम घर कर गया है।
किसी ने खूब कहा है कि प्रेम ही
प्रेम से मिले घावों का मरहम है।
मैं प्रेम के उसी लेप के लिए देह धरे,
प्रेम पिशाच हो गया हूँ।
अभागा नहीं हूँ, ये सौभाग्य भी क्या कम है कि
सम्भव ही न हो सका तुमसे विदा लेना।
तुम ठहर गए हो सदा के लिए मन के अन्दर।
क्योंकि बड़ा मुश्किल है प्रेम में अलविदा कहना…
बड़ा मुश्किल है प्रेम में अलविदा कहना।
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दीपक की पिछली कविताएँ
3 – कविता : मैं अपना हाल-ए-दिल कैसे बयाँ करूँ?
2- एक कविता…. “मैं लिखूँगा और लिखता रहूँगा”
1- पहलगााम आतंकी हमला : इस आतंक के ख़ात्मे के लिए तुम हथियार कब उठाओगे?
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(दीपक मध्यप्रदेश के सतना जिले के छोटे से गाँव जसो में जन्मे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से 2007-09 में ‘मास्टर ऑफ जर्नलिज्म’ (एमजे) में स्नातकोत्तर किया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में लगभग डेढ़ दशक तक राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, राज एक्सप्रेस और लोकमत जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे। साथ में लगभग डेढ़ साल मध्यप्रदेश माध्यम के लिए रचनात्मक लेखन भी किया। इन दिनों स्वतंत्र लेखन करते हैं। बीते 15 सालों से शहर-दर-शहर भटकने के बाद फिलवक्त गाँव को जी रहे हैं। बस, वहीं से अपनी अनुभूतियों को शब्दों के सहारे उकेर देते हैं। कभी लेख तो कभी कविता की सूरत में। अपने लिखे हुए को #अपनीडिजिटलडायरी के साथ साझा भी करते हैं, ताकि वे #डायरी के पाठकों तक पहुँचें। ये कविता भी उन्हीं प्रयासों का हिस्सा है।)
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